Monday, August 5, 2019

रोटरी इंटरनेशनल के वर्ष 2021-22 के प्रेसीडेंट पद पर शेखर मेहता के चुने जाने की पटकथा, भारत विरोधी व सुशील गुप्ता विरोधी के रूप में देखे/पहचाने जाने वाले एक पूर्व प्रेसीडेंट की सुशील गुप्ता के साथ जुलाई के अंतिम सप्ताह में दिल्ली में हुई एक गुपचुप मुलाकात में ही लिख दी गई थी क्या ?

नई दिल्ली । रोटरी इंटरनेशनल के वर्ष 2021-22 के प्रेसीडेंट पद के लिए शेखर मेहता के अधिकृत उम्मीदवार चुने जाने से सुशील गुप्ता विरोधी रोटेरियंस को खासा तगड़ा झटका लगा है, और 26 अप्रैल को सुशील गुप्ता के इस्तीफे के बाद फूला हुआ उनका जोश का गुब्बारा एक बार फिर से पिचक गया है । शेखर मेहता को सुशील गुप्ता के खेमे का 'आदमी' तो माना ही जाता है, इंटरनेशनल प्रेसीडेंट पद पर शेखर मेहता की जीत को सुशील गुप्ता के ऑरा (आभामंडल) की जीत के रूप में भी देखा/पहचाना जा रहा है । इससे पहले सुशील गुप्ता के इस्तीफा देने से खाली हुआ वर्ष 2020-21 का प्रेसीडेंट पद होल्गर नेक को मिल जाने में भी सुशील गुप्ता की भूमिका को देखा/पहचाना गया था । उल्लेखनीय है कि इंटरनेशनल प्रेसीडेंट पद की चुनावी दौड़ में होल्गर नेक व शेखर मेहता अभी कहीं नजर नहीं आ रहे थे । होल्गर नेक को पर्याप्त समर्थन नहीं था, और शेखर मेहता के लिए सुशील गुप्ता के 'पूर्व प्रेसीडेंट' हो जाने तक इस बारे में सोचना भी असंभव था । शेखर मेहता तो अभी करीब तीन महीने पहले, सुशील गुप्ता का इस्तीफा होने के बाद उम्मीदवार बने थे । तीन महीने पहले कोई अपनी उम्मीदवारी की घोषणा करे, और प्रेसीडेंट चुन लिया जाए - रोटरी इंटरनेशनल के 114 वर्षों के इतिहास में इससे पहले ऐसा कभी नहीं हुआ । शेखर मेहता ने यह एक नया इतिहास रचा है, तो इसके पीछे रोटरी इंटरनेशनल में बने सुशील गुप्ता के ऑरा को ही देखा/पहचाना जा रहा है - और इस बात ने सुशील गुप्ता के विरोधियों और अवसरवादियों की 'खुशियों' पर जैसे ताला जड़ दिया है ।
उल्लेखनीय है कि स्वास्थ्य कारणों से सुशील गुप्ता के इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी पद से इस्तीफा देने के बाद सुशील गुप्ता के विरोधी नेताओं के मन बड़े गदगद थे । इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी चुने जाने के बाद सुशील गुप्ता से नजदीकियाँ बनाने और 'दिखाने' वाले महत्त्वाकांक्षी नेताओं ने - जिनमें उनके डिस्ट्रिक्ट के महत्त्वाकांक्षी नेता भी हैं - उनके इस्तीफा देते ही रंग बदलना शुरू कर दिया था । सुशील गुप्ता के विरोधियों और अवसरवादी नेताओं ने मान/समझ लिया था कि रोटरी इंटरनेशनल की 'व्यवस्था' तथा उसकी राजनीति में सुशील गुप्ता का प्रभाव खत्म हो गया है, और इसलिए उन्हें सुशील गुप्ता की परवाह करने की जरूरत नहीं है । लेकिन पहले होल्गर नेक और अब शेखर मेहता के इंटरनेशनल प्रेसीडेंट चुने जाने ने उनकी 'समझ' पर पत्थर गिरा दिए हैं । होल्गर नेक के बाद शेखर मेहता के इंटरनेशनल प्रेसीडेंट चुने जाने ने सुशील गुप्ता के विरोधियों और अवसरवादी नेताओं को तगड़ा करंट दिया है; दरअसल सुशील गुप्ता के प्रभाव को खत्म हुआ मान कर उन्होंने रोटरी में अपने जो जो मंसूबे बनाए थे, वह सब उन्हें फेल होते हुए दिख रहे हैं । होल्गर नेक के बाद शेखर मेहता के इंटरनेशनल प्रेसीडेंट चुने जाने से उन्हें यह मुश्किल लग रहा है कि सुशील गुप्ता की 'अनुपस्थिति' का वह कोई फायदा उठा सकेंगे । इससे दरअसल साबित हुआ है कि सुशील गुप्ता भले ही बीमार हों, और बीमारी के चलते वह प्रेसीडेंट नॉमिनी का पद छोड़ने के लिए मजबूर हुए हों - लेकिन रोटरी में उनका प्रभाव पहले जैसा ही बना हुआ है; और यह बात रोटरी में उनके विरोधियों तथा अवसरवादी महत्त्वाकांक्षी नेताओं के लिए काफी मुसीबतभरी है ।
शेखर मेहता की जीत और उसमें सुशील गुप्ता के 'असर' के एक प्रमुख कारण के रूप में रोटरी इंटरनेशनल में भारत के बढ़ते दबदबे को भी देखा/पहचाना जा रहा है । रोटरी इंटरनेशनल की सदस्यता तथा रोटरी फाउंडेशन में हिस्सेदारी के मामले में भारत की हैसियत जिस तरह से बढ़ रही है, उसे देखते हुए रोटरी इंटरनेशनल को 'नियंत्रित' करने वाले लोगों के लिए भारत के नेताओं की उपेक्षा करना और उन्हें अलग-थलग रखना अब मुश्किल होता जा रहा है । दक्षिण एशिया के जिन रोटरी नेताओं व पूर्व प्रेसीडेंट्स को भारत विरोधी व सुशील गुप्ता विरोधी के रूप में देखा/पहचाना जाता रहा है, उन्होंने भी वस्तुस्थिति को समझा/पहचाना है और अपने विरोध के स्वर को नीचा किया है । इसी संदर्भ में भारत विरोधी व सुशील गुप्ता विरोधी के रूप में देखे/पहचाने जाने वाले एक पूर्व प्रेसीडेंट की जुलाई के अंतिम सप्ताह में दिल्ली में हुई एक गुपचुप मुलाकात को महत्त्वपूर्ण घटनाचक्र के रूप में देखा/पहचाना गया । सुशील गुप्ता के नजदीकियों का दावा है कि उस गुपचुप मुलाकात में ही शेखर मेहता के इंटरनेशनल प्रेसीडेंट चुने जाने की पटकथा लिख दी गई थी ।

Sunday, August 4, 2019

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 के ई-क्लब मैग्नम से पैसा वापस माँगने की रोटरी फाउंडेशन की कार्रवाई ने 'बताया' कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दीपक गुप्ता के खासमखास सुनील प्रकाश ने रवि सिंघल व नवनीत गुप्ता के साथ मिल कर सीएसआर, रोटरी फाउंडेशन व स्कूली बच्चों के साथ एक साथ धोखा किया

