Saturday, September 19, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की पुणे ब्रांच में 'मराठा राजनीति' करने का आरोप झेल रहे एसबी जावरे गैर मराठों की नाराजगी से बचने के लिए यशवंत कसार की उम्मीदवारी की बलि चढ़ाने के लिए अंततः मजबूर हुए

पुणे । यशवंत कसार ने वेस्टर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के लिए प्रस्तुत अपनी उम्मीदवारी को वापस लेकर लोगों को उससे ज्यादा चौंकाया है, जितना कि उन्होंने अपनी उम्मीदवारी को प्रस्तुत करके चौंकाया था । यशवंत कसार की उम्मीदवारी की प्रस्तुति और फिर अब अचानक तरीके से हुई उसकी वापसी ने पुणे में लोगों को चर्चा का मौका इसलिए दिया - क्योंकि दोनों ही 'फैसलों' के पीछे सेंट्रल काउंसिल के सदस्य एसबी जावरे को ही देखा/पहचाना जा रहा है । पुणे में लोगों ने इस बात पर भी बहुत माथापच्ची की कि एसबी जावरे ने आखिर क्या सोच कर यशवंत कसार को रीजनल काउंसिल के लिए उम्मीदवार बनवाया, और अब लोगों के बीच यह सवाल चर्चा में है कि एसबी जावरे ने आखिर क्यों रीजनल काउंसिल के लिए प्रस्तुत यशवंत कसार की उम्मीदवारी को वापस करा दिया ? यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण हैं और चर्चा में हैं क्योंकि चुनावी संदर्भ में न तो एसबी जावरे के सामने जीतने की समस्या है, और न यशवंत कसार के लिए जीतना कोई बड़ी चुनौती थी । उनके विरोधी भी मानते और कहते हैं कि एसबी जावरे यदि घर भी बैठ जाएँ तो भी चुनाव जीत जायेंगे, और यशवंत कसार को भी वह आसानी से चुनाव जितवा लेंगे । तब फिर एसबी जावरे को इतनी नाटक-नौटंकी करने की जरूरत आखिर क्यों पड़ी ? इस 'क्यों' 'क्यों' 'क्यों' का कोई आधिकारिक जबाव लोगों को न तो मिला है, और न ही कभी मिलेगा; इसलिए सारा माजरा 'बिटविन द लाइंस' में ही समझना होगा और इसी कारण से पुणे में चर्चाओं का बाजार खासा गर्म है ।
पुणे में बहुत से लोगों का मानना और कहना है कि एसबी जावरे ने यशवंत कसार की उम्मीदवारी के जरिए दरअसल कई 'काम' करने चाहे थे - उन्होंने एक तरफ तो सर्वेश जोशी और अंबरीश वैद्य के पर कतरने की 'फील्डिंग' लगाई थी, और दूसरी तरफ रीजनल काउंसिल में अपना सीधा दखल रखने/बनाने का मौका देखा था । सर्वेश जोशी के पिछली बार के बहुत से समर्थक चूँकि साथ छोड़ गए हैं, इसलिए उनके सामने इस बार अपनी सीट बचाने की गंभीर चुनौती वैसे ही है; ऐसे में एसबी जावरे को लगा कि यशवंत कसार की उम्मीदवारी के जरिए वह सर्वेश जोशी की संभावनाओं को और धक्का देंगे, तथा सर्वेश जोशी को निपटाने का श्रेय ले लेंगे । इससे पुणे में इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में उनकी 'चौधराहट' और बढ़ेगी । यशवंत कसार के जरिए लेकिन एसबी जावरे ने मुख्य रूप से अंबरीश वैद्य का शिकार करने की योजना बनाई थी । उल्लेखनीय है कि अंबरीश वैद्य को पुणे में इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में एक बड़ी संभावना के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । माना जा रहा है कि रीजनल काउंसिल के चुनाव में उन्हें काफी वोट मिलेंगे, और पुणे ब्रांच के चुनाव के नतीजे को दोहराते हुए वह एक खासी बड़ी जीत प्राप्त करेंगे । एसबी जावरे को इससे तो कोई समस्या नहीं है; किंतु उनकी चिंता इस आशंका से है कि अगली बार यशवंत वैद्य सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवार बनेंगे । एसबी जावरे की तरफ से सेंट्रल काउंसिल के लिए अगली बार शेखर चितले की उम्मीदवारी प्रस्तुत होने की चर्चा है । अगली बार अंबरीश वैद्य कोई चुनौती खड़ी न कर सकें, इसके लिए एसबी जावरे को अंबरीश वैद्य के पर अभी से कतर देना जरूरी लगा ।
इसके लिए एसबी जावरे ने यशवंत कसार को मोहरा बनाया । उन्हें उम्मीद रही कि पुणे ब्रांच के चेयरमैन के रूप में यशवंत कसार युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के वोट लेकर अंबरीश वैद्य को नुकसान पहुँचायेंगे । यशवंत कसार की उम्मीदवारी के चलते अंबरीश वैद्य चुनाव हार जायेंगे, यह उम्मीद तो एसबी जावरे को नहीं रही; लेकिन यह विश्वास उन्हें जरूर रहा कि यशवंत कसार की उम्मीदवारी के चलते अंबरीश वैद्य के वोट कम जरूर होंगे । एसबी जावरे का यही उद्देश्य भी था । उनका आकलन रहा कि रीजनल काउंसिल के चुनाव में अंबरीश वैद्य को यदि ज्यादा बड़ी जीत प्राप्त करने से रोका जा सका, तो पुणे की इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में अंबरीश वैद्य का जो ऑरा बना हुआ है, उसे मिटाया जा सकेगा - और उससे पुणे में इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति पर अपनी पकड़ को यथावत भी बनाया रखा जा सकेगा । एसबी जावरे को विश्वास रहा कि इस सबके चलते पुणे में इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में अंबरीश वैद्य उनके लिए आगे कभी बड़ी चुनौती भी नहीं बन पायेंगे । समझा जाता है कि पुणे में इंस्टीट्यूट की भविष्य की राजनीति की बागडोर को अपने हाथों में सुरक्षित करने के लिए ही एसबी जावरे को अंबरीश वैद्य को अभी से घेरना जरूरी लगा, और इसके लिए ही उन्होंने यशवंत कसार को मोहरा बनाया । 
संजय पवार की सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत उम्मीदवारी ने लेकिन एसबी जावरे की दूसरों की राजनीतिक घेराबंदी करने की 'तैयारी' की हवा निकाल दी । समझा जाता है कि संजय पवार की उम्मीदवारी के जरिए सर्वेश जोशी ने एसबी जावरे को उन्हीं की 'तरकीब' से जबाव देने का प्रयास किया । संजय पवार की उम्मीदवारी से एसबी जावरे की जीत पर तो कोई संकट आया नहीं दिखता है, लेकिन उनके वोटों की संख्या लोगों को अवश्य घटती हुई नजर आ रही है । संजय पवार की उम्मीदवारी से एसबी जावरे को बड़ी चुनौती मिलती भले ही न दिख रही हो - लेकिन संजय पवार की उम्मीदवारी से एसबी जावरे को एक दूसरा बड़ा संकट सामने खड़ा जरूर दिखाई दिया । यह संकट जातीय ध्रुवीकरण से पैदा हो सकने वाली स्थिति का है । चार्टर्ड एकाउंटेंट जैसे प्रोफेशन में जातीय गोलबंदी की कोई भूमिका होनी तो नहीं चाहिए, लेकिन चुनावी खिलाड़ियों द्वारा सफलता के फार्मूले बनाने में जिस तरह जाति का सहारा लिया जाता है, उससे इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में जातीय गोलबंदी की महत्वपूर्ण भूमिका बन गई है । एसबी जावरे ने जिस तरह यशवंत कसार को आगे किया, और उनसे 'निपटने' के लिए जिस तरह संजय पवार आगे आए या किए गए - उससे पुणे के गैर मराठा लोगों के बीच तीखी प्रतिक्रिया हुई । इन तीनों के मराठा होने के कारण गैर मराठा लोगों को लगा कि पुणे में इंस्टीट्यूट की राजनीति क्या सिर्फ मराठा ही करेंगे ? गैर मराठा लोगों के बीच उठे इस सवाल से पैदा हो सकने वाले खतरे को एसबी जावरे ने समय रहते भाँप लिया और तुरंत कार्रवाई करते हुए यशवंत कसार की उम्मीदवारी को वापस करवा दिया । पुणे में सेंट्रल काउंसिल सदस्य के रूप में एसबी जावरे पर एक बड़ा गंभीर आरोप मराठावाद फैलाने का है । 
इसे पुणे ब्रांच में एसबी जावरे द्वारा की गई राजनीति से समझा जा सकता है । पुणे में मराठा वोट मुश्किल से आठ/दस प्रतिशत होंगे, किंतु एसबी जावरे की दिलचस्पीपूर्ण सक्रियता से पुणे ब्रांच की मैनेजमेंट कमेटी में इस बार आठ में से तीन मराठा सदस्य चुन कर आए । इन तीनों को वोट हालाँकि कम मिले -  इन तीनों को मिले वोटों का कुल जोड़ अकेले अंबरीश वैद्य को मिले वोटों से कम रहा । इसके बावजूद एसबी जावरे की राजनीति के चलते इनमें से दो ब्रांच के चेयरमैन बने, और इस वर्ष तो पक्षपात इस हद तक हुआ है कि चेयरमैन और वाइस चेयरमैन के पद मराठा सदस्यों के पास हैं । ब्रांच के चुनाव में सबसे ज्यादा वोट पाने वाले तीन गैर मराठा सदस्यों में से दो को ब्रांच की गतिविधियों में बिलकुल अलग-थलग रखा गया । ब्रांच के चुनाव में सबसे ज्यादा वोट पाने वालों में तीसरे नंबर पर रहीं रेखा धमनकर को पिछली बार चेयरपरसन बनाने के लिए तर्क दिए गए कि उनका ब्रांच में यह दूसरा टर्म है, और उन्हें चेयरपरसन बना कर पुणे में महिला चेयरपरसन बनने/बनाने का इतिहास बनाया जा सकता है - लेकिन एसबी जावरे ने इन तर्कों को यह कह कर खारिज कर दिया कि 'उनकी राजनीति' में रेखा धमनकर के लिए कोई जगह है नहीं । एसबी जावरे की मराठा राजनीति के तहत ही ब्रांच के चुनाव में सबसे ज्यादा वोट पाने वाले अंबरीश वैद्य को तीनों वर्ष पूरी तरह किनारे बैठाए रखा गया । 
पुणे ब्रांच में एसबी जावरे द्वारा की गई इस राजनीति के प्रति गैर मराठा लोगों के बीच नाराजगी के स्वर तो हैं, किंतु वह न तो संगठित हैं और न बहुत मुखर हैं । यशवंत कसार और संजय पवार की अचानक प्रस्तुत हुई उम्मीदवारियों से लेकिन उस नाराजगी के भड़कने का मौका बनता दिखा । संजय पवार की उम्मीदवारी में हालाँकि एसबी जावरे का कोई हाथ नहीं है, किंतु संजय पवार की उम्मीदवारी को चूँकि एसबी जावरे की 'राजनीति' के प्रतिफल के रूप में ही देखा/पहचाना गया है - इसलिए उस नाराजगी का ठीकरा एसबी जावरे के सिर पर फूटने का खतरा नजर आया । एसबी जावरे ने इस खतरे को तुरंत से पहचान लिया, और खतरे को टालने के लिए तुरंत से यशवंत कसार की उम्मीदवारी को वापस कर/करा दिया । एसबी जावरे ने अपनी जान बचाने के लिए यशवंत कसार की उम्मीदवारी की जो बलि ली है, उसने फिलहाल सर्वेश जोशी और अंबरीश वैद्य को बड़ी राहत दी है । 

