Friday, November 15, 2013

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 बी वन में गुरनाम सिंह ने भी इस सच्चाई को पहचानना/स्वीकारना शुरू कर दिया है कि डिस्ट्रिक्ट में विशाल सिन्हा के मुकाबले एके सिंह को लोगों के बीच समर्थन और स्वीकार्यता ज्यादा मिल रही है

लखनऊ । एके सिंह को डिस्ट्रिक्ट के क्लब्स में जिस तरह से तवज्जो और मान-सम्मान मिल रहा है, उसे देखते हुए सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की संभावित चुनावी लड़ाई में विशाल सिन्हा पर दबाव खासा बढ़ गया है । विशाल सिन्हा को सबसे तगड़ा झटका गुरनाम सिंह के रवैये से भी लगा है । गुरनाम सिंह ने भी अब एके सिंह की उम्मीदवारी को एक हकीकत के रूप में स्वीकार कर लिया है और इस तरह की बातें की/कहीं हैं जिनसे संकेत मिलता है कि वह विशाल सिन्हा की उम्मीदवारी को वापस भी करा सकते हैं । एके सिंह ने दरअसल गुरनाम सिंह के पिछले वर्ष के उस वायदे को ही अपनी उम्मीदवारी का आधार बनाया है जिसमें गुरनाम सिंह ने उन्हें अगले वर्ष - यानि इस वर्ष सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर चुनवाने की बात कही थी । एके सिंह ने लगातार इस बात को  दोहराया है कि गुरनाम सिंह को उनके साथ किये गए इस वायदे को निभाना चाहिए ताकि कोई यह न कह सके कि गुरनाम सिंह वायदा तो कर देते हैं, लेकिन जब उन्हें निभाने का मौका आता है तो पीछे हट जाते हैं । गुरनाम सिंह ने पहले तो एके सिंह की इस रणनीति पर कोई ध्यान नहीं दिया; क्योंकि उन्होंने यह उम्मीद ही नहीं की थी कि एके सिंह की उम्मीदवारी में कोई दम पैदा हो पायेगा; लेकिन अब जब वह एके सिंह की उम्मीदवारी में दम बना देख रहे हैं तो यह कहने के लिए मजबूर हो रहे हैं कि एके सिंह की बात सच तो है ।
ऐसा नहीं है कि गुरनाम सिंह ने विशाल सिन्हा की उम्मीदवारी के समर्थन से पीछे हटने के कोई संकेत दिए हैं, लेकिन जिस तरीके से उन्होंने एके सिंह की उम्मीदवारी के दावे को सच मानना शुरू कर दिया है; तथा विशाल सिन्हा और एके सिंह में से कौन - के जबाव में उन्होंने 'देखते हैं' कहना शुरू किया है उससे लगने लगा है कि विशाल सिन्हा को उनका समर्थन अब पहले जैसा नहीं रहा है । गुरनाम सिंह के नजदीकियों का कहना है कि गुरनाम सिंह को लगातार दूसरी बार विशाल सिन्हा की पराजय का सहभागी बनना मँजूर नहीं होगा - इसलिए उन्होंने 'बचने' का विकल्प देखना शुरू कर दिया है । गुरनाम सिंह के नजदीकियों का कहना है कि उम्मीदवार के रूप में विशाल सिन्हा की कमजोरियों और एके सिंह की ताकत को पहचानना/भाँपना उन्होंने शुरू कर दिया है और जैसे ही उन्हें इस बात का पक्का विश्वास हो जायेगा कि विशाल सिन्हा के 'बचने' की कोई उम्मीद नहीं है - वैसे ही फिर वह एके सिंह के साथ किये गए वायदे को निभाने की बात करने लगेंगे । यही करतब गुरनाम सिंह ने मंजु सक्सैना और विनय भारद्धाज के मामले में दिखाया था । नंबर विनय भारद्धाज का था, लेकिन गुरनाम सिंह ने मंजु सक्सैना को उम्मीदवार बनवा दिया; किंतु जैसे ही उन्हें यह समझ में आया कि विनय भारद्धाज के सामने मंजु सक्सैना टिक नहीं पायेंगी - वह तुरंत ही मंजु सक्सैना को छोड़ कर विनय भारद्धाज के पक्ष में आ खड़े हुए । लोगों का मानना/कहना है कि गुरनाम सिंह ने जो खेल मंजु सक्सैना के साथ किया था, उसे वह विशाल सिन्हा के साथ भला क्यों नहीं कर सकते हैं ?
विशाल सिन्हा के खेल का कबाड़ा किया लेकिन डिस्ट्रिक्ट गवर्नर अनुपम बंसल ने है । विशाल सिन्हा के नजदीकियों का कहना है कि अनुपम बंसल ने जिस तरह से एके सिंह को तवज्जो दी और आगे बढ़ाया, उसके चलते एके सिंह को डिस्ट्रिक्ट में लोगों के बीच पहचान, समर्थन और स्वीकार्यता मिलती गई और आज वह विशाल सिन्हा के लिए बड़ी चुनौती बन गए हैं । विशाल सिन्हा के नजदीकियों का कहना है कि विशाल सिन्हा ने कई बार अनुपम बंसल से कहा भी कि एके सिंह को ज्यादा हवा न दो, लेकिन अनुपम बंसल ने उनकी एक नहीं सुनी । दरअसल अनुपम बंसल को शिकायत यह रही कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर को एक उम्मीदवार से जिस तरह की मदद की जरूरत होती है, उम्मीदवार के रूप में विशाल सिन्हा वैसी मदद मुहैया नहीं करा रहे हैं । एके सिंह से चूँकि उन्हें मदद मिली, इसलिए उन्होंने एके सिंह को आगे बढ़ने का मौका दिया । अनुपम बंसल ने संभवतः यह भी समझ लिया कि विशाल सिन्हा के साथ दोस्ती निभाने के चक्कर में उन्हें कोई फायदा तो हुआ नहीं, उलटे सिर्फ बदनामी ही साथ लगी है । इसके आलावा, अनुपम बंसल को यह भी समझ में आया - या उन्हें यह समझाया गया - कि वह विशाल सिन्हा के लिए चाहें कुछ भी कर देंगे, विशाल सिन्हा लेकिन अहसान सिर्फ गुरनाम सिंह का ही मानेंगे और उनके हिस्से में तो बस 'बाबा जी का ठुल्लु' ही आयेगा । संभवतः इसीलिए, विशाल सिन्हा की तमाम नाखुशी के बावजूद अनुपम बंसल ने एके सिंह को आगे बढ़ाने का काम किया है और इस तरह मिले मौके का एके सिंह ने भरपूर फायदा उठाया है ।
विशाल सिन्हा अपने आप को जिस स्थिति में फँसा पा रहे हैं, उसमें से निकलने/उबरने के लिए उन्होंने हमदर्दी-कॉर्ड चला है । विशाल सिन्हा लोगों को बता/जाता रहे हैं कि उन्होंने पिछले वर्ष इतना इतना 'काम' किया था, इसलिए इस वर्ष उनसे ज्यादा 'काम' की उम्मीद नहीं की जानी चाहिए और उन्हें इस वर्ष सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर चुन लेना चाहिए । विशाल सिन्हा के इस तर्क पर कुछेक लोगों ने पराग गर्ग की वकालत शुरू कर दी । पराग गर्ग की वकालत करने वाले लोगों का कहना है कि विशाल सिन्हा यदि एक वर्ष के 'काम' के आधार पर दूसरे वर्ष चुने जाने का अधिकार माँग रहे हैं, तो यह अधिकार अपने से पहले उन्हें पराग गर्ग को लेने देना चाहिए - क्योंकि पराग गर्ग ने तो उम्मीदवार के रूप में दो वर्ष काम किया है । जाहिर तौर पर विशाल सिन्हा का हमदर्दी-कॉर्ड भी पिटता हुआ दिख रहा है ।
विशाल सिन्हा से सहानुभूति रखने वाले लोगों का कहना है कि विशाल सिन्हा को सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की दौड़ में यदि सचमुच रहना है, और इस दौड़ को जीतना है तो उन्हें वस्तु स्थिति का आकलन करके अपनी रणनीति और सक्रियता को संयोजित करना होगा । गलतफहमियों में रहने का नतीजा वह पिछली बार भुगत ही चुके हैं । इस सच्चाई को उन्हें स्वीकार कर ही लेना चाहिए कि पिछली बार के मुकाबले इस बार की उनकी लड़ाई ज्यादा मुश्किल है - क्योंकि पिछली बार गुरनाम सिंह की मुट्ठी बंद थी और उसे लाख की समझा जा रहा था; इस बार वह मुट्ठी खुली हुई है और सभी जान चुके हैं कि वह तो खाक की है ।
गुरनाम सिंह इस सच्चाई को समझ रहे हैं तथा इसीलिये 'विशाल सिन्हा और एके सिंह में से कौन' जैसे सवाल पर उनका जबाव हो रहा है कि 'देखते हैं' - जाहिर है कि गुरनाम सिंह ने इस सच्चाई को पहचानना/स्वीकारना शुरू कर दिया है कि डिस्ट्रिक्ट में विशाल सिन्हा के मुकाबले एके सिंह को लोगों के बीच समर्थन और स्वीकार्यता ज्यादा मिल रही है । ,