नई दिल्ली । रोटरी क्लब ई-क्लब मैग्नम के पदाधिकारियों को रोटरी फाउंडेशन से मिले करीब 31 लाख रुपए वापस लौटाने के आदेश ने डिस्ट्रिक्ट 3012 में रोटरी फाउंडेशन के पैसों की लूट के मामले को उजागर कर दिया है । इस मामले ने रोटरी फाउंडेशन के साथ-साथ सीएसआर (कॉपोरेट सोशल रेस्पोंसिबिलिटी) के पैसों में भी रोटेरियंस की लूट की तरकीबों को सामने लाने का काम किया है । इस मामले ने डिस्ट्रिक्ट के बड़े पदाधिकारियों के गैर-जिम्मेदार रवैये को भी उद्घाटित किया है, जो उनकी मिलीभगत होने के भी संकेत देता है । ई-क्लब मैग्नम के पदाधिकारियों ने जिस ग्लोबल ग्रांट (जीजी 1755525) में घपला किया है, वह शरत जैन के गवर्नर वर्ष में मंजूर हुई थी, और उस दौरान मुकेश अरनेजा डीआरएफसी थे । डीआरएफसी के रूप में मुकेश अरनेजा ने वरदान अस्पताल में बनने वाले ब्लड बैंक की ग्रांट के मामले में तो बड़ा बबाल काटा था, लेकिन ई-क्लब मैग्नम की ग्लोबल ग्रांट बिना किसी चूँ-चपड़ के पास कर दी थी । विन्स इंडिया के सेक्रेटरी के रूप में रमेश अग्रवाल ने उक्त ग्रांट मिलने पर खासी खुशी जाहिर की थी । मौजूदा डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दीपक गुप्ता ने तो और भी कमाल किया है । रोटरी फाउंडेशन व सीएसआर के पैसों की लूट के उद्देश्य से स्कूलों और स्कूली बच्चों के साथ धोखाधड़ी करने के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार ठहराए जा रहे क्लब के पूर्व प्रेसीडेंट सुनील प्रकाश को दीपक गुप्ता ने अपनी टीम में बेसिक एजुकेशन एंड लिट्रेसी कमेटी का जोन चेयरमैन बनाया हुआ है । इस तरह जाहिर होता है और देखने में आया है कि रोटरी फाउंडेशन, सीएसआर तथा स्कूली बच्चों के पैसों व उनकी सुविधाओं की लूट करने वाले ई-क्लब मैग्नम के पदाधिकारी डिस्ट्रिक्ट के कई बड़े पदाधिकारियों/नेताओं के चहेते हैं ।
सुनील प्रकाश को संबोधित रोटरी फाउंडेशन की तरफ से भेजे गए पाँच पृष्ठीय पत्र में विस्तार से बताया गया है कि हरियाणा के छह स्कूलों में शौचालय, पीने के पानी और शिक्षा सुविधाओं के स्तर में सुधार के उद्देश्य से ग्लोबल ग्रांट ली गई थी, जिसके तहत नए शौचालय बनने थे; नए कंप्यूटर लगने थे; विज्ञान की प्रयोगशालाओं के लिए टेबल व रैक्स व स्टूल तथा क्लास रूम्स के लिए नए डेस्क्स आने थे; इन्वर्टर व यूपीएस लगने थे; आदि-इत्यादि । प्रोजेक्ट के पूरा होने के बाद रोटरी फाउंडेशन की ऑडिट टीम ने मौके पर जा कर जो जाँच की, उसमें लेकिन घपलेबाजी की पोल खुली । ऑडिट टीम ने पाया कि प्रोजेक्ट के तहत जो कुछ भी किया जाना था, उसमें से कुछ भी नहीं किया गया । नए शौचालय बनवाने की जगह पुराने बने शौचालयों की ही मरम्मत/पुताई करवा दी गई; नए कंप्यूटर, इन्वर्टर व यूपीएस देने/लगाने की जगह पुराने कंप्यूटर्स, इन्वर्टर व यूपीएस की ही सर्विस करवा दी गई; डेस्क, टेबल, रैक्स, स्टूल आदि के मामले में भी यही रवैया अपनाया गया । प्रोजेक्ट के सलाहकार की फीस के नाम पर करीब साढ़े तीन लाख रुपए खर्च दिखाए गए । ऑडिट टीम का निष्कर्ष रहा कि प्रोजेक्ट में जो जो काम करने की बात की गई थी, उनमें से कोई भी काम करने के उदाहरण नहीं मिले हैं । ऑडिट टीम की रिपोर्ट के आधार पर रोटरी फाउंडेशन ने सुनील प्रकाश को फैसला सुनाया है कि चूँकि प्रोजेक्ट के तहत बताए गए कोई काम नहीं हुए हैं, इसलिए विभिन्न मदों में दिखाए गए कुल खर्च के 30,85,085 रुपए वह रोटरी फाउंडेशन को 31 अगस्त तक वापस भेजें ।
रोटरी फाउंडेशन के पैसों के साथ की गई इस लूट का और भी गंभीर व सनसनीखेज पक्ष यह है कि इस प्रोजेक्ट के लिए जेको एयरकॉन लिमिटेड से सीएसआर के तहत पैसा लिया गया । जो तथ्य इस बात को गंभीर व सनसनीखेज बनाता है, वह यह है कि सुनील प्रकाश इस कंपनी में डायरेक्टर हैं । सुनील प्रकाश के साथ प्रोजेक्ट कमेटी में जो दूसरे लोग सदस्य हैं, उनमें रवि सिंघल इसी कंपनी में मैनेजिंग डायरेक्टर हैं और नवनीत कुमार गुप्ता इसी कंपनी में एक अन्य डायरेक्टर हैं । रवि सिंघल पिछले रोटरी वर्ष में क्लब के प्रेसीडेंट थे, और नवनीत कुमार गुप्ता प्रेसीडेंट इलेक्ट हैं । क्लब में कुल 16 सदस्य हैं । यानि क्लब कुल मिलाकर इन्हीं तीन-चार लोगों का क्लब है । इस तरह कहानी यह बनी कि इनकी कंपनी इनके क्लब को सीएसआर के तहत पैसे देती है, जिसे दिखा कर यह रोटरी फाउंडेशन से मोटी रकम ले लेते हैं - और उसे हजम कर जाते हैं । इस तरह यह एक साथ सरकार से, रोटरी फाउंडेशन से और स्कूली बच्चों से धोखा करते हैं । सुनील प्रकाश, रवि सिंघल, नवनीत कुमार गुप्ता आदि बड़े लोग हैं, बड़े पैसे वाले लोग हैं, बड़ी बड़ी बातें करते हैं; यह स्कूली डेस्क, स्टूल, रैक्स, कंप्यूटर और शौचालयों के पैसों में चोरी-चकारी जैसा काम करेंगे - यह किसी ने नहीं सोचा था । लेकिन रोटरी फाउंडेशन से सुनील प्रकाश को संबोधित और भेजा गया पत्र इनकी सारी कारस्तानी की पोल खोल देता है और इनके मामले में 'नाम बड़े और दर्शन छोटे' वाली कहावत को चरितार्थ करता है । 

रोटरी इंटरनेशनल प्रेसीडेंट पद के लिए देर से उम्मीदवारी प्रस्तुत करने के चलते शेखर मेहता के लिए 5 अगस्त को होने वाला चुनाव आसान तो नहीं है, लेकिन सुशील गुप्ता के इस्तीफे से बनी हमदर्दीपूर्ण स्थिति उनका काम बना भी सकती है