Thursday, September 17, 2015

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3120 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की चुनावी राजनीति की आड़ में राजा साबू से फायदा उठाने की उम्मीद में प्रदीप मुखर्जी ने अभी तक अपना रवैया स्पष्ट नहीं किया है - और राजीव माहेश्वरी तथा उनके समर्थकों को असमंजस में डाला हुआ है

इलाहाबाद । प्रदीप मुखर्जी के असमंजसभरे रवैये के कारण डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए राजीव माहेश्वरी की उम्मीदवारी का मामला लगातार उलझता ही जा रहा है । राजीव माहेश्वरी के नजदीकियों के अनुसार, प्रदीप मुखर्जी ने राजीव माहेश्वरी की उम्मीदवारी का समर्थन करने का वायदा तो कर लिया है, किंतु राजीव माहेश्वरी से किए गए अपने इस वायदे को लेकर वह सार्वजनिक रूप से कुछ भी कहने से बच रहे हैं । राजीव माहेश्वरी की उम्मीदवारी का झंडा उठा लेने से बचने के लिए पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर प्रदीप मुखर्जी तर्क दे रहे हैं कि अभी बहुत समय है, और अभी से यह सब नहीं शुरू करना चाहिए । राजीव माहेश्वरी के समर्थकों का कहना है कि पिछले वर्षों में तो प्रदीप मुखर्जी बहुत पहले से 'अपने' उम्मीदवार के लिए काम शुरू कर देते रहे हैं, और अब वह देर पर देर होते जाने के बावजूद भी 'बहुत समय' होने का तर्क दे रहे हैं । प्रदीप मुखर्जी के इस दोहरे रवैये में राजीव माहेश्वरी के समर्थकों को 'धोखा' नजर आ रहा है; और उन्हें लग रहा है कि प्रदीप मुखर्जी उनके साथ कोई खेल खेल रहे हैं । डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति की चाबी चूँकि प्रदीप मुखर्जी के पास ही देखी/मानी जाती है, इसलिए प्रदीप मुखर्जी के टालू रवैये ने राजीव माहेश्वरी के नजदीकियों व समर्थकों को चिंता में डाला हुआ है, और उन्हें समझ नहीं आ रहा है कि प्रदीप मुखर्जी आखिरकार खिचड़ी क्या पका रहे हैं ? प्रदीप मुखर्जी के रवैये से निराश व परेशान हो रहे राजीव माहेश्वरी के समर्थकों का हालाँकि यह भी मानना और कहना है कि प्रदीप मुखर्जी के पास राजीव माहेश्वरी की उम्मीदवारी का समर्थन करने के अलावा कोई और विकल्प नहीं है, लेकिन फिर भी प्रदीप मुखर्जी डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद को लेकर अपनी राजनीति अभी तक भी 'घोषित' नहीं कर रहे हैं - इसलिए सारा मामला राजीव माहेश्वरी के लिए ही नहीं, बल्कि दूसरों के लिए भी संदेहास्पद होता जा रहा है ।
राजीव माहेश्वरी के समर्थक यदि यह मान रहे हैं कि प्रदीप मुखर्जी के पास राजीव माहेश्वरी का समर्थन करने के अलावा कोई और विकल्प नहीं है, तो इसके दो कारण हैं : एक कारण तो यह कि राजीव माहेश्वरी उसी रोटरी क्लब इलाहाबाद मिडटाउन के सदस्य हैं, जो प्रदीप मुखर्जी का क्लब है । ऐसे में, प्रदीप मुखजी यदि राजीव माहेश्वरी की उम्मीदवारी का समर्थन नहीं करते हैं, तो क्लब में राजीव माहेश्वरी के नजदीकी प्रदीप मुखर्जी के लिए मुश्किलें खड़ी कर देंगे । दूसरा कारण लेकिन ज्यादा महत्वपूर्ण है, और वह यह कि राजीव माहेश्वरी डिस्ट्रिक्ट में रोटरी इंटरनेशनल के पूर्व प्रेसीडेंट राजेंद्र उर्फ़ राजा साबू के भान्जे के रूप में जाने/पहचाने जाते हैं । राजा साबू का रोटरी में जो रुतबा है, उसे प्रदीप मुखर्जी भी निश्चित रूप से जानते/समझते हैं - और इसलिए वह ऐसा कोई काम नहीं करेंगे, जिससे कि राजा साबू नाराज हों और फिर बदले में वह प्रदीप मुखर्जी के लिए रोटरी के दरवाजे बंद करने में जुटें । राजीव माहेश्वरी के कुछेक समर्थकों का तो दावा है कि राजीव माहेश्वरी की उम्मीदवारी के बारे में 'मामा जी' राजा साबू की प्रदीप मुखर्जी से बात भी हो गई है, और 'मामा जी' ने राजीव माहेश्वरी को आश्वस्त भी कर दिया है । इसके बावजूद, राजीव माहेश्वरी के समर्थकों को प्रदीप मुखर्जी का रवैया ठीक नहीं लग रहा है । माना जा रहा है कि जिन दो कारणों को राजीव माहेश्वरी की 'ताकत' के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है, वही दो कारण वास्तव में उनकी कमजोरी भी हैं । प्रदीप मुखर्जी के नजदीकियों का कहना है कि प्रदीप मुखर्जी इस बात को लेकर बहुत आशंकित हैं कि उनके क्लब में उनके और सतपाल गुलाटी के बाद एक और गवर्नर हो जाए । भविष्य की राजनीति के संदर्भ में वह इसे अपने लिए एक खतरे के रूप में देख रहे हैं । और जहाँ तक राजा साबू वाला ऐंगल है, तो प्रदीप मुखर्जी को राजा साबू की तरफ से अभी यह नहीं बताया गया है कि उनके भान्जे को गवर्नर बनवाने के बदले में राजा साबू उन्हें क्या ईनाम देंगे । प्रदीप मुखर्जी की एक बड़ी शिकायत यह है कि रोटरी में उन्हें वह मुकाम नहीं मिला है, जिसके कि वास्तव में वह हकदार हैं । डिस्ट्रिक्ट्स के नेताओं में प्रदीप मुखर्जी का जलवा ज्यादा बड़ा है, किंतु फिर भी रोटरी में उन्हें वह पहचान और तवज्जो नहीं मिली है, जो कुछेक दूसरे डिस्ट्रिक्ट-नेताओं को मिली है । राजीव माहेश्वरी की उम्मीदवारी में प्रदीप मुखर्जी को राजा साबू के साथ 'सौदा' करके अपनी इस शिकायत को दूर करने का बढ़िया मौका मिला है, और इस मौके का पूरा पूरा फायदा उठाने के लिए ही उन्होंने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की चुनावी लड़ाई को लेकर अपने पत्ते अभी तक छिपाए हुए हैं और कुछ भी कहने से बच रहे हैं ।
उल्लेखनीय है कि रोटरी की राजनीति में प्रदीप मुखर्जी को कल्याण बनर्जी व शेखर मेहता के 'आदमी' के रूप में देखा/पहचाना जाता है । इनके सहारे प्रदीप मुखर्जी अपने काम तो कराते रहे हैं - जैसे एक बड़ा काम उन्होंने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद का चुनाव हारे हुए सतपाल गुलाटी को गवर्नर 'बनवाने' का किया - लेकिन रोटरी की बड़ी 'बैठक' में उनकी खास पहचान नहीं बन सकी है । प्रदीप मुखर्जी को इस बात का बड़ा मलाल है । राजीव माहेश्वरी की उम्मीदवारी में उन्हें राजा साबू के साथ तार जोड़ने का जो अवसर दिख रहा है, वह अवसर उन्हें उनका मलाल दूर करने का संकेत भी दे रहा है । समस्या लेकिन यहाँ यह है कि राजा साबू का लोगों से काम कराने का अपना स्टाइल है - वह खुद सामने आने की बजाए अपने 'दूतों' से माहौल बनवाते हैं । राजीव माहेश्वरी की उम्मीदवारी के मामले में भी उन्होंने माहौल तो बनवा दिया है; और उम्मीद में हैं कि प्रदीप मुखर्जी अब उनके 'काम' में जुट जायेंगे । प्रदीप मुखर्जी किंतु चाहते हैं कि राजीव माहेश्वरी की उम्मीदवारी को लेकर राजा साबू उनसे सीधी बात करें, ताकि उन्हें भी समझने का मौका मिले कि राजीव माहेश्वरी के लिए काम करके आखिर उन्हें क्या मिलेगा ? प्रदीप मुखर्जी की इस चाहत को समझने वाले लोगों का कहना है कि प्रदीप मुखर्जी ने लगता है कि राजा साबू को ठीक से समझा/पहचाना नहीं है, और इसलिए ऐसी चाहत कर रहे हैं, जिसका पूरा होना संभव नहीं है । दूसरे लोग भले ही ऐसा सोच और कह रहे हों, किंतु प्रदीप मुखर्जी को विश्वास है कि राजीव माहेश्वरी की उम्मीदवारी को लेकर राजा साबू अवश्य ही उनसे सीधी बात करेंगे । ऐसा हो - इसीलिए प्रदीप मुखर्जी ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की राजनीति के संदर्भ में अभी तक अपना रवैया स्पष्ट नहीं किया है - और राजीव माहेश्वरी तथा उनके समर्थकों को वह असमंजस में डाले हुए हैं । 
प्रदीप मुखर्जी को यह विश्वास इसलिए है क्योंकि वह जानते हैं कि अपने 'स्टाइल' के चक्कर में राजा साबू को अपने डिस्ट्रिक्ट में और रोटरी में भारी फजीहत का शिकार होना पड़ा है । उल्लेखनीय है कि राजा साबू के डिस्ट्रिक्ट - रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3080 में पिछले रोटरी वर्ष में हुए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में राजा साबू के इशारे और उनके दूतों के प्रयासों के बावजूद नोमीनेटिंग कमेटी में अधिकृत उम्मीदवार के रूप में जब टीके रूबी को चुन लिया गया, तो राजा साबू ने इस फैसले को बदलने के लिए तिकड़में लगाईं । करीब पाँच महीने तक पर्दे के पीछे से राजा साबू ने जो तिकड़में लगाईं, वह सब एक एक करके फेल होती गईं । पाँच महीनों में अपनी भारी थुक्का-फजीहत कराने के बाद राजा साबू को समझ में आया कि पर्दे के पीछे रह कर काम नहीं बनेगा, और तब वह अपने फौज-फाटे के साथ पर्दे के सामने आने के लिए मजबूर हुए । खुली बेशर्मीभरी 'बेईमानी' के साथ कार्रवाई करते हुए राजा साबू अपना मनमाफिक फैसला करवाने में तो अंततः सफल हुए हैं, लेकिन इस सफलता ने उनके 'ऑरा' को धूल में मिला दिया है । (इस बारे में जो कोई विस्तार से जानना चाहे, वह 'रचनात्मक संकल्प' की पिछले करीब छह महीनों की रिपोर्ट्स को देख सकता है ।) इस मामले में, कई लोगों को लगता है कि राजा साबू यदि समय रहते माहौल को ठीक से परख लेते और समझ लेते कि पर्दे के पीछे रह कर उनका काम नहीं बनेगा, और उन्हें अपना काम बनाने के लिए पर्दे के सामने आना ही पड़ेगा, तो संभव है कि उनकी इतनी फजीहत न होती । इसी बिना पर प्रदीप मुखर्जी को विश्वास है कि राजीव माहेश्वरी की उम्मीदवारी के संदर्भ में राजा साबू ज्यादा देर तक इंतजार नहीं करेंगे, तथा जल्दी ही पर्दे के सामने आने के लिए मजबूर होंगे - और तब वह राजा साबू के साथ सीधी 'बात' कर लेंगे । प्रदीप मुखर्जी को ही नहीं, दूसरे कई लोगों को भी लगता है कि राजीव माहेश्वरी की उम्मीदवारी के संदर्भ में राजा साबू 'कंस मामा' नहीं, बल्कि 'शकुनि मामा' साबित होंगे, तथा अपने भान्जे को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर (नॉमिनी) पद की गद्दी दिलवाने के लिए कुछ भी कसर नहीं छोड़ेंगे । इसी का इंतजार करते हुए प्रदीप मुखर्जी ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की चुनावी राजनीति में अपनी भूमिका को लेकर अभी तक चुप्पी साधी हुई है, और असमंजस बनाया हुआ है । 