Thursday, November 14, 2013

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 सी वन में कल तक शराब कम पड़ने की शिकायत करते हुए उम्मीदवारों की फजीहत करने वाले शिव कुमार चौधरी को आज ऐसी ही शिकायतों का सामना करना पड़ रहा है

गाजियाबाद । शिव कुमार चौधरी यह देख कर खासे हैरान और परेशान हैं कि कभी जो 'खेल' वह दूसरे उम्मीदवारों के साथ खेला करते थे, वही खेल अब दूसरे लोग उनके साथ खेल रहे हैं । उल्लेखनीय है कि अभी हाल ही में हरिद्धार में संपन्न हुई दूसरी कैबिनेट मीटिंग में पहुँचे लोगों के लिए फैलोशिप की व्यवस्था करने वाले शिव कुमार चौधरी को शराब कम पड़ जाने की शिकायत एक बार फिर सुनने को मिली । इससे पहले, रुद्रपुर में आयोजित हुई स्कूलिंग में भी शिव कुमार चौधरी को शराब के कूपन कम देने के आरोप सुनने पड़े थे । उस समय शिव कुमार चौधरी ने इस तरह की शिकायत करने वालों को बुरी तरह हड़काया भी था । मजे की बात यह थी कि मनमानी संख्या में कूपन लेने वाले भी कूपन कम मिलने की शिकायत कर रहे थे । शिव कुमार चौधरी ने जब यह सुना तो उन लोगों को 'पकड़' कर उनसे पूछा कि तुमने जितने कूपन माँगे, उतने तुम्हें दिए - फिर कूपन कम मिलने की शिकायत क्यों कर रहे हो । लेकिन शिकायत करने वालों के मुँह बंद नहीं किये जा सके ।
हरिद्धार में फिर यही तमाशा हुआ । मिड वे रिसोर्ट में शिव कुमार चौधरी द्धारा की गई 'व्यवस्था' का लुत्फ़ उठाते उठाते भी लोगों की शिकायत यह रही कि - मजा नहीं आया । लोगों ने बीयर की मांग की और उन्हें जब बीयर नहीं मिली तो उन्होंने जुमले कसे कि शिव कुमार चौधरी कैसे चुनाव लड़ेंगे ? दरअसल एक उम्मीदवार के रूप में शिव कुमार चौधरी की 'क्षमताओं' को लेकर लोगों के बीच लगातार संदेह बना हुआ है; उनके समर्थन में दिख रहे लोगों तक को यह विश्वास नहीं है कि वह सचमुच में सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद का चुनाव अफोर्ड कर पायेंगे । हालाँकि उनके चुनाव की बागडोर सँभालने वाले नेता लगातार लोगों को आश्वस्त करते रहते हैं कि उन्होंने सारा गणित जोड़/समझ लिया है - और शिव कुमार चौधरी के लिए चुनाव 'लड़ना' कतई मुश्किल नहीं होगा । किंतु लोगों के बीच फिर भी संदेह बना ही हुआ है ।
हरिद्धार में बीयर न पा सके लोगों ने इस बात को और हवा दी । लोगों का कहना था कि वह दिन में शराब की बजाये बीयर पीना चाहते हैं, इसलिए बीयर की व्यवस्था होनी चाहिए थी । शिव कुमार चौधरी के नजदीकियों का ही लोगों के बीच कहना रहा कि बीयर की व्यवस्था इसलिए नहीं की गई क्योंकि उससे खर्चा बढ़ जाता । यही सोच कर बीयर की व्यवस्था नहीं की गई क्योंकि लोगों को जब बीयर दिख जाती है तो वह बीयर ज्यादा पी जाते हैं और फिर शराब भी पीते ही हैं । लोगों के बीच यही निष्कर्ष निकला कि खर्चा बचाने के उद्देश्य से ही शिव कुमार चौधरी ने बीयर की व्यवस्था नहीं की ।
इस निष्कर्ष ने शिव कुमार चौधरी को बुरी तरह हताश किया । उनके लिए यह समझना मुश्किल रहा कि लोग बेतहाशा पीते हैं तो फिर शिकायत क्यों करते हैं ?
शिव कुमार चौधरी के लिए इससे भी बुरी बात यह रही कि कई लोगों ने याद किया कि खुद शिव कुमार चौधरी भी ऐसा ही करते थे । खास तौर से सुनील निगम के साथ किये गए उनके व्यवहार को लोगों ने याद किया । उल्लेखनीय है कि सुनील निगम जब उम्मीदवार थे, तब कई बार उनके द्धारा की गई 'व्यवस्था' में शराब के कम पड़ जाने को लेकर हुड़दंग हुआ था । लोगों ने याद किया कि अधिकतर बार हुड़दंगियों का नेतृत्व करते हुए शिव कुमार चौधरी को ही देखा गया था । यानि शिव कुमार चौधरी के लिए 'सीन' वही है - फर्क सिर्फ इतना है कि पहले सीन में वह शिकार करते थे, और अभी के सीन में वह शिकार हो रहे हैं ।
तो क्या शिव कुमार चौधरी से नियति बदला ले रही है ? 
हमारे यहाँ कहा/माना भी जाता है कि जो जैसा बोता है, उसे काटने को भी वैसा ही मिलता है ।
कल तक शिव कुमार चौधरी शराब कम पड़ने की शिकायत करते हुए उम्मीदवारों की फजीहत किया करते थे, आज उन्हें लोगों से सुनने को मजबूर होना पड़ रहा है कि शराब पिलाने में वह यदि कंजूसी करेंगे तो फिर चुनाव में लोगों का समर्थन कैसे पायेंगे ?