नई दिल्ली । रोटरी इंटरनेशनल के वर्ष 2021-22 के प्रेसीडेंट पद के लिए नोमीनेटिंग कमेटी की मीटिंग में शेखर मेहता की कामयाबी के लिए उनके समर्थकों व शुभचिंतकों ने भले ही फिंगर्स क्रॉस कर ली हों, लेकिन समर्थक व शुभचिंतक भी जानते हैं कि यह चुनाव कोई आसान चुनाव नहीं है । वर्ष 2021-22 के प्रेसीडेंट पद के लिए अधिकृत उम्मीदवार का चयन/चुनाव करने के लिए 17 सदस्यीय नोमीनेटिंग कमेटी की कल, यानि 5 अगस्त को बैठक हो रही है । वर्ष 2021-22 के प्रेसीडेंट पद के लिए आए नामांकनों में से ग्यारह नाम चुने गए हैं, जिनमें शेखर मेहता का नाम भी है । शेखर मेहता को अन्य दस उम्मीदवारों के साथ कल नोमीनेटिंग कमेटी के सदस्यों के सामने साक्षात्कार के लिए उपस्थित होना है । नोमीनेटिंग कमेटी के 17 सदस्यों में पीटी प्रभाकर तथा एमके पांडुरंगा सेट्टी के रूप में दो सदस्य भारत के हैं । उल्लेखनीय है कि पिछले वर्ष सुशील गुप्ता को वर्ष 2020-21 के प्रेसीडेंट के रूप में चुनने वाली नोमीनेटिंग कमेटी में शेखर मेहता खुद थे, और इस नाते उम्मीद की जाती है कि नोमीनेटिंग कमेटी में फैसले पर कैसे पहुँचा जाता है, उसके मैकेनिज्म से शेखर मेहता परिचित होंगे ही - और उसका फायदा वह अपनी उम्मीदवारी के लिए उठा सकते हैं । शेखर मेहता के समर्थकों व शुभचिंतकों को यह भी उम्मीद है कि सुशील गुप्ता के इस्तीफा देने के चलते इंटरनेशनल प्रेसीडेंट का चुनाव करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले नेताओं के बीच सुशील गुप्ता और भारत के प्रति जो हमदर्दी बनी होगी, उसका फायदा भी शेखर मेहता को मिल सकता है ।
हालाँकि इंटरनेशनल प्रेसीडेंट के चयन/चुनाव में होने वाली राजनीति से परिचित बड़े नेताओं का मानना/कहना यह भी है कि हालात तो शेखर मेहता की उम्मीदवारी के अनुकूल हैं, लेकिन समस्या की बात सिर्फ यह है कि अनुकूल हालात का लाभ उठाने के लिए जिस तरह की 'तैयारी' की जरूरत होती है, शेखर मेहता को उसके लिए पर्याप्त समय ही नहीं मिला - और इसलिए उनकी तैयारी थोड़ा कमजोर 'दिखती' है । दरअसल, किसी और को क्या - खुद शेखर मेहता को यह पता नहीं था कि इंटरनेशनल प्रेसीडेंट पद की चुनावी दौड़ में उन्हें इतना जल्दी कूदना पड़ जायेगा । अभी अगले रोटरी वर्ष में तो सुशील गुप्ता को प्रेसीडेंट बनना था; उसके तीन-चार वर्ष बाद भारत के उम्मीदवारों को अपने प्रयास शुरू करने थे । वह तो 26 अप्रैल को अचानक व अप्रत्याशित रूप से सुशील गुप्ता के इस्तीफा दे देने के बाद बनी स्थिति में शेखर मेहता को अभी ही अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करने के लिए आनन-फानन में तैयार होना पड़ा । ऐसे में स्वाभाविक ही है कि जो उम्मीदवार आठ/नौ महीने पहले से अपनी उम्मीदवारी के पक्ष में समीकरण/गठजोड़ बना रहे थे, उनकी तुलना में शेखर मेहता की तैयारी कमजोर ही होगी । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में देर से अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करने वाले उम्मीदवार को जैसी/जिन चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, ठीक वैसी ही चुनौतियाँ इंटरनेशनल प्रेसीडेंट पद के चुनाव के संदर्भ में शेखर मेहता के सामने हैं - और ऐसे में जाहिर है कि इंटरनेशनल प्रेसीडेंट के लिए चुने जाने का मामला उनके लिए आसान नहीं है ।
शेखर मेहता के कुछेक नजदीकियों का इन पंक्तियों के लेखक से कहना/बताना यह भी है कि शेखर मेहता ने अपनी तैयारी को दो स्तरों पर केंद्रित किया हुआ है, और वह चुनावी खिलाड़ियों को नाराज करने की हद तक जा कर इस बार ही कामयाब होने के लिए अपनी कोशिशें नहीं करेंगे । पिछले रोटरी वर्ष में सुशील गुप्ता को अधिकृत उम्मीदवार चुनवाने के लिए नोमीनेटिंग कमेटी में जिस तरह की धींगामुश्ती हुई थी, शेखर मेहता अपनी उम्मीदवारी को लेकर उस स्तर पर जाने की कोशिश नहीं करेंगे; उनका प्रयास होगा कि इस बार यदि उनका काम आसानी से नहीं बनता है, तो वह अगले वर्ष के लिए अपना मौका बनाएँ । इसी बार कामयाब होने के लिए शेखर मेहता ऐसा कोई काम नहीं करना चाहेंगे, जिससे खिलाड़ी नेता खफा हों - और उनके लिए आगे का रास्ता मुश्किल बने । दरअसल माना/समझा यह जा रहा है कि शेखर मेहता की पहली कोशिश तो यह है कि इंटरनेशनल प्रेसीडेंट का चुनाव करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले नेताओं की गुडबुक में वह शामिल हों, ताकि इंटरनेशनल प्रेसीडेंट के गंभीर उम्मीदवारों में उनकी पहचान व गिनती होने लगे - और उसके चलते इस बार नहीं तो अगली बार उनके लिए इंटरनेशनल प्रेसीडेंट चुने जाने का मौका बन सके । शेखर मेहता के नजदीकियों का यह भी कहना/बताना है कि इस बार के चुनाव में सुशील गुप्ता की भी भूमिका होनी थी, और इस बार के चुनावी समीकरणों में उनकी भूमिका का भी महत्त्वपूर्ण हस्तक्षेप था - जो उनके इस्तीफा दे देने से गड़बड़ा तो गया है, लेकिन पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है । इसलिए एक संभावना यह भी है कि सुशील गुप्ता के सक्रिय न रहने के बावजूद उनका जो प्रभाव इस बार के चुनावी समीकरणों पर है, उसका फायदा हो सकता है कि शेखर मेहता को मिल जाए । क्या होगा, यह तो भारतीय समयानुसार 6 अगस्त की सुबह को ही पता चलेगा; लेकिन शेखर मेहता की उम्मीदवारी के चलते इंटरनेशनल प्रेसीडेंट पद का चुनाव भारतीय रोटेरियंस के लिए दिलचस्पी का विषय जरूर बन गया है ।

Saturday, August 3, 2019

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3011 में महेश त्रिखा के क्लब के अधिष्ठापन समारोह के प्रति डिस्ट्रिक्ट के आम और खास लोगों द्वारा दिखाए गए उत्साह तथा उनकी उपस्थिति ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की चुनावी लड़ाई में महेश त्रिखा की उम्मीदवारी को बढ़त दिलाने का काम किया है