Wednesday, September 16, 2015

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3080 में आयोजित 'स्वच्छ RID 3080' कार्यक्रम में जुटे लोगों ने राजा साबू एण्ड कंपनी की मनमानियों से निपटने के तौर-तरीकों पर विचार-विमर्श करते हुए जिस तरह से टीके रूबी की लड़ाई में सहयोग व समर्थन घोषित किया, उससे इंटरनेशनल डायरेक्टर मनोज देसाई का डिस्ट्रिक्ट का कार्यक्रम विवाद में फँसा

पंचकुला । 'स्वच्छ RID 3080' में डिस्ट्रिक्ट के प्रमुख सदस्यों के जो तेवर देखने/सुनने को मिले, उसके बाद 27 सितंबर की प्रस्तावित इंटरसिटी में इंटरनेशनल डायरेक्टर मनोज देसाई को दिए गए निमंत्रण को लेकर गवर्नर कार्यालय में हड़कंप सा मच गया है । गवर्नर कार्यालय को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर डेविड हिल्टन के कुछेक शुभचिंतकों ने मनोज देसाई को दिए गए निमंत्रण को वापस लेने का सुझाव दिया है । इस सुझाव के पीछे उनका तर्क है कि पिछले रोटरी वर्ष में चुने जाने वाले डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद को लेकर अभी तक जिस तरह की राजनीति हो रही है, और डिस्ट्रिक्ट के लोगों द्वारा लिए गए फैसले को पलट कर कॉलिज ऑफ गवर्नर्स ने जिस तरह से अपना फैसला डिस्ट्रिक्ट पर थोपा है - उसके खिलाफ लोगों के बीच भारी नाराजगी है; और लोगों की यह नाराजगी मनोज देसाई के सामने यदि फूटी तो डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में डेविड हिल्टन की बड़ी बदनामी होगी । डेविड हिल्टन के शुभचिंतकों का कहना है कि कॉलिज ऑफ गवर्नर्स के नेता लोग डेविड हिल्टन को इस्तेमाल कर रहे हैं, और लोगों के बीच उन्हें बदनाम करवा रहे हैं, और इस तरह उनके गवर्नर-काल को खराब कर रहे हैं - डेविड हिल्टन पता नहीं किस लालच में इस्तेमाल हो रहे हैं और बलि का बकरा बन रहे हैं । इंटरसिटी के लिए मनोज देसाई को दिए गए निमंत्रण को वापस लेने के सुझाव की भनक कॉलिज ऑफ गवर्नर्स को मिली, तो वह भी सक्रिय हुए और उन्होंने डेविड हिल्टन को हिदायत दी कि इस सुझाव को मान मत लेना । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर डेविड हिल्टन से तो इनका कहना यह है कि इंटरनेशनल डायरेक्टर मनोज देसाई के व्यस्त कार्यक्रम में खासी मुश्किल से तो समय मिला है, उसे यदि अभी निरस्त कर दिया तो फिर आगे पता नहीं कि उनका समय मिल भी सकेगा या नहीं; लेकिन दूसरे लोगों से इन्होंने कहा है कि वह चाहते हैं कि मनोज देसाई के सामने 'दंगा' हो, ताकि वह विरोधियों को बदनाम कर सकें । कॉलिज ऑफ गवर्नर्स के अधिकतर लोगों को अब डिस्ट्रिक्ट की, रोटरी की और यहाँ तक की खुद अपनी बदनामी की कोई चिंता नहीं रह गई है । उनका कहना है कि रोटेरियंस और रोटरी पदाधिकारियों के बीच उन्हें जितना 'नंगा' होना था, वह हो चुके; अब इससे ज्यादा और क्या होंगे ? अपने यहाँ एक मशहूर कहावत भी है कि - 'नंग बड़ा परमेश्वर से ।'
सो, डिस्ट्रिक्ट के कॉलिज ऑफ गवर्नर्स के नेता लोगों को लगता है कि इंटरनेशनल डायरेक्टर मनोज देसाई के सामने डिस्ट्रिक्ट के लोग यदि उनकी पोल खोलेंगे भी, तो मनोज देसाई क्या कर लेंगे ? कॉलिज ऑफ गवर्नर्स के नेताओं का मानना और कहना है कि मनोज देसाई को सब पता है कि डिस्ट्रिक्ट 3080 में, जो पूर्व इंटरनेशनल प्रेसीडेंट राजेंद्र उर्फ़ राजा साबू के डिस्ट्रिक्ट के रूप में जाना/पहचाना जाता है, क्या चल रहा है; उन्हें यह भी पता है कि यहाँ जो कुछ भी हो रहा है, वह सब राजा साबू के दिशा-निर्देशन में ही हो रहा है - ऐसे में मनोज देसाई बेचारे क्या करेंगे ? इनका कहना है कि मनोज देसाई इस बात को भूले थोड़े ही होंगे कि इंटरनेशनल डायरेक्टर बनने के लिए वह राजा साबू की मदद पाने के लिए कैसे चक्कर लगाया करते थे, क्योंकि यह कोई बहुत पुरानी बात थोड़े ही है । अब इस बात को याद रखते हुए मनोज देसाई किस मुँह से यहाँ राजा साबू के दिशा-निर्देशन में जो चल रहा है, उस पर कुछ कह पायेंगे । राजा साबू के 'प्रताप' से चौंधियाएँ कॉलिज ऑफ गवर्नर्स के नेता ही नहीं, दूसरे कई लोग भी विश्वास के साथ दावा कर रहे हैं कि राजा साबू के दिशा-निर्देशन में पूरी चुनावी प्रक्रिया का जिस तरह से मजाक बना दिया गया है, उस पर जब इंटरनेशनल प्रेसीडेंट केआर रवींद्रन ही कोई कार्रवाई करने की हिम्मत नहीं कर पा रहे हैं, तो फिर बेचारे मनोज देसाई ही क्या करेंगे ? कॉलिज ऑफ गवर्नर्स के नेताओं को मनोज देसाई की तरफ से कोई कार्रवाई होने का डर नहीं है; उन्हें डर सिर्फ इस बात का है कि उनके डिस्ट्रिक्ट में जो हो रहा है, उसके कारण मनोज देसाई कहीं उनके डिस्ट्रिक्ट में आने से इंकार न कर दें । इंटरनेशनल प्रेसीडेंट केआर रवींद्रन चूँकि पहले एक बार उनके डिस्ट्रिक्ट में आने से इंकार कर चुके हैं, इसलिए राजा साबू एण्ड कंपनी नहीं चाहती है कि 27 सितंबर के कार्यक्रम में इंटरनेशनल डायरेक्टर मनोज देसाई के आने में कोई गड़बड़ी हो । 
'स्वच्छ RID 3080' के आयोजन ने राजा साबू एण्ड कंपनी को और डरा दिया है । रोटरी क्लब हिमालयन रेंजेस मनसा देवी ने यह आयोजन किया तो एनवायरनमेंट प्रोजेक्ट के रूप में; लेकिन इस आयोजन में जिस संख्या और जोश के साथ लोग शामिल हुए, और उन्होंने डिस्ट्रिक्ट के 'बिगड़ते वातावरण' पर जिस तरह खुल कर चर्चा की - उससे साबित हुआ है कि डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच राजा साबू एण्ड कंपनी की हरकतों के खिलाफ बेहद नाराजगी और विरोध है । यह आयोजन औपचारिक रूप से था तो नष्ट होते पर्यावरण को बचाने के उपायों पर विचार करने के लिए, और मंच से इसी संदर्भ में बातें भी हुईं; किंतु अनौपचारिक रूप से लोगों के बीच जो बातें हुईं, वह राजा साबू एण्ड कंपनी के लिए खतरे की घंटी बजाती हैं । यह आयोजन जिस रोटरी क्लब हिमालयन रेंजेस मनसा देवी ने किया, वह चूँकि टीके रूबी का क्लब है - इसलिए राजा साबू एण्ड कंपनी के लोगों ने इस आयोजन के खिलाफ डिस्ट्रिक्ट में कुप्रचार भी किया और डिस्ट्रिक्ट में यह संदेश भी दिया कि जो कोई भी इस आयोजन में जायेगा, राजा साबू उससे नाराज हो जायेंगे । इसके बावजूद अच्छी खासी संख्या में लोग इस आयोजन में जुटे । आयोजन में आधिकारिक रूप से बिगड़ते पर्यावरण को बचाने को लेकर बातें हुईं, तो आधिकारिक कार्यक्रम समाप्त होने के बाद लोगों की अनौपचारिक बातचीत में राजा साबू एण्ड कंपनी की मनमानियों से निपटने के तौर-तरीकों पर विचार-विमर्श हुआ और टीके रूबी की लड़ाई में खुले तौर पर सहयोग व समर्थन घोषित किए गए । 
'स्वच्छ RID 3080' में लोगों के जो तेवर दिखे, उसके कारण ही 27 सितंबर को हो रही इंटरसिटी में मनोज देसाई की उपस्थिति को लेकर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर कार्यालय में हलचल मची । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर डेविड हिल्टन के शुभचिंतकों को लगता है कि मनोज देसाई के सामने राजा साबू एण्ड कंपनी की मनमानियों से परेशान लोगों ने यदि कोई बबाल किया तो आरोप उन पर ही आयेगा कि वह डिस्ट्रिक्ट गवर्नर होते हुए एक कार्यक्रम ठीक से आयोजित नहीं कर पाए । डेविड हिल्टन और उनके नजदीकी इस बात को लेकर पहले से ही परेशान हैं कि पिछले रोटरी वर्ष में होने वाले डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव के झमेले के कारण उनका अपना गवर्नर-काल बर्बाद होता जा रहा है । राजा साबू एण्ड कंपनी के नेताओं ने उन्हें भरोसा दिया/दिलाया था कि एक बार चुनावी नतीजा आ जाए, फिर उसके बाद हालात अपने आप ठीक हो जायेंगे । चुनावी नतीजा आने के बाद किंतु हालात और बिगड़ते नजर आ रहे हैं । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर डेविड हिल्टन को जिस तरह टीके रूबी तथा उनके क्लब के खिलाफ अदालत में कैविएट फाइल करने के लिए मजबूर किया गया, उससे खुद डेविड हिल्टन और उनके शुभचिंतक परेशान हैं । दरअसल डेविड हिल्टन के अदालत जाने की पहल करने से डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की चुनावी लड़ाई में अब एक नया अध्याय जुड़ गया है, जिसमें मुसीबत और फजीहत का शिकार सिर्फ डेविड हिल्टन को ही होना है । डेविड हिल्टन को राजा साबू एण्ड कंपनी की तरफ से अब एक नया फरमान मिल गया है, जिसमें 27 सितंबर को आयोजित हो रही इंटरसिटी में इंटरनेशनल डायरेक्टर मनोज देसाई की उपस्थिति को हर हालत में संभव बनाने के लिए प्रयास करने को कहा गया है । डेविड हिल्टन के शुभचिंतकों ने लेकिन उन्हें सुझाव दिया है कि कुछ भी करके उक्त इंटरसिटी में मनोज देसाई के आने को स्थगित करवाओ । 

Tuesday, September 15, 2015

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में सतीश सिंघल से अपने बिगड़े संबंध सुधार कर डिस्ट्रिक्ट में अपनी राजनीतिक हैसियत बनाए रखने के लिए रमेश अग्रवाल ने क्या जेके गौड़ और शरत जैन को काम पर लगाया है