Tuesday, November 12, 2013

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3100 में दिवाकर अग्रवाल के नामांकन को निरस्त कराने के मामले में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राकेश सिंघल ने इंटरनेशनल डायरेक्टर पीटी प्रभाकर को 'सेट' कर लेने का दावा किया

मुरादाबाद । दिवाकर अग्रवाल को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की चुनावी होड़ से बाहर करने की तिकड़म को इंटरनेशनल डायरेक्टर पीटी प्रभाकर का समर्थन मिल जाने का दावा करके डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राकेश सिंघल ने दीपक बाबू और उनके समर्थकों को खासा खुश कर दिया है । दीपक बाबू और उनके समर्थकों को विश्वास हो चला है कि राकेश सिंघल ने अब जब पीटी प्रभाकर को सेट कर लिया है तो दिवाकर अग्रवाल का नामांकन रद्द होना पक्का ही है और फिर दीपक बाबू डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी बन ही जायेंगे । उल्लेखनीय है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए प्रतिद्धन्द्धी उम्मीदवार दिवाकर अग्रवाल की सक्रियता तथा डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच उनकी स्वीकार्यता को देख/भाँप पर दीपक बाबू और उनके समर्थकों को जब अपनी पराजय सुनिश्चित जान पड़ी तो वह तीन-तिकड़मपूर्ण षड़यंत्र की जुगाड़ में लग गए । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बनने की इच्छा रखने वाले दीपक बाबू के साथ समस्या दरअसल यह हुई है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर तो उन्हें बनना है, लेकिन उसके लिए लोगों का समर्थन जुटाने वास्ते आवश्यक सक्रियता दिखाना उनके लिए संभव नहीं हो पाया । दीपक बाबू ने पिछले रोटरी वर्ष में भी अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत की थी किंतु चुनाव का दिन नजदीक आते-आते उन्हें आभास हो गया कि चुनाव जीतना उनके लिए संभव नहीं होगा, लिहाजा चुनाव से ठीक पहले वह मैदान छोड़ भागे ।

दीपक बाबू ने इस वर्ष जब एक बार फिर अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत की तो डिस्ट्रिक्ट के लोगों को लगा कि पिछले वर्ष की अपनी कमियों/कमजोरियों से सबक सीख कर वह इस बार उन्हें नहीं दोहरायेंगे । लेकिन इस बार तो उनका 'प्रदर्शन' और भी ख़राब रहा । एक उम्मीदवार के रूप में डिस्ट्रिक्ट में लोगों के बीच सक्रिय होने को लेकर दीपक बाबू ने कभी भी कोई दिलचस्पी ही नहीं दिखाई । डिस्ट्रिक्ट के विभिन्न क्लब्स के आयोजनों को तो छोड़िये, डिस्ट्रिक्ट के प्रमुख कार्यक्रमों तक में उपस्थित होने/रहने की उन्होंने कोई जरूरत नहीं समझी । बीच में कई ऐसे मौके आये जबकि लगातार कई-कई दिनों तक रोटरी में और डिस्ट्रिक्ट में दीपक बाबू की शक्ल तक लोगों को नजर नहीं आई । इसी के चलते कई बार इस तरह की घोषणाएँ सामने आईं कि दीपक बाबू ने उम्मीदवार बनने का इरादा छोड़ दिया है । दीपक बाबू के नजदीकियों ने ही लोगों को बताया कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव की प्रक्रिया को अपना पाना दीपक बाबू के बस की बात नहीं है और इसीलिए दीपक बाबू ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बनने का इरादा छोड़ दिया है । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के दूसरे उम्मीदवार के रूप में दिवाकर अग्रवाल ने डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच जिस तरह की सक्रियता दिखाई और अपनी उम्मीदवारी के प्रति स्वीकार्यता और समर्थन को जुटाया, उसके चलते दीपक बाबू के लिए मामला और भी गंभीर व नाउम्मीदभरा हो गया ।
दीपक बाबू ने भले ही उम्मीद छोड़ दी हो - लेकिन दीपक बाबू के कुछेक समर्थक लोगों ने उम्मीद नहीं छोड़ी । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राकेश सिंघल की डिस्ट्रिक्ट टीम में प्रमुख हैसियत रखने वाले दीपक बाबू के समर्थकों ने उन्हें समझाया कि राकेश सिंघल थोड़े लालची किस्म के व्यक्ति हैं, इसलिए यदि उन्हें डिस्ट्रिक्ट कॉन्फरेंस के लिए खर्चे करने का आश्वासन दे दिया जाये, तो फिर उनसे कुछ भी करवाया जा सकता है । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राकेश सिंघल के निकटवर्तियों ने दीपक बाबू को पूरा हिसाब समझाया कि डिस्ट्रिक्ट के लोगों से समर्थन जुटाने के लिए समय, एनर्जी और पैसा खर्च करना पड़ेगा; जबकि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर का समर्थन 'जुटाने' के लिए सिर्फ पैसा खर्च करना होगा । दीपक बाबू चूँकि चार्टर्ड एकाउंटेंट हैं इसलिए उन्हें 'फर्जी एंट्रीज' के जरिये मुनाफा कमाने की तरकीबें पता ही हैं और इसीलिये उन्हें अपने समर्थकों द्धारा सुझाया गया फार्मूला समझ में भी आ गया और पसंद भी आया । इसके बाद ही डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की चुनावी लड़ाई से भागते दिख रहे दीपक बाबू चुनावी मैदान में पुनः आ पहुँचे । पर्दे के पीछे यह जो खेल हुआ, उसमें दीपक बाबू को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी चुनवाने के लिए दिवाकर अग्रवाल को रास्ते से हटाने का विकल्प अपनाने का फैसला हुआ । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राकेश सिंघल और उनकी टीम में मौज़ूद दीपक बाबू के समर्थकों ने जान/समझ लिया कि दिवाकर अग्रवाल की उम्मीदवारी के रहते हुए दीपक बाबू को चुनाव जितवाना असंभव ही होगा और इसलिए एकमात्र रास्ता दिवाकर अग्रवाल की उम्मीदवारी को निरस्त करना/करवाना ही होगा ।