नई दिल्ली । महेश त्रिखा के क्लब - रोटरी क्लब दिल्ली साऊथ ईस्ट के नए पदाधिकारियों के अधिष्ठापन समारोह में डिस्ट्रिक्ट के आम और खास रोटेरियंस की जुटी भीड़ ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए प्रस्तुत महेश त्रिखा की उम्मीदवारी को ऊँची छलाँग दी और इस भीड़ को यदि मानक मानें तो वह बाकी दोनों उम्मीदवारों से काफी आगे नजर आए । रोटरी की चुनावी राजनीति में उम्मीदवारों के क्लब के अधिष्ठापन समारोहों को पहली सीढ़ी के रूप में देखा/पहचाना जाता है । दरअसल अधिष्ठापन समारोह कहने को तो क्लब के नए पदाधिकारियों का होता है, लेकिन व्यवहार में वह उम्मीदवार के शक्ति-प्रदर्शन का रूप ले लेता है । नए पदाधिकारियों के अधिष्ठापन के बहाने वास्तव में उम्मीदवार अपने को मिलने वाले समर्थन का प्रदर्शन करता है । उल्लेखनीय है कि जब तक क्लब के अधिष्ठापन समारोह का समय आता है, तब तक उम्मीदवार अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने के वास्ते काफी प्रयास कर चुका होता है - ऐसे में अधिष्ठापन समारोह उम्मीदवार को अपने प्रयासों को जाँचने का भी मौका देता है । दूसरी तरफ, डिस्ट्रिक्ट के लोगों को भी पता चलता है कि उम्मीदवार सिर्फ बातें ही बनाता है, या कुछ 'करता' भी है । अशोक कंतूर और अजीत जालान ने उम्मीदवार के रूप में लोगों के सामने बातें तो खूब बनाई हैं, लेकिन जब अपने अपने क्लब के अधिष्ठापन समारोह में लोगों को आमंत्रित करने की बारी आई तो दोनों ही मुँह छिपा कर बैठ गए । उनके रवैये के विपरीत महेश त्रिखा ने अपने क्लब के अधिष्ठापन समारोह में लोगों को जब खुले दिल से बुलाया, तो स्वाभाविक ही लोगों ने उनके रवैये के प्रति उत्साह दिखाया - और लोगों का यही उत्साह महेश त्रिखा की उम्मीदवारी को बाकी दोनों उम्मीदवारों की तुलना में बढ़त दिखाता नजर आया । 
महेश त्रिखा की उम्मीदवारी के प्रति समर्थन 'दिखाने' और जुटाने के उद्देश्य से आयोजित हुए समारोह में उन पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स में से अधिकतर उपस्थित दिखे, जो डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में दिलचस्पी लेते हैं और चुनावी नतीजे को प्रभावित करते हैं । खास बात यह रही कि इस समारोह में वह सभी पूर्व गवर्नर्स उपस्थित थे, जिनकी पिछले रोटरी वर्ष में अनूप मित्तल की चुनावी जीत में महत्त्वपूर्ण व सक्रिय भूमिका थी । पचास से ज्यादा क्लब्स के प्रेसीडेंट्स की उपस्थिति ने महेश त्रिखा की उम्मीदवारी को एक अलग 'वजन' दिया । डिस्ट्रिक्ट के कई वरिष्ठ रोटेरियंस ने रेखांकित किया और दावे के साथ बताया/कहा कि किसी क्लब का ऐसा अधिष्ठापन समारोह इससे पहले तो डिस्ट्रिक्ट में नहीं हुआ है; और यह समारोह 'व्यवस्था' व उपस्थिति के लिहाज से डिस्ट्रिक्ट का समारोह जैसा लग रहा था । समारोह के अच्छे से होने का श्रेय क्लब के दो सदस्यों - पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सुरेश जैन और संजय खन्ना को भी दिया जा रहा है । माना/समझा जा रहा है कि पूर्व गवर्नर्स की उपस्थिति को सुनिश्चित करने में इन दोनों की सक्रिय भूमिका रही । इससे डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच संदेश गया है कि महेश त्रिखा की उम्मीदवारी को उनके क्लब के सदस्य दोनों पूर्व गवर्नर्स गंभीरता से ले रहे हैं । सुरेश जैन और संजय खन्ना की सक्रियता ने महेश त्रिखा की उम्मीदवारी की स्वीकार्यता को और बढ़ाने का ही काम किया है । इसके विपरीत, अशोक कंतूर अपने क्लब के दोनों पूर्व गवर्नर्स का समर्थन प्राप्त करने में एक बार फिर विफल होते नजर आ रहे हैं । पिछले रोटरी वर्ष में अशोक कंतूर ने अपनी पराजय के लिए अपने ही क्लब के सदस्य पूर्व गवर्नर रमेश चंद्र को जिम्मेदार ठहराया था और उन पर धोखा देने का आरोप लगाया था । अजीत जालान की समस्या तो और भी गंभीर है । लोगों के बीच उनका रोना सुना गया है कि विनोद बंसल ने पहले तो उन्हें उम्मीदवार बनवा दिया, लेकिन अब वह उनसे पीछा छुड़ाते दिख रहे हैं और उन्हें धोखा दे रहे हैं ।
महेश त्रिखा की उम्मीदवारी के लिए समर्थन 'दिखाने' और जुटाने के उद्देश्य से आयोजित हुए समारोह में क्लब के सदस्य पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सुरेश जैन ने एकेएस (ऑर्च क्लम्प सोसायटी) की सदस्यता से ऊपर के लेबल पर - ट्रस्टीज सर्किल में शामिल होने के लिए रोटरी फाउंडेशन में बड़ा दान देने की घोषणा करके भी समारोह को खास बना दिया । सुरेश जैन एकेएस के ट्रस्टीज सर्किल में शामिल होने वाले डिस्ट्रिक्ट के पहले और अभी तक की स्थिति के अनुसार अकेले रोटेरियन होंगे । इससे लोगों के बीच सुरेश जैन की और क्लब की विशेष पहचान बनी है और खास धाक बनी है । इस पहचान और धाक का फायदा स्वाभाविक रूप से महेश त्रिखा की उम्मीदवारी को मिलने का कुछेक लोग अनुमान लगा रहे हैं तो कई लोग दावा कर रहे हैं । दरअसल सुरेश जैन ने एकेएस के ट्रस्टीज सर्किल में शामिल होने की घोषणा करने के लिए जिस तरह से इस समारोह को चुना, उससे लोगों के बीच संदेश गया है कि उन्होंने और क्लब के पदाधिकारियों व सदस्यों ने अपनी योजनाओं व कार्रवाईयों को इस तरह से संयोजित करने पर ध्यान दिया है, जिससे कि महेश त्रिखा की उम्मीदवारी के संदर्भ में डिस्ट्रिक्ट में सकारात्मक माहौल बने और उनकी उम्मीदवारी को लाभ पहुँचे । इससे डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद का चुनाव सिर्फ महेश त्रिखा का चुनाव ही नहीं रह गया है, बल्कि उनके क्लब के प्रत्येक पदाधिकारी व सदस्य की जिम्मेदारी भी बन गया है । क्लब के अधिष्ठापन समारोह ने इसका नजारा भी दिखा दिया है । इससे महेश त्रिखा डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की चुनावी दौड़ में अपने प्रतिद्वंदी उम्मीदवारों से काफी आगे नजर आने लगे हैं । 