नोएडा । सतीश सिंघल अपने नजदीकियों को आजकल खुशी खुशी यह बताने में खूब व्यस्त हैं कि जो जेके गौड़ और शरत जैन पहले उन्हें कोई भाव नहीं देते थे, अब लगातार उनकी खुशामद में लगे हुए हैं । जेके गौड़ और शरत जैन के इस बदले रवैये को सतीश सिंघल डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव को सुभाष जैन और दीपक गुप्ता के बीच तय होते दिख रहे मुकाबले के नतीजे के रूप में देख/पहचान रहे हैं । सतीश सिंघल का कहना है कि उनको दीपक गुप्ता का समर्थन करने से रोकने के लिए ही जेके गौड़ और शरत जैन ने उनके प्रति अपना रवैया बदला है । दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी खुद दीपक गुप्ता का कितना भला करेगी, यह तो अभी नहीं पता - किंतु दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी ने सतीश सिंघल का भला जरूर कर दिया है । उल्लेखनीय है कि सतीश सिंघल इस बात से बहुत परेशान और निराश रहे हैं कि जेके गौड़ और शरत जैन उन्हें उचित तवज्जो नहीं देते हैं, और उन्हें अलग-थलग करने/रखने में लगे रहते हैं । जेके गौड़ और शरत जैन का कहना रहा है कि सतीश सिंघल की समस्या यह रही है कि वह इस तथ्य को मानने/समझने को तैयार ही नहीं होते हैं कि वह डिस्ट्रिक्ट के प्रोटोकॉल में उनके एक जूनियर पार्टनर हैं, और उन्हें जूनियर पार्टनर के रूप में रहना है - वह उनके 'बाप' बनने की कोशिश करते हैं; अब 'बाप' उन्हें क्यों बनाएँ ? सतीश सिंघल के बारे में और भी कई लोगों की शिकायत रही है कि सतीश सिंघल को यदि ऊँगली पकड़ाओ तो वह पहुँचा पकड़ लेते हैं । सतीश सिंघल को लगता है, और वह समय समय पर लोगों के बीच इसे कहते भी रहे हैं कि उन्हें जेके गौड़ और शरत जैन से ज्यादा रोटरी आती है । यह बात मानने और कहने तक तो ठीक है, समस्या लेकिन तब होती है जब सतीश सिंघल इसे दिखाने/जताने पर उतर आते हैं । जेके गौड़ और शरत जैन का कहना रहा है कि कई मौकों पर उन्होंने जब देखा/पाया कि सतीश सिंघल ने इस बात को भूलकर कि रोटरी प्रोटोकॉल में वह उनके जूनियर हैं, उन पर हावी होने की कोशिश की - तो उन्होंने सतीश सिंघल से बच कर रहना शुरू कर दिया । सतीश सिंघल ने जेके गौड़ और शरत जैन के इस रवैये को यह कह कर राजनीतिक रंग दिया कि उन्हें अलग-थलग करने की इनकी कोशिश वास्तव में रमेश अग्रवाल का हुक्म बजाने की इनकी मजबूरी है । सतीश सिंघल ने रमेश अग्रवाल के प्रति अपने विरोध को हमेशा ही मुखर रूप में प्रकट किया है । रमेश अग्रवाल ने उनके चुनाव में चूँकि उनके प्रतिस्पर्द्धी प्रसून चौधरी का सहयोग/समर्थन किया था, इसलिए सतीश सिंघल का रमेश अग्रवाल के प्रति मुखर विरोध है और कई जगह उन्होंने कहा भी है कि रोटरी में उनकी राजनीति का एकमात्र उद्देश्य रमेश अग्रवाल की राजनीति की हवा बिगाड़ना ही है । रमेश अग्रवाल की राजनीति की हवा सतीश सिंघल जब बिगाड़ देंगे, वह तो तब देखेंगे - अभी तक तो लेकिन रमेश अग्रवाल ने सतीश सिंघल की हवा बिगाड़ी हुई है । सतीश सिंघल जब खुद मानते और कहते/बताते हैं कि जेके गौड़ और शरत जैन उन्हें जो उचित सम्मान नहीं देते हैं, उसके पीछे रमेश अग्रवाल हैं - तो यह एक तरह से सतीश सिंघल की स्वीकारोक्ति ही है कि डिस्ट्रिक्ट में इस समय रमेश अग्रवाल की ही तूती है । रमेश अग्रवाल की राजनीति की हवा बिगाड़ने की बातें करने वाले सतीश सिंघल को यूँ तो जेके गौड़ व शरत जैन जैसे रमेश अग्रवाल के घोषित 'आदमियों' से किसी भी तरह के अच्छे व्यवहार की उम्मीद भी नहीं रखना चाहिए; सतीश सिंघल लेकिन इनसे न सिर्फ अच्छे व्यवहार की उम्मीद करते रहे - बल्कि उम्मीद पूरी न होने पर शिकायत भी करते रहे हैं । जेके गौड़ और शरत जैन ने उनकी इस छटपटाहट का खूब मजा भी लिया । जेके गौड़ ने तो सतीश सिंघल की जैसी हालत की, उसकी सतीश सिंघल ने तो कल्पना भी नहीं की होगी । हालाँकि इसके लिए सतीश सिंघल ने ही उन्हें मजबूर किया । जेके गौड़ के साथ समस्या दरअसल यह हुई कि वह डिस्ट्रिक्ट गवर्नर तो बन गए, लेकिन डिस्ट्रिक्ट गवर्नर की ठसक नहीं बना पाए । उनकी बदकिस्मती यह रही कि मुकेश अरनेजा, रमेश अग्रवाल और अशोक अग्रवाल जैसे जिन लोगों पर वह निर्भर हुए, उन्होंने ही लोगों के बीच उनकी नकारात्मक छवि बनाई और तरह तरह से जेके गौड़ को 'शिकारपुर का' साबित करने की कोशिश की । उन्होंने तो ऐसा इसलिए किया, ताकि वह अपने आपको लोगों की नजरों में ऊँचा दिखा सकें; जेके गौड़ ने लेकिन उन्हें ऐसा करने दे कर अपना नुकसान किया । लोगों के बीच जेके गौड़ की जैसी नकारात्मक पहचान बनी, वैसी पहचान उनसे पहले शायद ही किसी गवर्नर की बनी हो । जेके गौड़ की इस पहचान का फायदा उठाने की सतीश सिंघल ने कोशिश की । सतीश सिंघल ने लेकिन मामले का एक ही पहलू देखा, दूसरे पहलू को उन्होंने अनदेखा ही कर दिया - उन्होंने यह तो देखा कि जेके गौड़ की छवि 'एक बेचारे गवर्नर' की है, लेकिन वह यह नहीं देख पाए कि जेके गौड़ उतने बेचारे हैं नहीं जितना कि उन्हें समझा जाता है । जेके गौड़ को बदला लेना भी खूब आता है । जेके गौड़ ने मुकेश अरनेजा जैसे तुर्रमखाँ को जिस तरह खुड्डे लाइन लगा दिया है, वह भी एक दिलचस्प नजारा है । सतीश सिंघल ने जेके गौड़ की बेचारगी देखी, तो तुरंत उन पर सवार होने के लिए तैयार हो गए । जेके गौड़ ने भी बदले में उन्हें ऐसी पटखनी दी कि फिर वह अपने नजदीकियों के बीच शिकायत करने लायक ही बचे कि जेके गौड़ उन्हें पर्याप्त इज्जत नहीं दे रहे हैं । किसी किसी से उन्हें सुनने को भी मिला कि जेके गौड़ गवर्नर हैं, पहले उन्हें उचित इज्जत दो तो फिर उनसे उचित इज्जत मिलने की उम्मीद करो । सतीश सिंघल ने रमेश अग्रवाल और उनके जेके गौड़ व शरत जैन जैसे 'आदमियों' से निपटने के लिए राजनीतिक तरीका अपनाया और मुकेश अरनेजा के साथ हाथ मिला लिया । डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति को रमेश अग्रवाल और मुकेश अरनेजा के बीच शक्ल ग्रहण करते देखा जा रहा है । रमेश अग्रवाल को सुभाष जैन की उम्मीदवारी के पीछे पहचाना जा रहा है, तो मुकेश अरनेजा को अशोक गर्ग-प्रवीन निगम-दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के पीछे मौका खोजते/बनाते हुए देखा जा रहा है । मुकेश अरनेजा जब पूरी तरह अशोक गर्ग की उम्मीदवारी के साथ थे, तब सतीश सिंघल भी अशोक गर्ग की वकालत कर रहे थे । मुकेश अरनेजा और सतीश सिंघल की वकालत के बावजूद अशोक गर्ग की उम्मीदवारी के प्रति लोगों के बीच समर्थन जुटता हुआ जब नहीं दिखा, तब मुकेश अरनेजा ने दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी को उकसाया । सतीश सिंघल के लिए तुरंत से तो अशोक गर्ग का साथ छोड़ना मुश्किल हुआ, किंतु अशोक गर्ग को जब खुद अपनी ही उम्मीदवारी के प्रति उत्साह छोड़ते हुए देखा गया तो सतीश सिंघल के लिए भी फैसला करना जरूरी हुआ । रमेश अग्रवाल से निपटने की अपनी शपथ को याद करते हुए, सतीश सिंघल के सामने दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थन की तरफ ही आना था और वह दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी की तरफ आते हुए दिखे भी हैं; हालाँकि अभी वह ज्यादा खुली वकालत करने से बच रहे हैं । अशोक गर्ग के खुद ही पीछे हटने से और प्रवीन निगम के ढीले-ढाले रवैये से डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की चुनावी लड़ाई जिस तरह सुभाष जैन और दीपक गुप्ता के बीच होते मुकाबले में तब्दील होती नजर आ रही है, उसमें सतीश सिंघल का यह दावा महत्वपूर्ण संकेत देता हुआ तो लग रहा है कि उनको दीपक गुप्ता का समर्थन करने से रोकने के लिए ही जेके गौड़ और शरत जैन ने उनके प्रति अपना रवैया बदला है । सतीश सिंघल को विश्वास है कि इन दोनों का उनके प्रति जो रवैया बदला है - वह अवश्य ही रमेश अग्रवाल के कहने से बदला है । इससे सतीश सिंघल को यह विश्वास तो हो चला है कि आखिरकार रमेश अग्रवाल ने भी उनकी राजनीतिक ताकत को पहचान लिया है और डिस्ट्रिक्ट में अपनी राजनीतिक हैसियत बनाए रखने के लिए उनकी शरण में आने के लिए मजबूर हुए हैं । हालाँकि यह अभी उन्होंने स्पष्ट नहीं किया है कि रमेश अग्रवाल ने पिछले रोटरी वर्ष में उन्हें हरवाने के लिए जो काम किए थे, उसके लिए वह उनसे माफी माँगेंगे तो वह रमेश अग्रवाल को माफ़ कर देंगे या नहीं ?

Sunday, September 13, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के नॉर्दर्न रीजन में सेंट्रल काउंसिल के चुनावी संदर्भ में हंसराज चुग क्या एक बार फिर राज चावला की 'किस्मत' का शिकार होंगे ?