दिवाकर अग्रवाल की उम्मीदवारी को निरस्त करने/करवाने के लिए डिस्ट्रिक्ट डायरेक्टरी में उनके नाम/पते सहित प्रकाशित उनकी तस्वीर को बहाना बनाया गया; जबकि तथ्य यह है कि उसी डायरेक्टरी में नाम/पते सहित दीपक बाबू की भी तस्वीर छपी है । फर्क यह है कि दिवाकर अग्रवाल का नाम/पता/फोटो डिस्ट्रिक्ट टीम के एक पदाधिकारी के रूप में छपा है और दीपक बाबू का नाम/पता/फोटो एक विज्ञापन के रूप में है । डिस्ट्रिक्ट डायरेक्टरी में दिवाकर अग्रवाल को जिस पद पर बताया गया है, उस पद से दिवाकर अग्रवाल ने मौजूदा रोटरी वर्ष शुरू होने से पहले ही इस्तीफ़ा दे दिया था । तथ्यों के और नियमों के संदर्भ में यदि देखें तो नामांकन दिवाकर अग्रवाल की बजाये दीपक बाबू का रद्द होना चाहिए - क्योंकि रोटरी इंटरनेशनल का कोई भी नियम किसी भी उम्मीदवार को अपना प्रचार करने के लिए विज्ञापन देने का अधिकार नहीं देता है ।
इस सारे झमेले की पड़ताल करें तो देखेंगे कि दिवाकर अग्रवाल से तो सिर्फ राजनीतिक लापरवाही हुई है : उन्हें जब इस वर्ष अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करनी थी और उन्हें पता था - और यदि नहीं पता था तो पता होना चाहिए था - कि डिस्ट्रिक्ट टीम में कोई पद लेकर वह उम्मीदवार नहीं हो सकेंगे, तो उन्हें पद का ऑफर स्वीकार नहीं करना चाहिए था । दिवाकर अग्रवाल को लेकिन जैसे ही अपनी इस लापरवाही का ज्ञान हुआ, उन्होंने तुरंत पद छोड़ दिया । पद छोड़ने का काम भी उन्होंने नियमों में तय की गई समय-सीमा में कर दिया । इस तरह तकनीकी रूप से दिवाकर अग्रवाल ने नियमों का कोई उल्लंघन नहीं किया है । जबकि दूसरी तरफ, दीपक बाबू ने अपना विज्ञापन देकर नियमों का घोर उल्लंघन किया है । संदेह का लाभ देकर यदि यह मान भी लिया जाये कि उन्हें - और विज्ञापन लेने और छापने वाले डिस्ट्रिक्ट गवर्नर को - नियम का नहीं पता होगा, तो भी अब जब बातें उठ रही हैं तब तो दीपक बाबू और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर को अपनी इस हरकत पर सार्वजानिक रूप से खेद प्रगट करना चाहिए । इन दोनों ने अभी तक भी ऐसा नहीं किया है । 'चोरी और सीनाजोरी' वाले अंदाज़ में ये दोनों उलटे दिवाकर अग्रवाल का नामांकन निरस्त करवाने में लग गए हैं - जबकि रोटरी इंटरनेशनल के नियमों का पालन करने का संदर्भ यदि लिया जाये तो नामांकन तो दीपक बाबू का रद्द होना चाहिए ।
मजे की बात यह है कि दिवाकर अग्रवाल और या उनके समर्थकों की तरफ से दीपक बाबू का नामांकन रद्द कराने की कोई मांग नहीं सुनी गई है । इस संदर्भ में उनकी तरफ से प्रायः यही सुनने को मिला है कि रोटरी में इस तरह की टुच्ची कोशिशों से आगे बढ़ने का रास्ता बनाने का उदाहरण प्रस्तुत नहीं करना चाहिए और चुनाव को साफ-सुथरे और ईमानदार तरीके से ही लड़ा जाना चाहिए । दिवाकर अग्रवाल के समर्थकों का यही कहना है कि अब जब दो उम्मीदवारों के नामांकन आ गए हैं तो उनके बीच चुनाव होने देना चाहिए और डिस्ट्रिक्ट के लोगों को अपनी पसंद का डिस्ट्रिक्ट गवर्नर चुनने का मौका देना चाहिए ।
डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राकेश सिंघल ने लेकिन 'डिस्ट्रिक्ट कॉन्फरेंस के लिए खर्चे करने का आश्वासन' मिलने के बाद दिवाकर अग्रवाल की उम्मीदवारी को निरस्त करने का जो खेल शुरू किया है, उसके चलते डिस्ट्रिक्ट में सरगर्मी तो खासी बढ़ ही गई है - साथ ही डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की गरिमा और डिस्ट्रिक्ट 3100 की साख भी दाँव पर लग गई है । लोगों का कहना है कि राकेश सिंघल को डिस्ट्रिक्ट कॉन्फरेंस के लिए खर्चे का जुगाड़ करने के लालच में इस तरह का षड्यंत्र नहीं करना चाहिए । राकेश सिंघल ने लेकिन न सिर्फ यह षड्यंत्र किया, बल्कि रोटरी साउथ एशिया लिटरेसी समिट 2013 की तैयारी के सिलसिले में 7 और 8 नबंवर को गुड़गॉव में संपन्न हुई साउथ एशियन रोटरी डिस्ट्रिक्ट्स के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स की मीटिंग्स से लौटने के बाद से तो वह पूरी तरह आश्वस्त हैं कि उनका यह षड्यंत्र सफल भी होगा । राकेश सिंघल ने उक्त मीटिंग से लौटने के बाद डिस्ट्रिक्ट के लोगों को बताया है कि वहाँ उन्होंने इस विषय में इंटरनेशनल डायरेक्टर पीटी प्रभाकर से बात की है और पीटी प्रभाकर ने उन्हें आश्वस्त किया है कि जैसा फैसला चाहोगे, वैसा फैसला हो जायेगा । राकेश सिंघल के हवाले से उनके नजदीकियों ने लोगों को बताया है कि डिस्ट्रिक्ट में जिस तरह गवर्नर को कॉन्फरेंस को अच्छे से करने की चिंता होती है, इसी तरह से इंटरनेशनल डायरेक्टर को रोटरी फाउंडेशन के लिए पैसे जुटाने की चिंता होती है । ऐसे में जिस फार्मूले से दीपक बाबू के समर्थकों ने राकेश सिंघल को 'सेट' किया है, उसी फार्मूले से राकेश सिंघल ने पीटी प्रभाकर को 'सेट' कर लेने का दावा किया है ।
राकेश सिंघल ने लोगों को बताया है कि उनके कार्यकाल में अभी तक करीब साठ हज़ार डॉलर की जो रकम रोटरी फाउंडेशन के लिए जुटाई गई है, उससे पीटी प्रभाकर काफी खुश हैं । राकेश सिंघल ने उन्हें पूरे वर्ष में करीब एक लाख डॉलर की रकम जुटाने का आश्वासन देकर और खुश कर दिया है । पीटी प्रभाकर पीछे कई मौकों पर अपने फैसलों को लेकर 'खरीदने/बेचने' की बातें कर चुके हैं - इसलिए भी राकेश सिंघल आश्वस्त हैं कि उन्होंने दिवाकर अग्रवाल की उम्मीदवारी को निरस्त करवाने का जो षड्यंत्र रचा है, उसे पीटी प्रभाकर की तरफ से हरी झंडी अवश्य ही मिल जायेगी । इंटरनेशनल डायरेक्टर पद पर रह चुके कुछेक रोटरी के जिन बड़े नेताओं से इन पंक्तियों के लेखक की बात हो सकी है, उनका हालाँकि साफ कहना है कि जो तथ्य हैं उनके आधार पर दिवाकर अग्रवाल की उम्मीदवारी का नामांकन निरस्त नहीं किया जा सकता है । राकेश सिंघल लेकिन पीटी प्रभाकर से मिले आश्वासन के बाद अपने षड्यंत्र के सफल होने को लेकर जिस तरह से आश्वस्त हैं, उसके कारण दीपक बाबू के समर्थकों ने तो जीत का जश्न मनाना भी शुरू कर दिया है ।