Monday, July 29, 2019

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल काउंसिल के सदस्यों चरनजोत सिंह नंदा, हंसराज चुग तथा विजय झालानी पर हालात को बिगाड़ने का आरोप लगा कर नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन हरीश चौधरी जैन व उनके नजदीकियों ने रीजनल काउंसिल में फैली अराजकता की तरफ से लोगों का ध्यान भटकाने का प्रयास किया

नई दिल्ली । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन हरीश चौधरी जैन तथा काउंसिल में उनके नजदीकी सदस्यों ने काउंसिल में फैली/पसरी अराजकता के लिए इंस्टीट्यूट के सेंट्रल काउंसिल सदस्य चरनजोत सिंह नंदा व हंसराज चुग और सरकार द्वारा नामित सदस्य विजय झालानी को जिम्मेदार ठहराना शुरू किया है । हरीश चौधरी जैन तथा उनके नजदीकी सदस्य लोगों के साथ की जाने वाली बातचीतों में लगातार आरोप लगाने लगे हैं कि अपने अपने स्वार्थ में यह तीनों रीजनल काउंसिल के दूसरे सदस्यों को भड़काए रखते हैं, और तरह तरह से उन्हें समर्थन देते रहते हैं - जिसके चलते काउंसिल के कुछेक पदाधिकारी तथा सदस्य किसी न किसी बहानेबाजी से कामकाज में बाधा डालते हुए झगड़े बनाए/बढ़ाए रखते हैं । हरीश चौधरी जैन और उनके नजदीकियों का मानना/कहना है कि विजय झालानी ने अविनाश गुप्ता व श्वेता पाठक के बीच हुए मामले में श्वेता पाठक का पक्ष लेते हुए 10 अप्रैल को चैयरमैन हरीश चौधरी जैन को फटकार लगाने वाला ईमेल संदेश न लिखा होता, तो मामला इतना न बिगड़ता । उनका कहना है कि सरकार ने विजय झालानी को इंस्टीट्यूट में इसलिए नामित नहीं किया है कि वह रीजनल काउंसिल के मामलों में अपनी टाँग अड़ाते फिरे और वहाँ झगड़े बढ़ाएँ । उसके बाद, 6 जून को बुलाई गई रीजनल काउंसिल की अधिकृत मीटिंग के रद्द हो जाने के बाद हुई अनौपचारिक मीटिंग में चरनजोत सिंह नंदा व हंसराज चुग ने नियम-कानूनों का वास्ता देकर मेलमिलाप कराने के जो प्रयास किए, वह वास्तव में हरीश चौधरी और उनके नजदीकियों को हतोत्साहित करने वाले थे । उक्त अनौपचारिक मीटिंग में चरनजोत सिंह नंदा व हंसराज चुग ने साफ साफ कहा कि यह नियम भी है और भलाई भी इसी में है कि चेयरमैन और सेक्रेटरी मिलजुल कर फैसले लें और हर फैसले में दोनों की भागीदारी सुनिश्चित हो । हरीश चौधरी जैन तथा उनके नजदीकियों का कहना है कि उक्त मीटिंग के बाद से नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में झगड़े और बढ़े हैं तथा हालात और ज्यादा बिगड़े हैं । 
हरीश चौधरी जैन तथा उनके नजदीकियों का कहना है कि विजय झालानी को चूँकि सेंट्रल काउंसिल में कोई खास तवज्जो नहीं मिल रही है, इसलिए अपने आप को व्यस्त रखने के लिए वह रीजनल काउंसिल के मामले में दिलचस्पी लेते हैं और यहाँ अपनी अहमियत दिखाने का प्रयास करते रहते हैं; चरनजोत सिंह नंदा व हंसराज चुग को चिंता है कि राजेंद्र अरोड़ा व नितिन कँवर के सेंट्रल काउंसिल का चुनाव लड़ने से उनके लिए मुकाबला चुनौतीपूर्ण हो जायेगा - इसलिए वह अभी से ही उन दोनों के पर कतर कर रखना चाहते हैं । उनकी खुशकिस्मती है कि राजेंद्र अरोड़ा व नितिन कँवर ने अपनी अपनी हरकतों से उन्हें मौका भी दे दिया है । हंसराज चुग को सुमित गर्ग व अविनाश गुप्ता की संभावित उम्मीदवारी से भी चुनौती मिल सकने का डर है ।कई लोगों को लगता है कि यह दोनों भी सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत कर सकते हैं, और इन्होंने यदि सचमुच उम्मीदवारी प्रस्तुत की, तो यह हंसराज चुग के लिए मुसीबत बनेंगे । मजेदार संयोग यह है कि राजेंद्र अरोड़ा, नितिन कँवर, सुमित गर्ग, अविनाश गुप्ता को ही चेयरमैन हरीश चौधरी जैन के नजदीकियों के रूप में देखा/पहचाना जाता है । गंभीर आरोप यही है कि इन्हीं चारों के दबाव में हरीश चौधरी जैन फैसले करते हैं और काउंसिल के वाइस चेयरपरसन, सेक्रेटरी व ट्रेजरर को अलग थलग रखते हैं । हरीश चौधरी जैन और उनके नजदीकियों के लिए मुसीबत की बात यह है कि उन्हें 'बाहर' से कहीं किसी का समर्थन प्राप्त नहीं है; उनकी कार्रवाईयों को उचित ठहराने वाला कोई नहीं है । विजय झालानी, चरनजोत सिंह नंदा, हंसराज चुग को लेकर उनके आरोप यदि सच भी हैं, तो भी कोई भी यह कहने/मानने वाला नहीं है कि उन्होंने कोई अनुचित बात की है, या अनामंत्रित रूप से घुसपैठ करने की कोशिश की है; वह तो मामले में तभी पड़े हैं, जब उनसे शिकायत की गई और उन्हें हालात को निपटाने में भूमिका निभाने के लिए आमंत्रित किया गया । यह अलग बात है कि उन्हें मौका मिला और उन्होंने अपनी अपनी 'जरूरतों' के हिसाब से मौके का फायदा उठाया ।
हरीश चौधरी जैन और उनके नजदीकियों ने विजय झालानी, चरनजोत सिंह नंदा व हंसराज चुग को जिस तरह से निशाना बनाना शुरू किया है - उससे रीजनल काउंसिल में हालात सुधरेंगे, इसकी तो किसी को उम्मीद नहीं है; उससे लेकिन रीजन की चुनावी राजनीति में नए बबाल जरूर पैदा होंगे । समझा जाता है कि विजय झालानी के साथ-साथ चरनजोत सिंह नंदा व हंसराज चुग को निशाने पर लेकर हरीश चौधरी जैन तथा उनके नजदीकियों ने दो उद्देश्य एक साथ साधने का प्रयास किया है - एक तरफ तो वह इन्हें दबाव में लेना/रखना चाहते हैं ताकि यह रीजनल काउंसिल के मामलों से दूर रहें, और दूसरी तरफ सेंट्रल काउंसिल की चुनावी राजनीति में यह अपनी अहमियत दिखाना चाहते हैं; लोगों के बीच यह अभी से इस बात को पहुँचाना चाहते हैं कि इनकी उम्मीदवारी की संभावना मात्र से सेंट्रल काउंसिल के सदस्यों को अगले चुनाव में अपने पुनर्निर्वाचन को लेकर डर पैदा हो गया है । हरीश चौधरी जैन तथा उनके नजदीकियों को एक तीसरा फायदा यह होता दिख रहा है कि उनके आरोपों से लोगों का ध्यान चुनावी राजनीति के समीकरणों पर जायेगा और रीजनल काउंसिल में फैली अराजकता की तरफ से हटेगा । हालाँकि कई लोगों को लगता है कि हरीश चौधरी जैन तथा उनके नजदीकियों ने यह जो राजनीति खेली है, इससे उन्हें तात्कालिक रूप से भले ही कोई फायदा होता हुआ दिखे, लेकिन कुल मिलाकर यह राजनीति उनकी मुसीबतों को बढ़ाने वाली ही साबित होगी । उनकी राजनीति क्या करेगी और उसका क्या नतीजा होगा, यह तो आगे पता चलेगा - अभी लेकिन उनके दाँव ने नॉर्दर्न रीजन के राजनीतिक खिलाड़ियों को चर्चा/कुचर्चा का अच्छा मौका जरूर दे दिया है ।