नई दिल्ली । हरित अग्रवाल और उनके समर्थकों ने जीएमसीएस में छात्रों को घटिया खाना परोसने के मामले की आड़ में राज चावला के लिए जो गड्ढा खोदना शुरू किया था, उसमें खुद हरित अग्रवाल और उनके समर्थकों के फँस जाने से राज चावला की किस्मत के चर्चे लोगों के बीच चल पड़े हैं - और इन चर्चों ने हंसराज चुग तथा उनके समर्थकों की नींद हराम कर दी है । हंसराज चुग तथा उनके समर्थकों को दरअसल डर यह हुआ है कि राज चावला की किस्मत क्या एक बार फिर कहीं हंसराज चुग का काम तो नहीं बिगाड़ेगी ? उनके बीच यह डर रीजनल काउंसिल के चेयरमैन पद को पाने को लेकर चले घटनाचक्र को याद करने के कारण पैदा हुआ । उल्लेखनीय है कि नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में मौजूदा वर्ष के चेयरमैन पद को लेकर जो राजनीतिक गोटियाँ बिछना शुरू हुईं थीं, उसमें राज चावला का तो कहीं नाम ही नहीं था - उन्हें तो हंसराज चुग के समर्थन में 'देखा' और प्रचारित किया जा रहा था । हंसराज चुग चेयरमैन पद के एक मजबूत उम्मीदवार के रूप में देखे/पहचाने जा रहे थे । चेयरमैन पद को लेकर होने वाली चर्चाओं में तो छोड़िए, अफवाहों तक में राज चावला का जिक्र नहीं था । चेयरमैन पद के लिए राज चावला ने जब सभी को अचंभित करते हुए अचानक से अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत की, तब भी किसी ने भी उनकी उम्मीदवारी को गंभीरता से नहीं लिया । दूसरे उन्हें क्या गंभीरता से लेते, खुद उन्होंने अपनी उम्मीदवारी को गंभीरता से नहीं लिया था; उन्हें कहते/बताते सुना गया था कि वह तो बस यूँ ही उम्मीदवार बनने का सुख लेना चाहते हैं, इसलिए उम्मीदवार बन गए हैं । चेयरमैन पद को लेकर जो भी तीन-तिकड़में हो रही थीं, जो भी चाल-बाजियाँ चल रहीं थीं, जो भी लॉबिंग हो रही थीं - उनमें किसी को भी राज चावला की दाल गलती हुई नहीं नजर आ रही थी । लेकिन नॉर्दर्न इंडिया रीजन की राजनीति के सारे 'पंडितों' का गणित तब फेल हो गया, जब दाल राज चावला की गली पाई गई । चेयरमैन पद पर राज चावला की जीत को राज चावला की नहीं, 'राज चावला की किस्मत' की जीत के रूप में देखा और प्रचारित किया गया । 
हंसराज चुग तथा उनके समर्थकों को डर यही हुआ है कि राज चावला की किस्मत कहीं सेंट्रल काउंसिल के चुनाव में भी वही कहानी तो नहीं दोहरायेगी ? सेंट्रल काउंसिल के चुनाव के संदर्भ में राज चावला की किस्मत का डर हंसराज चुग और उनके समर्थकों को इसलिए है क्योंकि सेंट्रल काउंसिल के चुनाव के संदर्भ में हंसराज चुग और राज चावला को एक दूसरे के साथ जोड़ कर ही देखा जा रहा है, और माना जा रहा है कि इन दोनों में से कोई एक ही सेंट्रल काउंसिल में जायेगा । लोगों के बीच की चर्चाओं में राज चावला के मुकाबले हंसराज चुग का पलड़ा भारी माना/देखा जा रहा है । हंसराज चुग की जीत का दावा करने वाले तो फिर भी मिल/दिख जायेंगे, लेकिन राज चावला की जीत का दावा उनके समर्थक व सहयोगी तक करने में हिचक रहे हैं । यानि कहानी - अभी तक - ठीक वैसी ही है, जैसी कि वह रीजनल काउंसिल के चेयरमैन पद के चुनाव से पहले थी । हालाँकि इस बात पर किसी का ध्यान था नहीं । किंतु हरित अग्रवाल के समर्थकों द्वारा जीएमसीएस के मुद्दे पर घेरे जाने के प्रयासों का मुँह जिस तरह से राज चावला की बजाए हरित अग्रवाल की तरफ ही मुड़ गया है, उसमें जादुई चमत्कार का सा जो आभास मिला है - उससे राज चावला की किस्मत की चर्चा ने लोगों के बीच पुनः जोर पकड़ लिया है । उल्लेखनीय है कि हरित अग्रवाल के समर्थकों ने राज चावला को निशाना बनाते हुए जीएमसीएस के खाने को लेकर तूफान खड़ा किया हुआ था; रोज बातों व तथ्यों को दोहराते हुए राज चावला को कोसा जा रहा था । लेकिन जैसे ही भेद खुला कि जीएमसीएस कमेटी के चेयरमैन तो हरित अग्रवाल हैं, और वहाँ खाने की क्वालिटी तथा उसकी व्यवस्था देखने की जिम्मेदारी तो उनकी है - वैसे ही जीएमसीएस के मामले में हरित अग्रवाल के समर्थकों के मुँह पर ताले पड़ गए । मजे की बात यह रही कि इस मामले में राज चावला ने एक शब्द नहीं कहा, और फिर भी वह तो 'हमले' में साफ बच निकले और हमलावर ही लहूलुहान हो गए ।  
यह क्या किस्मत की बात है ? कई लोगों के लिए इसका जबाव 'हाँ' है, तो राज चावला के नजदीकियों का जबाव 'ना' है - उनका तर्क है कि किस्मत भी उनका साथ देती है, जो सही तरीके से अपना काम करते हैं । दूसरे लोगों का भी मानना और कहना है कि जीएमसीएस मामले में हरित अग्रवाल और उनके समर्थकों की फजीहत इसलिए नहीं हुई कि उनकी किस्मत खराब थी; उनकी फजीहत इसलिए हुई कि उन्होंने जो मुद्दा उठाया, उसमें 'बेईमानी' की - और उन्हें अपनी ही बेईमानी का फल मिला । राज चावला के समर्थकों का कहना है कि राज चावला बहुत आक्रामक तरीके से और बहुत शोर मचा कर काम करने वाले व्यक्ति नहीं हैं; वह चुपचाप तरीके से स्थिति को भाँपते हैं और अपने लिए मौका बनाते हैं; उनकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि प्रतिकूल हालात में भी वह उम्मीद नहीं छोड़ते हैं । राज चावला के नजदीकी उनके बारे में एक बड़ी मजेदार बात बताते हैं कि सड़क पर उनकी गाड़ी के सामने यदि कोई जानवर आ जाता है, तो वह उसे हटाने के लिए हॉर्न नहीं बजाते हैं; वह कहते हैं कि हॉर्न के शोर से जानवर असहज होगा तथा ज्यादा परेशान करेगा, इसलिए चुप रहने में ही फायदा है; जानवर खुद बहुत संवेदनशील होता है, वह खुद परेशानी महसूस कर रहा होता है, और अपने लिए रास्ता खोज कर निकल लेता है । राज चावला के समर्थकों का कहना है कि सड़क पर अपनाए जाने वाले इसी फार्मूले को उन्होंने रीजनल काउंसिल के चेयरमैन बनने के लिए भी आजमाया था, और बिना कोई शोर-शराबा किए उन्होंने अपनी तरकीब लगाई और चेयरमैन पद पा लिया । 
चेयरमैन 'बनने' के बाद भी राज चावला ने इसी फार्मूले को अपनाया हुआ है - और इसी फार्मूले के चलते वह 'बचे' भी हुए हैं । उनकी राह में मुसीबतें कम नहीं पैदा की गईं - चेयरमैन 'बनने' के बाद भी, चेयरमैन घोषित होने के लिए उन्हें इंतजार करना पड़ा; नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में इससे पहले शायद ही किसी चेयरमैन के साथ ऐसा हुआ हो । जाहिर है कि 'बनने' और 'घोषित' होने के बीच उन्हें न बनने देने के खूब प्रयास हुए, किंतु जो कामयाब नहीं हो सके । राज चावला चेयरमैन घोषित भी हो गए, तो उन्हें चेयरमैन के अधिकार नहीं लेने दिए गए । अधिकार मिले तो उनके हर फैसले में टाँग अड़ाने के तरीके अपनाए गए । काउंसिल में उनके साथियों द्वारा सामने कुछ तथा पीछे कुछ और कहने के जरिए उनके फैसलों पर विवाद खड़ा करने के प्रयास हुए हैं । काउंसिल में उनके सहयोगी/साथी हरित अग्रवाल ने अपने समर्थकों के जरिए अपना 'पाप' उनके सिर मढ़ने की जो कोशिश की, वह तो सभी ने देखी/जानी । इसके बाद भी राज चावला न सिर्फ चेयरमैन के रूप में अपना काम किए जा रहे हैं, बल्कि सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत अपनी उम्मीदवारी के लिए भी अभियान चलाए हुए हैं । राज चावला के इसी रवैये में हंसराज चुग और उनके समर्थकों को खतरे की घंटी सुनाई दे रही है । 
उल्लेखनीय है कि राज चावला के समर्थक भी मानते और कहते हैं कि राज चावला की उम्मीदवारी ही हंसराज चुग की जीत की राह का रोड़ा है । दोनों का समर्थन-आधार लगभग समान है, और दोनों को ही समान लोगों से ही समर्थन की उम्मीद है - कई लोगों को लगता है कि चेयरमैन होने का फायदा तो राज चावला को मिलेगा ही, साथ ही उनके खिलाफ जिस तरह से जो जो षड्यंत्र होते रहे हैं, उसके चलते लोगों के बीच उनके प्रति हमदर्दी भी है । राज चावला के खिलाफ होते षड्यंत्र जिस तरह अभी तक बेअसर साबित होते रहे हैं, उसे चाहें उनकी किस्मत का नतीजा मानें; और चाहें वह उनकी सुनियोजित रणनीति का प्रतिफल हो - उससे भी हंसराज चुग और उनके समर्थकों की नींद खराब हो रही है । हाँ, इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति के पंडित अभी राज चावला की उम्मीदवारी को बहुत तवज्जो देते हुए नहीं दिख रहे हैं - पर चुनावी राजनीति के इन्हीं पंडितों ने रीजनल काउंसिल के चेयरमैन पद के चुनाव में भी राज चावला की उम्मीदवारी को कहाँ कोई तवज्जो दी थी ? 

Saturday, September 12, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नागपुर ब्रांच के स्थापना दिवस समारोह में हुईं बातों ने पिछली बार हुई राजेश लोया की पराजय तथा उस पराजय के लिए जुल्फेश शाह को जिम्मेदार ठहराए जाने की चर्चा को पुनर्जीवित किया और रीजनल काउंसिल के चुनाव को दिलचस्प बनाया