Monday, November 11, 2013

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3010 में अमित जैन की सिफारिश के बाद जितेंद्र गुप्ता को दीवाली 'देने' की सुधीर मंगला की कार्रवाई से रमेश अग्रवाल और जेके गौड़ भड़के

नई दिल्ली । सुधीर मंगला जिन लोगों को अपनी उम्मीदवारी का समर्थक मान कर चल रहे हैं, और इस नाते उनकी मदद की उम्मीद लगाये बैठे हैं - उनके आपस के झगड़े सुधीर मंगला के लिए जी का जंजाल बन रहे हैं । रमेश अग्रवाल और जेके गौड़ को खुश करने के चक्कर में सुधीर मंगला ने पहले तो दीवाली 'मिलने' के अपने कार्यक्रम से जितेंद्र गुप्ता को बाहर रखा, लेकिन इसके लिए उन्हें जब अमित जैन से डाँट पड़ी और वह जाकर जितेंद्र गुप्ता को दीवाली दे आये तो रमेश अग्रवाल उनसे नाराज हो गए हैं । रमेश अग्रवाल ने सुधीर मंगला को बता दिया कि जब तुम्हें अमित जैन के कहने से ही सारे काम करने हैं तो अब तुम्हें अमित जैन ही चुनाव लड़वायेंगे । रमेश अग्रवाल को दरअसल यह डर सताने लगा है कि सुधीर मंगला का जब अभी यह हाल है कि वह रमेश अग्रवाल और जेके गौड़ की तुलना में अमित जैन को ज्यादा महत्व दे रहे हैं, तो कहीं यदि वह जीत गए तो रमेश अग्रवाल और जेके गौड़ को तो वह पहचानेगे भी नहीं !
रमेश अग्रवाल और जेके गौड़ को अमित जैन और जितेंद्र गुप्ता से इसलिए खुन्नस है, क्योंकि पिछले रोटरी वर्ष में सुधीर मंगला से रोटरी इंटरनेशनल में शिकायत करवाने में इन्हीं दोनों की मुख्य भूमिका थी । इन्हीं दोनों की तरफ से तरह-तरह से लगातार इस बात को प्रचारित किया गया कि जेके गौड़ को तो बेईमानी करके जितवाया गया है । रमेश अग्रवाल और जेके गौड़ ने इन बातों के लिए अमित जैन को कम, जितेंद्र गुप्ता को ज्यादा जिम्मेदार माना/ठहराया । अमित जैन ज्यादा पचड़े में नहीं पड़ते हैं, इसलिए - इसके बावजूद कि उन्होंने सुधीर मंगला द्धारा रोटरी इंटरनेशनल में की शिकायत में पर्दे के पीछे महत्वपूर्ण रोल अदा किया - उन्होंने तो कोई खास सक्रियता नहीं दिखाई; किंतु जितेंद्र गुप्ता ने जेके गौड़ का बना/बनाया खेल ख़राब करने के उद्देश्य से रमेश अग्रवाल के खिलाफ जम कर काम किया । इस कारण से रमेश अग्रवाल और जेके गौड़ को जितेंद्र गुप्ता से ज्यादा खुन्नस है । संभवतः इसी बात को ध्यान में रखते हुए सुधीर मंगला जब दीवाली बाँटने के अभियान पर निकले तो जितेंद्र गुप्ता के यहाँ नहीं गए ।
जितेंद्र गुप्ता का इस पर भड़कना स्वाभाविक ही था और वह भड़के भी । जितेंद्र गुप्ता की शिकायत रही कि सुधीर मंगला तमाम ऐसे ऐरे गैरे लोगों तक को तो दीवाली दे रहे हैं, जिनकी न तो कहीं कोई राजनीतिक हैसियत है और न जो कभी सुधीर मंगला के काम आये - लेकिन उनके यहाँ आने की सुधीर मंगला ने कोई जरूरत नहीं समझी; जबकि उन्होंने सुधीर मंगला की मदद करते हुए डिस्ट्रिक्ट के तमाम बड़े नेताओं से दुश्मनी मोल ली । जितेंद्र गुप्ता ने अमित जैन के आगे अपना दुखड़ा रोया और उलाहना दिया कि सुधीर मंगला अपनी मदद करने वालों के साथ यदि इस तरह का व्यवहार करेंगे, तो फिर उन पर कौन विश्वास करेगा और कौन उनकी मदद करेगा ? जितेंद्र गुप्ता की बात को अमित जैन ने सही माना और उन्होंने सुधीर मंगला को सलाह दी कि उन्हें जितेंद्र गुप्ता के साथ ऐसा सुलूक नहीं करना चाहिए । अमित जैन बीच में पड़े तो सुधीर मंगला ने जितेंद्र गुप्ता के यहाँ जाकर उन्हें दीवाली दे दी ।
सुधीर मंगला के लिए संकट लेकिन इसके बाद और बढ़ गया । हुआ यह कि अमित जैन के कहने पर सुधीर मंगला के जितेंद्र गुप्ता के यहाँ दीवाली देने जाने की खबर रमेश अग्रवाल और जेके गौड़ को मिली तो वह बिफर गए । वह इसलिए भी बिफर गए क्योंकि उन्होंने सुना कि जितेंद्र गुप्ता ने सुधीर मंगला के उनके यहाँ न आने के लिए उन्हें जिम्मेदार ठहराया है । दीवाली देने के लिए पहले न आने को लेकर सुधीर मंगला ने जितेंद्र गुप्ता से क्या कहा, यह तो वे दोनों जानें - लेकिन लोगों के बीच चर्चा यह फैली कि सुधीर मंगला ने जितेंद्र गुप्ता के सामने सफाई यह दी कि उन्हें रमेश अग्रवाल और जेके गौड़ ने उनके यहाँ न जाने/आने के लिए कहा था । रमेश अग्रवाल चूँकि इस तरह की हरकतें करते रहे हैं, इसलिए हर किसी ने उक्त चर्चा पर सहज रूप से विश्वास भी कर लिया ।
उधर जितेंद्र गुप्ता दीवाली मिलने के बाद से सुधीर मंगला के सबसे बड़े समर्थक बन गए हैं और कहीं-कहीं उन्होंने लोगों को यह भी बताया कि रमेश अग्रवाल और जेके गौड़ ने किस तरह की घटिया हरकत की और अमित जैन ने किस तरह उन दोनों की घटिया राजनीति को फेल करके सुधीर मंगला को 'सही राह' पर पहुँचाया । इस तरह की बातें सुन कर रमेश अग्रवाल और जेके गौड़ का भड़कना लाजिमी ही था । जेके गौड़ तो इस बात की ज्यादा हवा नहीं लगने देते कि उनके मन में क्या चल रहा है, लेकिन रमेश अग्रवाल की तो दिल की हर धड़कन सुनी जा सकती है । जितेंद्र गुप्ता ने रमेश अग्रवाल और जेके गौड़ पर जो हमला 'किया', रमेश अग्रवाल ने उसका पूरी तल्खी से जबाव दिया । रमेश अग्रवाल ने कहा है कि जो जितेंद्र गुप्ता दीवाली न मिलने पर भड़क सकते हैं, और दीवाली प्राप्त करने का जुगाड़ बैठाने लगते हैं वह सचमुच में सुधीर मंगला की कैसी/ क्या मदद कर पायेंगे ? रमेश अग्रवाल ने साथ ही यह भी जोड़ा कि पिछले वर्ष तमाम कोशिशों के बाद भी अमित जैन और जितेंद्र गुप्ता की मदद सुधीर मंगला के कितने काम आई थी - यह अब सभी को पता है ।
सुधीर मंगला जिन लोगों की मदद से चुनाव जीतने का दावा कर रहे हैं, उनके बीच छिड़ी इस लड़ाई ने सुधीर मंगला के दावों की हवा तो निकाल ही दी है, साथ ही चुनावी चर्चाओं को भी दिलचस्प बना दिया है ।

Thursday, November 7, 2013

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 ए थ्री के दिल्ली दीपाली जैसे फर्जी किस्म के क्लब के कार्यक्रम में शामिल होने से राकेश त्रेहन, चंद्रशेखर मेहता, सुरेश बिंदल, नरेश गुप्ता का मान/सम्मान बढ़ेगा कि घटेगा ?