Sunday, July 28, 2019

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3054 में रोटरी फाउंडेशन का सिर्फ पैसा ही नहीं, बल्कि रोटरी के पदाधिकारियों के विश्वास को भी 'लूटने' वाले और सजा पाए पूर्व गवर्नर अनिल अग्रवाल को ऐसा क्यों लगता है कि वह यदि डिस्ट्रिक्ट 3011 में होते, तो कुछ भी करने के बावजूद बच निकलते ?

जयपुर । डिस्ट्रिक्ट 3011 में रोटरी फाउंडेशन के पैसों की लूट-खसोट की कोशिशों के जो किस्से सामने आ रहे हैं, उन्हें सुन/जान कर डिस्ट्रिक्ट 3054 के पूर्व गवर्नर अनिल अग्रवाल को अफसोस हो रहा है कि वह डिस्ट्रिक्ट 3011 में क्यों न हुए - वहाँ होते तो रोटरी फाउंडेशन से मिली ग्लोबल ग्रांट के पैसों में घपलेबाजी करने के मामले में न पकड़े जाते और न सजा पाते ? डिस्ट्रिक्ट 3011 में करोड़ों रुपए की ग्रांट में विवाद हुआ, लेकिन अंततः मामला 'मैनेज' हो गया; अनिल अग्रवाल करीब 20 लाख रुपए की ग्लोबल ग्रांट की घपलेबाजी में ऐसे फँसे कि तीन वर्षों के लिए रोटरी में ग्रांट्स, अवॉर्ड्स, असाइनमेंट्स व अपॉइंटमेंट्स से वंचित होने की सजा पा गए । उल्लेखनीय है कि अनिल अग्रवाल अपने डिस्ट्रिक्ट में उसी वर्ष गवर्नर थे, जिस वर्ष विनोद बंसल डिस्ट्रिक्ट 3011 में गवर्नर थे । विनोद बंसल ने अपने गवर्नर-वर्ष में अपने क्लब के प्रेसीडेंट राजेश गुप्ता को एकेएस का सदस्य बनवाया और बदले में उन्हें करीब ढाई/तीन करोड़ रुपए की ग्लोबल ग्रांट दिलवाई; अनिल अग्रवाल ने अपने नजदीकियों के क्लब को करीब 20 लाख रुपए की ग्लोबल ग्रांट दिलवाई ।दोनों ग्रांट्स के इस्तेमाल को लेकर आरोप लगे और विवाद हुआ । विनोद बंसल के क्लब वाली वाली ग्रांट के इस्तेमाल को लेकर लगे आरोपों के चलते उसका तीन तीन बार ऑडिट करने की नौबत आई; ग्रांट के इस्तेमाल में घपलेबाजी के आरोपों को देखते हुए क्लब के अगले एक प्रेसीडेंट ने उक्त ग्रांट के मामले में जिम्मेदारी लेने से इंकार कर दिया, जिस कारण उक्त ग्रांट क्लब से छिन कर दूसरे क्लब को ट्रांसफर हो गई; ग्रांट के मुख्य कर्ताधर्ता बने राजेश गुप्ता की भूमिका को संदेहास्पद मानते हुए उन्हें भी मुख्य कर्ताधर्ता का पद छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा - हालाँकि तब तक राजेश गुप्ता उक्त ग्रांट से जो जो फायदे ले सकते थे, वह ले चुके थे । उक्त ग्रांट के इस्तेमाल के मामले में पिछले से पिछले रोटरी वर्ष के गवर्नर रवि चौधरी ने खासा हाय-हल्ला मचाया था, लेकिन बार-बार आने वाली अड़चनों के बावजूद मामले पर अंततः धूल पड़ गई । दूसरी तरफ अनिल अग्रवाल अपने मामले में ऐसे फँसे कि रोटरी इंटरनेशनल व रोटरी फाउंडेशन के तमाम बड़े पदाधिकारियों व नेताओं की मदद के बावजूद बच न सके । इसीलिए अनिल अग्रवाल को अब डिस्ट्रिक्ट 3054 में होने का अफसोस हो रहा है; उन्हें लग रहा है कि काश वह भी डिस्ट्रिक्ट 3011 में होते - तो कुछ भी करके बच निकलते !
अनिल अग्रवाल की घपलेबाजी की कहानी वैसे किसी तिलस्मी कहानी से कम नहीं है, और यह कहानी 'बताती' है कि उनमें एक लेखक होने के गुण खूब हैं । पिछले करीब पाँच महीने से वह रोटरी के बड़े पदाधिकारियों को तरह तरह से लिखित में बता रहे हैं कि वह थोड़ा थोड़ा करके रोटरी फाउंडेशन के करीब 20 लाख रुपए चुका देंगे, लेकिन पट्ठे ने अभी तक इकन्नी भी नहीं दी है । उल्लेखनीय है कि अनिल अग्रवाल ने पहले रोटरी फाउंडेशन को लिखित में विश्वास दिलाया था कि वह 31 मार्च तक चार/पाँच किस्तों में उक्त रकम वापस कर देंगे । फाउंडेशन के पदाधिकारी उनकी बातों में आ गए और उनके खिलाफ की जाने वाली कार्रवाई को उन्होंने स्थगित कर दिया । किंतु जब 20 अप्रैल तक भी फाउंडेशन को कोई पैसा नहीं मिला, तो 25 अप्रैल को उन्हें सजा सुना दी गई । अपनी सजा को खत्म करवाने के लिए अनिल अग्रवाल ने नया झाँसा दिया और विश्वास दिलाया कि वह 30 जून तक पूरा पैसा दे देंगे । उन्होंने लिख कर बताया कि वह अलग अलग तारीखों के अलग अलग रकम के चेक जमा करा रहे हैं, लेकिन जो कभी जमा नहीं कराये गए । इस बीच उन्होंने नाटक रचा कि वह तो पैसे दे रहे हैं, लेकिन डिस्ट्रिक्ट पदाधिकारी पैसे ले ही नहीं रहे हैं । रोटरी इंटरनेशनल के बड़े पदाधिकारी तक अनिल अग्रवाल की झाँसापट्टी में फँस गए कि वह जब पैसा देने को तैयार हैं, तो डिस्ट्रिक्ट के पदाधिकारी पैसे ले क्यों नहीं रहे हैं ? उन्होंने मामले की जाँच  के लिए डिस्ट्रिक्ट 3150 के पूर्व गवर्नर लक्कराजु सत्यनारायण उर्फ टिक्कू के नेतृत्व में दो सदस्यीय कमेटी बना दी, जो जाँच के लिए जयपुर आई - अनिल अग्रवाल ने उनके सामने पैंतरा बदला और 30 जून तक पूरा पैसा देने की बात से मुकर कर 30 जून तक पाँच लाख रुपए की पहली किस्त दे देने की लिखित घोषणा की, लेकिन जिस पर अभी तक अमल नहीं हुआ है । इससे पहले अनिल अग्रवाल की बातों में आकर निवर्त्तमान इंटरनेशनल डायरेक्टर बासकर चॉकलिंगम ने अनिल अग्रवाल के साथ रियायत बरतने तथा उनके खिलाफ कोई कठोर फैसला न लेने का अनुरोध करते हुए फाउंडेशन ट्रस्टी गुलाम वाहनवती से बाकायदा लिखित में सिफारिश तक कर दी थी । 