नागपुर । ब्रांच के स्थापना दिवस के समारोह में रीजनल काउंसिल के उम्मीदवारों की संख्या घटाने के कुछेक लोगों के प्रयास को जिस तरह से मुँहकी खानी पड़ी है, उसके कारण नागपुर में चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की चुनावी राजनीति आपसी होड़ की प्रतिस्पर्धा में प्रवेश करती दिखाई दे रही है । उल्लेखनीय है कि इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति के संदर्भ में नागपुर में चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की एकता वेस्टर्न रीजन में प्रशंसा और ईर्ष्या का विषय रही है । इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति से जुड़े फैसले नागपुर में जिस तरह से आपसी विचार-विमर्श से मिलजुल कर लिए जाते रहे हैं, वह वेस्टर्न रीजन के चुनावी खिलाड़ियों के लिए कभी प्रशंसा के तो कभी चिंता के विषय रहे हैं । वेस्टर्न रीजन के खिलाड़ी नेताओं ने पिछले वर्षों में नागपुर की इस एकता को तोड़ने की कुछेक बार जो कोशिशें कीं, वह बुरी तरह विफल रहीं हैं । लेकिन इस बार के चुनाव में नागपुर में की यह एकता बिखरती हुई नजर आ रही है - और इसकी अभिव्यक्ति या इसके सुबूत रीजनल काउंसिल के लिए प्रस्तुत चार लोगों की उम्मीदवारी में देखे/पहचाने जा रहे हैं । चुनावी राजनीति के गुणा-भाग को समझने वाला नागपुर का कमोवेश हर व्यक्ति मान रहा है और कह रहा है कि रीजनल काउंसिल के लिए नागपुर से इस बार दो सीट निकल सकती हैं - इसलिए आपस में विचार विमर्श करके दो लोगों की ही उम्मीदवारी प्रस्तुत होनी चाहिए, जिससे कि दो सीटों को सचमुच में सुरक्षित किया जा सके । इस संबंध में अभी तक जो भी प्रयास हो रहे थे, वह कामयाब होते हुए नहीं नजर आए - इसलिए ब्रांच के स्थापना दिवस समारोह में ब्रांच की मैनेजमेंट कमेटी में अभी तक रहे लोगों के सम्मान के बहाने नागपुर के प्रमुख लोग जब इकट्ठा हुए, तो फिर रीजनल काउंसिल के लिए दो उम्मीदवार वाला मुद्दा उठा । मुद्दा उठा तो तरह तरह के फार्मूले सामने आए - लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद किसी फार्मूले पर सहमति नहीं बन सकी और रीजनल काउंसिल के उम्मीदवारों की संख्या घटाने के प्रयास एक बार फिर - और शायद अंतिम बार, फेल हो गए । 
इस असफलता में कुछेक लोगों को इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति के संदर्भ में नागपुर में चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की एकता को ग्रहण लगता दिख रहा है । कुछेक लोगों का मानना और कहना हालाँकि यह है कि यह पिछली बार हुई 'राजनीति' का स्वाभाविक नतीजा है; इस बार नागपुर में उम्मीदवारी के बारे में फैसले करने की सामूहिक एप्रोच में जो बिखराब हुआ है - उसकी नींव वास्तव में पिछली बार ही पड़ गई थी । दरअसल पिछली बार राजेश लोया की पराजय के लिए राजेश लोया के समर्थकों ने जिस तरह से जुल्फेश शाह को जिम्मेदार ठहराया था, उससे नागपुर के चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच एक विभाजक रेखा खिंच गई थी । जुल्फेश शाह और उनके समर्थकों ने इस आरोप की गंभीरता को नहीं समझा, और इसे राजेश लोया के समर्थकों की खीज मान कर अनदेखा कर दिया । पिछली बार का चुनावी नतीजा घोषित होने के तुरंत बाद से जिस तरह जुल्फेश शाह की तरफ से सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवारी का दावा किया/सुना जाने लगा, उसने राजेश लोया के समर्थकों के जले पर नमक छिड़कने का काम किया । जुल्फेश शाह के समर्थकों ने अभिजीत केलकर के समर्थकों/सहयोगियों के दूसरी वरीयता के वोट न मिलने की बात करते हुए धोखा देने का आरोप भी लगाया । उनका तर्क था कि अभिजीत केलकर को पहली वरीयता के जो 655 वोट मिले थे, उनके दूसरी वरीयता के वोट उन्हें मिलने चाहिए थे; किंतु जो उन्हें नहीं मिले । पिछली बार, चुनावी नतीजा आने के बाद आरोपों-प्रत्यारोपों का जो दौर चला था, उससे नागपुर में तलवारों के म्यान से बाहर निकल आने के संकेत मिलने लगे थे । इन संकेतों को या तो पहचाना नहीं गया, और या पहचान कर भी जिनकी अनदेखी कर दी गई । 
नागपुर में उभर रहे विभाजनकारी संकेतों को सतीश सारदा की उम्मीदवारी की प्रस्तुति से और बढ़ावा मिला । दरअसल अभिजीत केलकर चाहते थे कि रीजनल काउंसिल की इस बार की उनकी उम्मीदवारी में कोई विध्न-बाधा न पड़े, इसके लिए नागपुर में कोई और अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत न करे । सतीश सारदा ने लेकिन इस तर्क के साथ अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत की कि नागपुर में रीजनल काउंसिल के दो उम्मीदवारों को जिता लेने की क्षमता है, इसलिए उनकी उम्मीदवारी से अभिजीत केलकर को चिंता करने की जरूरत नहीं है । नागपुर में रीजनल काउंसिल के दो उम्मीदवारों को जिता लेने की क्षमता होने के बावजूद अभिजीत केलकर पिछली बार चूँकि नहीं जीत पाए थे, इसलिए उन्होंने इस तर्क को 'स्वीकार' नहीं किया । यहाँ तक भी बात लेकिन ज्यादा नहीं बिगड़ी थी; बात ज्यादा तब बिगड़ी जब सतीश सारदा ने यह बताना शुरू किया कि उन्होंने तो पहले ही घोषणा कर दी थी कि जुल्फेश शाह जब रीजनल काउंसिल को छोड़ेंगे, तब वह रीजनल काउंसिल के लिए उम्मीदवार बनेंगे - इससे लोगों के बीच यह मैसेज गया कि सतीश सारदा की उम्मीदवारी के पीछे जुल्फेश शाह हैं । अभिजीत केलकर व दूसरे लोगों को भी लगा कि जुल्फेश शाह ने अभिजीत केलकर की राह में रोड़ा बिछाने की कोशिश के तहत ही सतीश सारदा की उम्मीदवारी को प्रस्तुत किया/करवाया है । इससे फिर बात बिगड़ गई, और परस्पर अविश्वास का भाव पैदा हुआ तथा फैसले करने/लेने की सामूहिक भावना मिट गई । अश्विन अग्रवाल और स्वप्निल अग्रवाल की उम्मीदवारी की प्रस्तुति ने इस प्रक्रिया को और तेज कर दिया । 
इस प्रक्रिया के तेज होने का एक कारण यह भी है कि नागपुर में रीजनल काउंसिल के लिए जिन चार लोगों की उम्मीदवारी सामने आई है, उनके समर्थकों को उनके जीतने का पूरा पूरा विश्वास है; और इसलिए समर्थक अपने अपने उम्मीदवार को पीछे करने को हरगिज तैयार नहीं हैं । रीजनल काउंसिल के संदर्भ में नागपुर में इस बार मजेदार सीन यह है कि चुनावी राजनीति के होशियार खिलाड़ी भी किसी एक की जीत को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं हैं । अलग अलग कारणों से चारों को जीतने वाले उम्मीदवार के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है - और माना जा रहा है कि सफल होने वाले उम्मीदवार की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह अपनी खूबियों के प्रति लोगों को किस हद तक प्रभावित कर पाता है, और चुनावी समीकरणों को अपने पक्ष में किस तरह से मैनेज करता है । ब्रांच के स्थापना दिवस समारोह में ब्रांच की मैनेजमेंट कमेटि(यों) में रहे लोगों को सम्मानित करने के लिए जुटे लोगों के बीच जिस तरह से बातें हुईं और लोग खेमों में बँटे नजर आए, उससे एक बात जरूर साफ हो गई है कि पिछली बार हुई राजेश लोया की पराजय तथा उस पराजय के लिए जुल्फेश शाह को जिम्मेदार ठहराए जाने की चर्चा ने नागपुर में चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की एकता को जो चोट पहुँचाई है, उसकी छाया रीजनल काउंसिल के चुनाव पर भी पड़ती दिख रही है । यह छाया क्या राजनीतिक समीकरण बनाती है, और कौन उम्मीदवार इस समीकरण को बनाने में क्या भूमिका निभाता है और कैसे इसे इस्तेमाल करता है - इस पर उसकी सफलता निर्भर करेगी । 

Thursday, September 10, 2015

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3100 में पूर्व गवर्नर हितेश कुमार शर्मा के फर्जी पत्र मामले में मनोज देसाई के रवैये से उत्साहित राजीव सिंघल और उनके समर्थकों ने जिस षड्यंत्रपूर्ण तरीके से मंजु गुप्ता को रास्ते से हटाने की कोशिश की है, उससे राजीव सिंघल की उम्मीदवारी की कमजोरी ही साबित हुई है