नई दिल्ली । हर्ष बंसल ने लायंस क्लब दिल्ली दीपाली के चार्टर प्रेजेंटेशन व इंस्टॉलेशन कार्यक्रम के बहाने तैयारी तो की थी डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विजय शिरोहा और सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर वीके हंस को नीचा दिखाने की - लेकिन उनकी हरकत से फजीहत हो रही है राकेश त्रेहन, चंद्रशेखर मेहता, सुरेश बिंदल और नरेश गुप्ता की । राकेश त्रेहन कार्यक्रम के मुख्य अतिथि हैं और उन्हें ही चार्टर प्रेजेंट करना है । चंद्रशेखर मेहता कीनोट स्पीकर हैं और सुरेश बिंदल इंस्टॉलेशन ऑफीसर हैं । फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नरेश गुप्ता इंडक्शन ऑफीसर हैं । किसी भी क्लब के कार्यक्रम में 'इन' रूपों में आमंत्रित किये जाने पर किसी का भी मान/सम्मान बढ़ता है - लेकिन मुख्य अतिथि, कीनोट स्पीकर, इंस्टॉलेशन ऑफीसर, इंडक्शन ऑफीसर के रूप में आमंत्रित किये जाने के बावजूद  डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच राकेश त्रेहन, चंद्रशेखर मेहता, सुरेश बिंदल, नरेश गुप्ता की किरकिरी हो रही है तो इसलिए क्योंकि लायंस क्लब दिल्ली दीपाली एक फर्जी किस्म का क्लब है जिसे कहीं से ईंट और कहीं से रोड़ा लेकर बनाया गया है । डिस्ट्रिक्ट में लोग चटखारे लेकर बातें कर रहे हैं कि इन बड़े बड़े नेताओं की स्थिति/हैसियत अब यही रह गई है क्या कि ये फर्जी किस्म के क्लब में अपना स्वागत करवाएँ ?
लायंस क्लब दिल्ली दीपाली हर्ष बंसल का जेबी क्लब है; जिसे उन्होंने पिछले वर्ष तब बनाया था जब उन्हें लायंस क्लब दिल्ली एरिस्टोक्रेट से निकाल दिया गया था । उल्लेखनीय है कि हर्ष बंसल उन 'विलक्षण' नेताओं में हैं, जिन्होंने कई क्लब बनाये - जो या तो बंद हो गए और या जिनमें से उन्हें जलील करके निकल दिया गया । जैसा कि हर्ष बंसल के नजदीकियों का कहना है कि हर्ष बंसल की नसों में खून नहीं, बल्कि लॉयनिज्म बहता है; इसीलिये भले ही क्लब उनसे न चले और बंद हो जाये या उन्हें क्लब से निकाल दिया जाये लेकिन लायनिज्म उनसे नहीं छूटती - वह एक नया क्लब बना कर लायनिज्म करते रहने का जुगाड़ बना ही लेते हैं । हर्ष बंसल अपने आप को बड़ा भारी नेता बनते हैं, लेकिन उनकी औकात ऐसी है कि पिछले वर्ष उन्हें जब लायंस क्लब दिल्ली एरिस्टोक्रेट से निकाला गया तो उनके साथ क्लब से एक भी सदस्य उनके साथ बाहर नहीं आया । डिस्ट्रिक्ट में उनकी ऐसी बदनामी है कि कोई दूसरा क्लब उन्हें अपने यहाँ लेता नहीं । लिहाजा एक नया क्लब बनाना उनकी मजबूरी थी - आखिर उन्हें लायनिज्म भी तो करनी है । ऐसे में उन्होंने तरकीब यह लगाई कि दिल्ली मधुबन नाम से उनके पास पहले से जो एक फर्जी किस्म का क्लब है उसके कुछेक सदस्य लेकर और कुछ यहाँ-वहाँ से जुटा कर उन्होंने दिल्ली दीपाली का गठन कर लिया । जो सदस्य बेचारे दिल्ली मधुबन में कुछ नहीं कर रहे थे, वह दिल्ली दीपाली में क्या करेंगे ? हर्ष बंसल उन्हें उठा कर कभी दिल्ली मधुबन में रख देते हैं और कभी वहाँ से उठा कर दिल्ली दीपाली नाम से एक और फर्जी किस्म का क्लब बना लेते हैं ।
लायंस क्लब दिल्ली दीपाली में दिल्ली मधुबन के सदस्यों के आ जाने से दिल्ली मधुबन की सदस्य संख्या नाम मात्र की रह गई है - हर्ष बंसल को लेकिन इससे कोई मतलब नहीं है; उन्हें सिर्फ इस बात से मतलब है कि उनका एक नया क्लब बन गया । इसी फर्जी किस्म के नए क्लब के तथाकथित पदाधिकारियों के इंस्टॉलेशन कार्यक्रम में राकेश त्रेहन को मुख्य अतिथि, चंद्रशेखर मेहता को कीनोट स्पीकर, सुरेश बिंदल को इंस्टॉलेशन ऑफीसर और नरेश गुप्ता को इंडक्शन ऑफीसर का रोल अदा करना है । डिस्ट्रिक्ट में लोगों के बीच जो चर्चा है उसमें कहा/सुना यही जा रहा है कि इन लोगों को क्या पता नहीं होगा कि लायंस क्लब दिल्ली दीपाली कैसा क्लब है ? ऐसे फर्जी किस्म के क्लब के कार्यक्रम में बड़े बड़े नाम वाली तथाकथित जिम्मेदारियों को निर्वाह करने का तमाशा बनाने/करने को फिर ये लोग क्यों राजी हो गए ? डिस्ट्रिक्ट में लोग खुद ही ऐसे सवाल करते हैं और फिर स्वयं ही उसका जबाव भी देते हैं कि इन बेचारों की समस्या यह है कि अपनी नेतागिरी और अहमियत दिखाने का काम फिर ये कहाँ करें ? अपनी नेतागिरी और अहमियत दिखाने के लिए इन्हें यदि फर्जी किस्म के क्लब में ही मौका मिल रहा है तो ये उसे चूकना नहीं चाहते हैं । डिस्ट्रिक्ट में लोगों का कहना है कि हर्ष बंसल चूँकि इनकी यह कमजोरी जानते/पहचानते हैं, इसलिए उन्हें पक्का भरोसा है कि वह इन्हें अपने फर्जी किस्म के क्लब के कार्यक्रम में बुलायेंगे तो यह दौड़े चले आयेंगे । इस तरह हर्ष बंसल की यह हरकत राकेश त्रेहन, चंद्रशेखर मेहता, सुरेश बिंदल, नरेश गुप्ता की किरकिरी कराने का काम ही कर रही है ।
मजे की बात यह है कि दिल्ली दीपाली के इस कार्यक्रम के जरिये हर्ष बंसल ने चाल तो दरअसल डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विजय शिरोहा और सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर वीके हंस को नीचा दिखाने की चली थी । उन्होंने सोचा यह था कि इस कार्यक्रम में जब इन दोनों को न बुलाये जाने की बात लोगों के सामने आयेगी तो इनकी किरकिरी होगी - क्योंकि लोग कहेंगे कि डिस्ट्रिक्ट के एक क्लब के कार्यक्रम के निमंत्रण पत्र पर इनका नाम तक नहीं है । हुआ लेकिन उल्टा । लोगों के बीच चर्चा यह चल निकली कि यह अच्छा ही हुआ कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विजय शिरोहा और सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर वीके हंस का नाम एक फर्जी किस्म के क्लब के कार्यक्रम के साथ नहीं जुड़ा । हर्ष बंसल ने जो किया, उस पर किसी को भी आश्चर्य नहीं है; क्योंकि सभी जानते हैं कि हर्ष बंसल घटिया सोच का व्यक्ति है जो घटिया काम ही करता है, कर सकता है - लेकिन लोगों को राकेश त्रेहन, चंद्रशेखर मेहता, सुरेश बिंदल, नरेश गुप्ता के रवैये पर जरूर हैरानी है । किसी के लिए भी यह समझना लेकिन मुश्किल हो रहा है कि इनके सामने ऐसी क्या मजबूरी है जो इन्हें एक फर्जी किस्म के क्लब के कार्यक्रम में शामिल होने की स्वीकृति देने में जरा भी हिचकिचाहट नहीं हुई और ऐसे क्लब में सम्मान कराने के लिए झटपट तैयार हो गए । डिस्ट्रिक्ट में लोगों का मानना और कहना है कि दिल्ली दीपाली जैसे फर्जी किस्म के क्लब के कार्यक्रम में शामिल होना इनके लिए मान/सम्मान की नहीं, बल्कि अपमान और जलालत की बात ही होगी ।

Tuesday, November 5, 2013

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3010 में नोमीनेटिंग कमेटी के सदस्यों को चुनवाने में जेके गौड़ द्धारा दिखाई गई दिलचस्पी से कई क्लब्स के प्रमुख सदस्यों ने अपने आप को उपेक्षित और अपमानित महसूस किया है