इस तरह अनिल अग्रवाल ने रोटरी का सिर्फ पैसा ही नहीं 'लूटा' - रोटरी और रोटरी फाउंडेशन के पदाधिकारियों का विश्वास भी लूटा, और हर मौके पर उन्हें बेवकूफ बनाने की ही कोशिश की है । 30 जून के बाद अनिल अग्रवाल ने एक नया नाटक शुरू किया - उन्होंने डिस्ट्रिक्ट के पदाधिकारियों से कहा/पूछा कि वह एक लाख रुपए जमा कराना चाहते हैं और नगद जमा कराना चाहते हैं, किस अकाउंट में करवाएँ । अनिल अग्रवाल पिछले पाँच महीने में छत्तीस बार अकाउंट नंबर पूछ चुके हैं, और उन्हें छतीस बार अकाउंट नंबर बताया जा चुका है । इस बार भी उन्हें सूचित किया गया कि अकाउंट नंबर वही है, जो उन्हें पहले कई बार बताया जा चुका है; साथ ही उन्हें बताया गया कि लेन देन संबंधी नियमों के अनुसार यह रकम वह नगद में जमा नहीं करा सकते हैं, यह रकम वह चेक से ही जमा करा सकते हैं । अनिल अग्रवाल ने इस पर फिर पुराना राग छेड़ दिया कि वह तो पैसा दे रहे हैं, डिस्ट्रिक्ट के पदाधिकारी ले ही नहीं रहे हैं । डिस्ट्रिक्ट के पदाधिकारी यह सोच सोच कर परेशान हैं कि अनिल अग्रवाल जो एक लाख रुपए देना चाह रहे हैं, वह क्या चोरी-चकारी के पैसे हैं जो वह नगद देने पर जोर दे रहे हैं । इससे भी बड़ा नाटक अनिल अग्रवाल ने रोटरी क्लब जयपुर नॉर्थ के जरिए किया । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर को डिस्ट्रिक्ट अकाउंट में रोटरी क्लब जयपुर नॉर्थ से दो लाख रुपए ट्रांसफर होने की जानकारी मिली, तो डिस्ट्रिक्ट गवर्नर ने क्लब के प्रेसीडेंट से पूछा कि यह रकम किसलिए है ? प्रेसीडेंट ने उन्हें बताया कि डिस्ट्रिक्ट अकाउंट में कोई रकम भेजे जाने की उन्हें कोई जानकारी नहीं है, वह पता करके बताते हैं । बाद में प्रेसीडेंट ने उन्हें सूचित किया कि उक्त रकम गलती से डिस्ट्रिक्ट अकाउंट में ट्रांसफर हो गई है, और उस रकम को वह क्लब के अकाउंट में वापस कर दें । इस बीच लेकिन अनिल अग्रवाल ने दावा किया कि रोटरी क्लब जयपुर नॉर्थ से डिस्ट्रिक्ट अकाउंट में जो दो लाख रुपए गए हैं, वह रोटरी फाउंडेशन को वापस किए जाने वाले करीब 20 लाख रुपए की पहली किस्त है । अनिल अग्रवाल के दावों की जाँच के लिए रोटरी इंटरनेशनल की तरफ से लक्कराजु सत्यनारायण उर्फ टिक्कू के नेतृत्व वाली जो जाँच कमेटी जयपुर आई थी, उसके सामने भी उन दो लाख रुपयों का मामला आया । वहाँ भी अनिल अग्रवाल ने प्रेसीडेंट पर दबाव बनाने की कोशिश की कि वह उनके दावे का समर्थन करे । प्रेसीडेंट ने लेकिन साफ कह दिया कि इस बारे में फैसला लेने का अधिकार क्लब के बोर्ड को है, और वह किसी दावे का समर्थन नहीं कर सकते हैं । तब जाँच कमेटी के सदस्यों ने प्रेसीडेंट से कहा कि वह दो/चार दिन में क्लब के बोर्ड के फैसले से अवगत करवाएँ । दो/चार दिन में क्लब की तरफ से डिस्ट्रिक्ट गवर्नर को फैसला सुना दिया गया कि उक्त रकम गलती से डिस्ट्रिक्ट अकाउंट में चली गई है, और उसे जल्दी वापस किया जाए । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर ने क्लब की तरफ से मिले इस फैसले से जाँच कमेटी के सदस्यों को अवगत करवाया और उनसे पूछा कि उन दो लाख रुपयों कह क्या करें ? जाँच कमेटी के सदस्य बेचारे मुँह में दही जमाये बैठे हैं कि क्या जबाव दें ?
अनिल अग्रवाल ने झूठे दावे करके और तरह तरह से झाँसे देकर रोटरी के जिन पदाधिकारियों और नेताओं का समर्थन जुटाने का प्रयास किया, उन सभी को मामले से संबद्ध लोगों के सामने लज्जित होना पड़ा है । अनिल अग्रवाल के चक्कर में अभी हाल ही में विनोद बंसल को भी विवाद व खासी फजीहत का शिकार होना पड़ा । दरअसल 12 जुलाई को रोटरी क्लब जयपुर के नए पदाधिकारियों के अधिष्ठापन समारोह में विनोद बंसल को मुख्य अतिथि तथा अनिल अग्रवाल को विशिष्ट अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया था । चर्चा रही कि अनिल अग्रवाल ने ही उक्त समारोह में विनोद बंसल को मुख्य अतिथि बनवाया था, और मुख्य अतिथि बनने के लालच में विनोद बंसल भी रोटरी इंटरनेशनल द्वारा दोषी ठहराए गए तथा सजा प्राप्त अनिल अग्रवाल के साथ मंच शेयर करने के लिए तैयार हो गए । विनोद बंसल को कई लोगों ने समझाया था कि इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की अपनी उम्मीदवारी को ध्यान में रखते हुए उन्हें अनिल अग्रवाल जैसे 'सजायाफ्ता' के साथ मंच शेयर नहीं करना चाहिए, लेकिन विनोद बंसल को पहले तो यह बात समझ में नहीं आई लेकिन 'रचनात्मक संकल्प' में 9 जुलाई को रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद जो बबाल मचा, तो फिर विनोद बंसल और अनिल अग्रवाल को रोटरी क्लब जयपुर के कार्यक्रम में एकसाथ दिखने की योजना को स्थगित करने के लिए मजबूर होना पड़ा । इस तरह अनिल अग्रवाल का हर दाँव उल्टा पड़ता जा रहा है । अनिल अग्रवाल के शुभचिंतकों की कमी नहीं है; रोटरी के बड़े बड़े पदाधिकारी और नेता उन्हें बचाने के प्रयासों में लगे हैं, लेकिन अनिल अग्रवाल ने अपनी झाँसेबाजियों से मामला इस कदर उलझा लिया है कि उन्हें बचाने तथा उनके साथ खड़े/बैठने दिखने के लिए तैयार रहने वाले लोगों को भी फजीहत का शिकार होना पड़ता है । डिस्ट्रिक्ट 3011 की घटनाओं को देखते हुए अनिल अग्रवाल को लेकिन लग रहा है कि वह यदि डिस्ट्रिक्ट 3011 में होते तो घपलेबाजी करने के मामले में यदि पकड़े भी जाते, तो भी सजा पाने से तो बच ही जाते ! 