मेरठ । राजीव सिंघल और उनके समर्थक नेताओं ने इंटरनेशनल डायरेक्टर मनोज देसाई के नाम पर डिस्ट्रिक्ट में जो गंदगी फैलाई हुई है, उस पर चुप्पी साध कर मनोज देसाई ने अपनी फजीहत और कराई हुई है । मनोज देसाई पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर हितेश कुमार शर्मा के पत्र पर जिस तरह कुंडली मार कर बैठ गए हैं, उससे राजीव सिंघल तथा उनके समर्थक नेताओं के हौंसले और बुलंद हुए हैं । इस बुलंद हौंसले की बदौलत ही राजीव सिंघल तथा उनके समर्थक नेताओं ने रोटरी क्लब मेरठ डायमण्ड में फर्जी तरीके से अधिकांश सदस्यों को ड्रॉप कर/करवा दिया है, ताकि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए राजीव सिंघल को मंजु गुप्ता से मिल रही चुनौती को खत्म किया जा सके । उल्लेखनीय है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए राजीव सिंघल और उनके समर्थकों ने जब मंजु गुप्ता की उम्मीदवारी को मिल रहे समर्थन के सामने अपने आपको कमजोर पाया, तो उन्होंने षड्यंत्र करके मंजु गुप्ता को रोटरी से ही 'बाहर' कर/करवा दिया है । राजीव सिंघल और उनके समर्थक नेता इस मामले में अब सीधे डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सुनील गुप्ता को चुनौती दे रहे हैं कि वह मंजु गुप्ता तथा अन्य सदस्यों की सदस्यता बचा कर दिखाएँ । दरअसल रोटरी क्लब मेरठ डायमण्ड के अध्यक्ष तन्मय शर्मा ने जिस षड्यंत्रपूर्ण तरीके से मंजु गुप्ता तथा क्लब के अन्य सदस्यों को क्लब से बाहर कर दिया है, उसे अमान्य बताते हुए रोटरी इंटरनेशनल के दिल्ली स्थित कार्यालय के पदाधिकारियों ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सुनील गुप्ता से कार्रवाई करने के लिए कहा है । राजीव सिंघल और उनके समर्थक नेताओं का कहना है कि रोटरी इंटरनेशनल के इस स्पष्ट निर्देश के बाद सुनील गुप्ता ने क्लब के अध्यक्ष तन्मय शर्मा के साथ मीटिंग व बातचीत तो कर ली है, किंतु कार्रवाई करने की हिम्मत नहीं कर पा रहे हैं । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सुनील गुप्ता अपने ही डिस्ट्रिक्ट के एक क्लब के अध्यक्ष के सामने अपने आपको जिस तरह से असहाय पा रहे हैं - उसे राजीव सिंघल और उनके समर्थक नेता अपनी जीत के रूप में देख रहे हैं; और अपनी इस 'जीत' का श्रेय मनोज देसाई को दे रहे हैं । 
मनोज देसाई लेकिन राजीव सिंघल और उनके समर्थक नेताओं की इससे भी बड़ी मदद हितेश कुमार शर्मा के फर्जी पत्र के मामले में कर रहे हैं । मनोज देसाई जिस दिन यह मदद करना बंद कर देंगे, उस दिन राजीव सिंघल और उनके समर्थक नेताओं में से कोई एक बड़ी मुसीबत में फँस जायेगा । दरअसल हुआ यह कि डिस्ट्रिक्ट के पूर्व गवर्नर हितेश कुमार शर्मा की तरफ से निवर्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर संजीव रस्तोगी तथा मौजूदा गवर्नर सुनील गुप्ता के खिलाफ आरोप लगाते हुए एक पत्र निवर्तमान इंटरनेशनल डायरेक्टर पीटी प्रभाकर को भेजा गया, जिसकी प्रति मनोज देसाई को भी संलग्न की गई । इंटरनेशनल डायरेक्टर होने के नाते मनोज देसाई ने इस पत्र का संज्ञान लिया, और हितेश कुमार शर्मा से कुछ स्पष्टीकरण माँगे । इस पर हितेश कुमार शर्मा का माथा चकराया । उन्होंने मनोज देसाई से कहा कि यह पत्र उन्होंने न तो लिखा है, और न ही भेजा है । हितेश कुमार शर्मा का एक बड़ा तर्क रहा कि उन्होंने अपना समस्त पत्र व्यवहार हिंदी में ही किया है; यहाँ तक कि जब वह डिस्ट्रिक्ट गवर्नर थे, तब भी उन्होंने हिंदी में ही पत्र लिखे थे - लिहाजा अब यदि उन्हें कोई पत्र लिखना ही होता, तो वह अंग्रेजी में क्यों लिखते ? हितेश कुमार शर्मा ने कहा कि उनके नाम का इस्तेमाल करते हुए किसी ने अपनी राजनीति साधने के लिए यह ओछा काम किया है । हितेश कुमार शर्मा ने मनोज देसाई से अनुरोध किया कि उनके नाम से भेजे गए इस फर्जी पत्र को जिस ईमेल से भेजा गया है, उस ईमेल का विवरण वह उन्हें उपलब्ध करवाएँ, जिससे कि वह यह ओछी हरकत करने वाले के खिलाफ कानूनी कार्रवाई कर सकें । मनोज देसाई ने लेकिन हितेश कुमार शर्मा को उक्त ईमेल का विवरण उपलब्ध नहीं करवाया है । हितेश कुमार शर्मा के फर्जी पत्र पर कार्रवाई करने में मनोज देसाई ने जो तत्परता दिखाई, वैसी तत्परता चूँकि वह उक्त फर्जी ईमेल का विवरण उपलब्ध करवाने में नहीं कर रहे हैं - इसलिए इस मामले में उनकी भूमिका संदेहास्पद हो गई है । 