गाजियाबाद । जेके गौड़ ने आम तौर पर उत्तर प्रदेश और खास तौर पर गाजियाबाद के विभिन्न क्लब्स से नोमीनेटिंग कमेटी के लिए सदस्यों को चुनवाने में जो दिलचस्पी ली है, उसे क्लब्स के प्रमुख सदस्यों ने उन्हें अपने ऊपर हावी होने की और अपनी चौधराहट ज़माने की कोशिश के रूप में देखा/पहचाना है । विभिन्न क्लब्स के प्रमुख सदस्यों ने इस बात को लेकर नाराजगी व्यक्त की है कि उनके क्लब से नोमीनेटिंग कमेटी के लिए किसका नाम जाये, इसे लेकर जेके गौड़ ने कुछ ज्यादा ही दिलचस्पी दिखाई है; और कहीं-कहीं इस बात को बहुत जोर-शोर के साथ प्रचारित भी किया कि फलाँ तो नोमीनेटिंग कमेटी में 'उसको' भेजना चाहता था, लेकिन मैंने 'उसको' करवा दिया । जेके गौड़ द्धारा किये गए दावों से ऐसा ध्वनित भी हुआ - जैसे गाजियाबाद में योगेश गर्ग, उमेश चोपड़ा, राजीव वशिष्ट, दीपक गुप्ता आदि के क्लब्स में जेके गौड़ ने उन सदस्यों को नोमीनेटिंग कमेटी के लिए नहीं चुना जाने दिया जो इनकी पसंद थे; बल्कि इनके क्लब्स से उन सदस्यों को चुनवाया जो जेके गौड़ की पसंद थे और जेके गौड़ के कहने पर कहीं भी अँगूठा लगा सकते हैं ।
जेके गौड़ के इस रवैये पर लोगों को हैरानी इसलिए है क्योंकि जेके गौड़ हमेशा यह दावा करते रहे हैं कि वह गाजियाबाद/उत्तर प्रदेश के लोगों को साथ लेकर ही चलेंगे और कोई भी फैसला सभी के साथ सहमति बना कर ही लेंगे । जेके गौड़ ने हमेशा यही दावा किया है कि वह डिस्ट्रिक्ट में और दिल्ली में गाजियाबाद/उत्तर प्रदेश के लोगों के हितों की वकालत करेंगे और गाजियाबाद/उत्तर प्रदेश का संगठित रूप प्रस्तुत करेंगे । लेकिन उनके रवैये से लोगों को लग यह रहा है कि जेके गौड़ जैसे दिल्ली के गिरोह के उत्तर प्रदेश के ब्राँच मैनेजर की भूमिका निभा रहे हैं । जेके गौड़ ने यह दावा भी किया हुआ है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी के चुनाव में उनकी तटस्थ भूमिका है और वह किसी भी उम्मीदवार की वकालत नहीं कर रहे हैं । इसलिए भी, लोगों के बीच उत्सुकता का विषय यह है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी के चुनाव में उन्हें यदि सचमुच कोई भूमिका नहीं निभानी है, तब फिर उन्होंने क्लब्स से नोमीनेटिंग कमेटी के लिए जाने वाले नामों को लेकर इतनी सक्रियता क्यों निभाई - जिसके चलते कई क्लब्स के प्रमुख सदस्यों ने अपने आप को उपेक्षित और अपमानित महसूस किया ।
दीपक गुप्ता को लेकर तो जेके गौड़ का रवैया और भी चकित कर देने वाला रहा है । दीपक गुप्ता को अगले रोटरी वर्ष में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवार के रूप में सक्रिय देखा/सुना जा रहा है । दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के प्रति समर्थन और सहानुभूति का भाव रखने वाले लोगों ने जेके गौड़ के 'उत्तर प्रदेश के साथ रहने' के दावे को याद करते हुए उम्मीद की थी कि जेके गौड़ डिस्ट्रिक्ट के चुनावबाज नेताओं के सामने दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी की वकालत करेंगे; लेकिन उन्होंने जेके गौड़ को जब उक्त चुनावबाज नेताओं की भाषा बोलते और उनकी हाँ में हाँ मिलाते देखा/सुना - तो वह भौंचक रह गए । दिल्ली के चुनावबाज नेता एक तरफ दीपक गुप्ता को भी हवा दे रहे हैं, तो दूसरी तरफ अजय नारायण और सरोज जोशी को भी प्रोत्साहित कर रहे हैं । वे ऐसा कर रहे हैं, यह तो समझ में आता है; लेकिन जेके गौड़ भी उनकी ही जैसी भाषा बोल रहे हैं - यह देख/जान कर उत्तर प्रदेश में दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थक और शुभचिंतक निराश हुए हैं । यह ठीक है कि जेके गौड़ अब जिस हैसियत में हैं उसमें उन्हें डिस्ट्रिक्ट के लोगों को साथ लेकर चलना है और ऐसे में उनसे उत्तर प्रदेश के 'हितों' की खुल्लम-खुल्ला वकालत की उम्मीद करना उनके साथ नाइंसाफी ही होगी, लेकिन उत्तर प्रदेश के लोगों को उनसे कुछ अलग तरह की जो अपेक्षाएँ हैं - उन्हें उन अपेक्षाओं का भी ध्यान तो रखना ही होगा । दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थकों व शुभचिंतकों की शिकायत यह है कि दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी को लेकर जेके गौड़ ने अभी तक जो रवैया दिखाया है उसमें वह डिस्ट्रिक्ट के चुनावबाज गिरोह के पिछलग्गू की भूमिका में दिखाई दे रहे हैं ।
जेके गौड़ ने जिस तरह से बिना किसी समर्थन के और अपने व्यक्तित्व के बिना किसी आकर्षण के - सिर्फ अपनी लगनशील मेहनत; अपनी कमजोरियों को पृष्ठभूमि में धकेल कर अपनी खूबियों को एक्सप्लोर कर और प्रतिकूल स्थितियों को अनुकूल बनाने के अपने हुनर का इस्तेमाल करके चुनावी बाजी जीती थी - उससे उनके नजदीकियों को उम्मीद बँधी थी कि यह जीत उन्हें एक ऐसा आत्मविश्वास देगी कि वह डिस्ट्रिक्ट में एक नई इबारत लिखने की कोशिश करेंगे और अपनी एक स्वतंत्र व खास पहचान बनाने की कोशिश करेंगे । जेके गौड़ को लेकिन एक गिरोह में चौथे-पाँचवे नंबर पर रहने की कोशिश करते देख उनके उन नजदीकियों को तगड़ा झटका लगा है । गाजियाबाद/उत्तर प्रदेश के क्लब्स से नोमीनेटिंग कमेटी के लिए सदस्यों को चुनवाने में दिखाई गई दिलचस्पी के कारण जेके गौड़ जिस तरह से गाजियाबाद/उत्तर प्रदेश के प्रमुख रोटेरियंस के निशाने पर आ गए हैं उसने जेके गौड़ की स्थिति को गंभीर बना दिया है । उनके लिए गंभीरता के साथ यह तय करने का समय शायद आ चुका है कि वह अपनी एक स्वतंत्र पहचान व साख बनाये और या डिस्ट्रिक्ट के चुनावबाज नेताओं के गिरोह के एजेंट बन कर रहे !  