हितेश कुमार शर्मा के नाम से लिखे/भेजे गए फर्जी पत्र में जो बातें और आरोप हैं, वह कमोवेश वही हैं जो राजीव सिंघल के एक समर्थक नेता पूर्व गवर्नर एमएस जैन द्वारा पहले लिखे/भेजे गए पत्र में हैं - इसलिए अनुमान लगाया जा रहा है कि हितेश कुमार शर्मा के नाम से फर्जी पत्र भेजने के पीछे राजीव सिंघल और उनके समर्थक नेताओं में से ही किसी का हाथ है । मजे की बात यह है कि एमएस जैन द्वारा लिखे गए पत्र पर डिस्ट्रिक्ट में जब बबाल मचा था, तब एमएस जैन ने यह कह कर पीछा छुड़ाया था कि उक्त पत्र उन्होंने नहीं लिखा/भेजा था; उनकी ईमेल आईडी किसी ने हैक करके यह शरारत की है । इस पर उनसे कहा गया था कि ईमेल आईडी हैक होने की रिपोर्ट उन्हें पुलिस में करना चाहिए ताकि हैकर को पकड़वा कर उसे सजा दिलवाई जा सके । एमएस जैन ने लेकिन इस पर कोई कार्रवाई नहीं की - जिससे साबित हुआ कि ईमेल आईडी हैक होने की उनकी बात उनका सिर्फ एक बहाना है और उक्त शिकायती मेल उन्होंने ही किया था । उक्त ईमेल को लेकर एमएस जैन की लोगों के बीच बहुत ही थू थू हुई और उन्हें भारी शर्मिंदगी से गुजरना पड़ा । समझा जाता है कि एमएस जैन की हुई फजीहत से सबक लेकर ही राजीव सिंघल और उनके समर्थक नेताओं ने निवर्तमान व मौजूदा गवर्नर तथा अन्य कुछेक वरिष्ठ रोटेरियंस को झूठे आरोपों में बदनाम करने के लिए फर्जी तरीके अपनाने की राह चुनी - और इसके लिए हितेश कुमार शर्मा के नाम का इस्तेमाल किया । किसी के लिए भी यह समझना मुश्किल हो रहा है कि गवर्नर्स तथा वरिष्ठ रोटेरियंस को झूठी बातों के सहारे बदनाम करने तथा इस तरह रोटरी को कलंकित करने वालों को प्रश्रय देकर और उन्हें बचाने का प्रयास करके मनोज देसाई आखिर हासिल क्या करना चाहते हैं ?
राजीव सिंघल की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं ने सिर्फ डिस्ट्रिक्ट के लोगों को ही नहीं, बल्कि अपनी हरकतों से रोटरी के बड़े नेताओं तक को चुनौती दी हुई है । यहाँ यह याद करना प्रासंगिक होगा कि इंटरनेशनल प्रेसीडेंट केआर रवींद्रन ने रोटरी में राजनीति को हतोत्साहित करने का आह्वान किया हुआ है और स्पष्ट चेतावनी दी हुई है कि जो कोई भी राजनीति करता हुआ पाया जायेगा, उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी । इंटरनेशनल प्रेसीडेंट की इस स्पष्ट चेतावनी के बावजूद पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर एमएस जैन, गजेंद्र सिंह धामा, योगेश मोहन गुप्ता खुलेआम राजीव सिंघल की उम्मीदवारी के समर्थन में अभियान चलाए हुए हैं । केआर रवींद्रन के आह्वान और उनकी चेतावनी की याद दिलाए जाने पर इनकी तरफ से प्रायः यही सुनने को मिलता है कि - हम तो जो कर रहे हैं, खुलेआम कर रहे हैं; हम भी देखेंगे कि रवींद्रन क्या करते हैं ? रोटरी को कलंकित करने के मामले में इनके हौंसले इस कदर ऊँचे हैं कि रोटरी क्लब मुरादाबाद नॉर्थ के एक कार्यक्रम में पूर्व गवर्नर योगेश मोहन गुप्ता रोटरी फाउंडेशन में पैसे न देने के लिए यह कहते हुए आह्वान करते हैं कि रोटरी फाउंडेशन का पैसा रोटरी के बड़े पदाधिकारियों और नेताओं की मौजमस्ती में इस्तेमाल होता है, इसलिए उसमें पैसे देने से क्या फायदा ? यही लोग राजीव सिंघल की उम्मीदवारी का झंडा उठाए हुए हैं । 
डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवार के रूप में राजीव सिंघल की समस्या यह है कि उनके समर्थक नेता नकारात्मक और ओछी किस्म की हरकतें करने के कारण डिस्ट्रिक्ट में खासे बदनाम हैं; जिस कारण लोगों के बीच उनकी उम्मीदवारी को लेकर कोई सकारात्मक सोच बन ही नहीं पा रही है । राजीव सिंघल के लिए मेरठ में ही समर्थन जुटाना मुश्किल हो रहा है । मेरठ में लोगों के बीच उनसे ज्यादा स्वीकार्यता मंजु गुप्ता की उम्मीदवारी के लिए बनती नजर आ रही है । मंजु गुप्ता ने डिस्ट्रिक्ट में ही नहीं, डिस्ट्रिक्ट के बाहर भी - बल्कि दूसरे देशों तक में अपनी सक्रियता व संलग्नता से अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है । इस पहचान के चलते ही मेरठ में उनके लिए अच्छा समर्थन है । राजीव सिंघल के कुछेक समर्थकों ने उन्हें 'मेरठ के उम्मीदवार' के रूप में प्रमोट करने का प्रयास किया, किंतु मेरठ के कई प्रमुख रोटेरियंस ने उन्हें साफ बता दिया कि यदि सचमुच चाहते हो कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी मेरठ का चुना जाए, तो राजीव सिंघल को छोड़ कर मंजु गुप्ता की उम्मीदवारी का समर्थन करो । मंजु गुप्ता की उम्मीदवारी से मिल रही चुनौती से निपटना राजीव सिंघल और उनके समर्थकों को जब मुश्किल और असंभव लगा, तो उन्होंने षड्यंत्रपूर्वक मंजु गुप्ता की उम्मीदवारी को समाप्त करने का दुष्चक्र रचा । उनकी बदकिस्मती रही कि उनके दुष्चक्र की पोल जल्दी ही खुल गई, और मंजु गुप्ता तथा उनके समर्थकों ने समय रहते आवश्यक कार्रवाई कर ली । मनोज देसाई के रवैये के कारण अनिश्चय में फँसे डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सुनील गुप्ता अभी भले ही मंजु गुप्ता को न्याय देने में ढील-ढाल कर रहे हैं, लेकिन इस मामले में रोटरी इंटरनेशनल के दिशा-निर्देश इतने स्पष्ट हैं कि देर-सबेर सुनील गुप्ता को मंजु गुप्ता को न्याय देना/दिलवाना ही होगा । मंजु गुप्ता की उम्मीदवारी से निपटने के लिए राजीव सिंघल और उनके समर्थक नेताओं ने जिस तरह की कायराना हरकत की, उससे राजीव सिंघल की उम्मीदवारी की कमजोरी ही साबित हुई है - और इसके चलते लोगों के बीच राजीव सिंघल की उम्मीदवारी के प्रति समर्थन और कमजोर हो गया है ।