Saturday, November 2, 2013

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 सी वन में शिव कुमार चौधरी द्धारा हुई सुधीर जनमेजा की फजीहत के कारण सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के चुनाव के समीकरण बदलेंगे क्या

गाजियाबाद । लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 सी वन के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सुधीर जनमेजा डिस्ट्रिक्ट के एक प्रमुख क्लब - लायंस क्लब गाजियाबाद से मिले झटके से अभी उबर भी नहीं पाये थे कि सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के उम्मीदवार शिव कुमार चौधरी ने उनकी फजीहत कर दी । सुधीर जनमेजा ने अपनी सेकेंड कैबिनेट मीटिंग में फैलोशिप के आयोजन हेतु शिव कुमार चौधरी को पहले तो अपने एक दूत के जरिये ऑफर भेजा, शिव कुमार चौधरी ने उक्त ऑफर को लेकर जब कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई तो सुधीर जनमेजा खुद मैदान में उतरे । जो संदेश सुधीर जनमेजा ने पहले अपने दूत के जरिये शिव कुमार चौधरी तक पहुँचाया थे, दौबारा में वही संदेश उन्होंने स्वयं शिव कुमार चौधरी के सामने रखा । संदेश यह था कि सेकेंड कैबिनेट मीटिंग में फैलोशिप के आयोजन के लिए दो लोगों ने प्रस्ताव रखा है, आप बताओ कि क्या करना है ? शिव कुमार चौधरी ने सुधीर जनमेजा के दूत से जब यह संदेश सुना तो दोटूक शब्दों में जबाव दिया कि - मुझे क्या करना है, उन दोनों से कहो कि फैलोशिप का आयोजन करें । दूत से सुधीर जनमेजा को शिव कुमार चौधरी का जब यह जबाव मिला तो उन्होंने खुद मोर्चा संभाला । सुधीर जनमेजा ने भी शिव कुमार चौधरी को वही संदेश दिया, जिसका दोटूक जबाव शिव कुमार चौधरी दे चुके थे ।
सुधीर जनमेजा को शायद यह उम्मीद रही होगी कि शिव कुमार चौधरी ने जिस टोटूक तरीके से उनके दूत को जबाव दिया, वैसे उन्हें नहीं देंगे । शिव कुमार चौधरी ने लेकिन वही जबाव उन्हें भी दिया और ठीक वैसे ही दिया जैसे सुधीर जनमेजा के दूत को दिया था । दरअसल शिव कुमार चौधरी समझ गए थे कि सुधीर जनमेजा को फैलोशिप के लिए कोई मिला नहीं है और वह उन्हें फाँसने के लिए झूठे दावे कर रहे हैं कि उन्हें दो लोगों का प्रस्ताव मिला है । शिव कुमार चौधरी ने भाँप लिया था कि सुधीर जनमेजा को यदि फैलोशिप के लिए सचमुच में दो लोग मिल गए होते तो फिर वह उनसे बात ही नहीं करते । स्कूलिंग के समय का अनुभव शिव कुमार चौधरी भूले नहीं थे, जब सुधीर जनमेजा ने तीन-तिकड़म से उन्हें फैलोशिप के लिए फँसा लिया था और उनसे मोटी रकम खर्च करवा ली थी । शिव कुमार चौधरी अब की बार सावधान थे और सुधीर जनमेजा के जाल में फँसने से बचने की तैयारी किये हुए थे । उनकी खुशकिस्मती रही कि दो लोगों के प्रस्ताव की बात कह कर बचने का मौका खुद सुधीर जनमेजा ने ही उन्हें दे दिया ।
सुधीर जनमेजा को जब लगा कि शिव कुमार चौधरी तो हाथ से निकले जा रहे हैं तो फिर उन्होंने उनके उम्मीदवार होने का वास्ता दिया । सुधीर जनमेजा ने उनसे कहा कि उम्मीदवार होने के नाते फैलोशिप का आयोजन उन्हें करना चाहिये । शिव कुमार चौधरी ने लेकिन उन्हें यह कह कर टका-सा जबाव दे दिया कि उम्मीदवार के रूप में उन्हें क्या करना है, यह वह जानते हैं और कर लेंगे; फैलोशिप का आयोजन दूसरे लोगों को ही कर लेने दो । इसके बाद सुधीर जनमेजा के पास कहने के लिए कुछ बचा ही नहीं रह गया । शिव कुमार चौधरी के दोटूक फैसले ने फैलोशिप जुटाने की उनकी सारी तिकड़म पर पानी फेर दिया था । हाल-फ़िलहाल के दिनों में सुधीर जनमेजा को यह दूसरा बड़ा झटका लगा है । इससे पहले लायंस क्लब गाजियाबाद के पदाधिकारी अपने क्लब के गोल्डन जुबली कार्यक्रम से बाहर रख कर सुधीर जनमेजा की खासी फजीहत कर चुके थे । उल्लेखनीय है कि जिस कार्यक्रम में इंटरनेशनल प्रेसीडेंट बनने की राह पर बढ़ रहे नरेश अग्रवाल और इंटरनेशनल बोर्ड की सदस्या अरुणा ओसवाल आमंत्रित किये गए हों, उस कार्यक्रम में डिस्ट्रिक्ट के गवर्नर को ही न तवज्जो दी जाये तो यह उक्त गवर्नर के लिए फजीहत की बात तो है ही । कार्यक्रम के निमंत्रण पत्र पर अपना नाम न पाकर सुधीर जनमेजा बहुत बुरी तरह से बिफरे थे और उन्होंने हर संभव प्रयास किया कि उक्त कार्यक्रम या तो हो ही न सके और या नरेश अग्रवाल व अरुणा ओसवाल उसमें शामिल न हों । सुधीर जनमेजा की लेकिन एक न चली और उन्हें ऐतिहासिक रूप से फजीहत का शिकार होना पड़ा । ऐतिहासिक इसलिए क्योंकि इतनी और किसी गवर्नर की हुई हो, ऐसा किसी को याद नहीं पड़ता ।
सुधीर जनमेजा के लिए शिव कुमार चौधरी से मिला झटका लेकिन ज्यादा गंभीर है । सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद का उम्मीदवार डिस्ट्रिक्ट गवर्नर की इतनी अवहेलना करे और फैलोशिप करने के उसके आमंत्रण को सिरे से ख़ारिज कर दे, यह अपने आप में बड़ी बात है । यह बात तब और बड़ी हो जाती है जब डिस्ट्रिक्ट गवर्नर उसी खेमे का हो जिस खेमे के समर्थन के भरोसे उम्मीदवार सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बनने की दौड़ में हो । तो क्या यह माना जाये कि शिव कुमार चौधरी ने सुधीर जनमेजा के प्रति उपेक्षा का जो रवैया दिखाया है, उसकी प्रेरणा और प्रोत्साहन उन्हें खेमे के बड़े नेताओं से मिला है ? क्योंकि यह भी देखा/सुना गया है कि खेमे के बड़े नेता सुधीर जनमेजा से खुश नहीं चल रहे हैं । सुधीर जनमेजा के नजदीकियों का कहना है कि शिव कुमार चौधरी अभी चाहें किसी भी कारण से सुधीर जनमेजा की अहमियत नहीं समझ रहे हों, लेकिन जल्दी ही उन्हें इसकी जो कीमत चुकानी पड़ेगी उससे उन्हें अहसास होगा कि उन्होंने गलती की है । सुधीर जनमेजा के इन्हीं नजदीकियों का यह भी कहना है कि हो यह भी सकता है कि अभी तेवर दिखा रहे शिव कुमार चौधरी अंततः कैबिनेट मीटिंग में फैलोशिप के लिए राजी हो ही जाएँ ।
डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सुधीर जनमेजा के प्रति शिव कुमार चौधरी के रवैये को देख/पहचान कर डिस्ट्रिक्ट के चुनावी खिलाड़ियों को यह आभास जरूर होने लगा है कि शिव कुमार चौधरी को सबक सिखाने के उद्देश्य से सुधीर जनमेजा सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के चुनाव के समीकरण बदलने का प्रयास कर सकते हैं । सुधीर जनमेजा अपनी फजीहत को चुपचाप बर्दास्त करते रहेंगे या कुछ करेंगे और करेंगे तो क्या करेंगे - यह देखना दिलचस्प होगा ।