Saturday, July 27, 2019

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3011 में रोटरी फाउंडेशन के लिए पैसे इकट्ठे करने के लिए विनोद बंसल के बनाए फार्मूले - 'दो, और उसके तिगुने लो' - ने विनय भाटिया का रिकॉर्ड बनवाने के साथ-साथ रोटरी फाउंडेशन के पैसों की लूट की जो 'तस्वीर' दिखाई है, उसे देख/समझ कर जरूरतमंदों की मदद के लिए पैसे देने वाले लोग अपने आप को ठगा पा रहे हैं

नई दिल्ली । रोटरी फाउंडेशन को दिया गया दान वापस माँगने की रोटरी क्लब दिल्ली मिडटाऊन के प्रेसीडेंट सुरेश गुप्ता की कार्रवाई ने रोटरी फाउंडेशन के पदाधिकारियों के बीच खासी खलबली तो मचा ही दी है, साथ ही डिस्ट्रिक्ट 3011 में रोटरी फाउंडेशन के पैसों की होने वाली लूट की 'तैयारी' पर भी उनका ध्यान खींचा है । रोटरी में इससे पहले शायद ही कभी हुआ हो कि रोटरी फाउंडेशन में दिए गए दान को किसी ने वापस माँगा हो; और इससे पहले शायद ही किसी डिस्ट्रिक्ट में रोटरी फाउंडेशन की बड़ी लूट का मामला सामने आया हो - मजे की बात यह है कि डिस्ट्रिक्ट 3011 में रोटरी फाउंडेशन की लूट का बड़ा मामला तो सामने आया ही है, तथा उसके पकड़े जाने के साथ-साथ ही और लूट की 'तैयारी' की बात सामने आई है, लेकिन उसके लिए किसी को भी आधिकारिक रूप से जिम्मेदार नहीं ठहराया जा रहा है, सजा मिलना तो दूर की बात है । डिस्ट्रिक्ट 3011 में निवर्त्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विनय भाटिया ने पहले तो घपलेबाजी के आरोप के चलते रोटरी क्लब दिल्ली मिडटाऊन द्वारा वापस की गई ग्लोबल ग्रांट को रोटरी क्लब दिल्ली सेंट्रल को दिलवाने की 'बेईमानी' की और फिर रोटरी फाउंडेशन से और ज्यादा ग्रांट बटोरने के नाम पर रोटरी फाउंडेशन के लिए मोटी रकम इकट्ठी करने का 'करतब' किया । विनय भाटिया के इसी करतब को देखते हुए सुरेश गुप्ता का रोटरी फाउंडेशन से विश्वास उठ गया है और उन्हें लग रहा है कि अच्छी और सच्ची भावना से रोटरी फाउंडेशन को दिए गए दान को कुछेक बड़े खिलाड़ी तरह तरह की योजनाओं से हड़प लेते हैं । सुरेश गुप्ता क्लब का प्रेसीडेंट बनने से पहले ही मेजर डोनर बन चुके हैं, और अपने प्रेसीडेंट-वर्ष में उन्होंने एकेएस (ऑर्च क्लम्प सोसायटी) का सदस्य बनने की घोषणा की थी - लेकिन रोटरी फाउंडेशन के पैसों की खुली लूट के किस्सों को देखते हुए उन्होंने अपना इरादा बदल लिया है । रोटरी इंटरनेशनल के दिल्ली स्थित साऊथ एशिया ऑफिस में रोटरी फाउंडेशन के मुखिया संजय परमार को लिखे पत्र में सारा हवाला देते हुए सुरेश गुप्ता ने रोटरी फाउंडेशन में दिए गए अपने पैसे वापस करने का अनुरोध किया है । 
सुरेश गुप्ता के इस अनुरोध ने रोटरी फाउंडेशन के पदाधिकारियों के बीच खासी हलचल मचा दी है । उन्हें डर हुआ है कि रोटरी फाउंडेशन ने इसी तरह से यदि और रोटेरियंस का विश्वास खो दिया, तो बड़ी समस्या हो जाएगी । इस समस्या की आशंका के चलते डिस्ट्रिक्ट 3011 में रोटरी फाउंडेशन के नाम पर जो घपलेबाजियाँ हो रही हैं, उन पर रोटरी फाउंडेशन के पदाधिकारियों का ध्यान गया है । इससे डिस्ट्रिक्ट 3011 में रोटरी फाउंडेशन के लिए 15 लाख डॉलर से अधिक की रकम का जमा होना संशय में आ गया है और रोटरी फाउंडेशन के बड़े पदाधिकारियों को भी आशंका हो चली है कि इस जमा हुई रकम के पीछे किसी बड़े घपले की तैयारी तो नहीं है । यह आशंका दरअसल इसलिए भी है क्योंकि निवर्त्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विनय भाटिया ने अपने गवर्नर-वर्ष के पहले ग्यारह महीनों में, यानि मई महीने तक रोटरी फाउंडेशन के लिए करीब साढ़े चार लाख डॉलर ही इकट्ठा किए थे, लेकिन आखिरी महीने में इकट्ठा हुई रकम का आँकड़ा ऊँची छलाँग लगा कर पंद्रह लाख डॉलर से भी ऊपर तक पहुँच गया । और इस रकम का बड़ा हिस्सा परोपकार के लिए नहीं, बल्कि परोपकार के नाम पर रोटरी फाउंडेशन से तीन से चार गुना रकम लेने के लिए 'दिया' गया है । लोगों के बीच होने वाली चर्चाओं में कहा/सुना जा रहा है कि कुछेक अस्पतालों/संस्थाओं से बात करके उनकी जरूरत की मशीनें व उनकी जरूरत के काम कुल लागत के आधे में या दो-तिहाई में करने/करवाने का ऑफर देकर उनसे सौदेबाजी की गई है । उदाहरण के लिए किसी अस्पताल/संस्था का कोई प्रोजेक्ट एक करोड़ रुपए का है; उसे ऑफर दिया गया कि उसका वह प्रोजेक्ट 70 लाख में लगवा देंगे; उससे 70 लाख लिए, उसमें से 40/50 लाख रोटरी फाउंडेशन में जमा करवाए और बाकी अपनी जेब में रख लिए । रोटरी फाउंडेशन को एक करोड़ रुपए का प्रोजेक्ट दे दिया - उससे मिले एक करोड़ रुपए से अस्पताल/संस्था का प्रोजेक्ट लग गया/जायेगा । इस तरह से रोटरी में नाम भी हो गया, जिसके चलते रोटरी में कोई अवॉर्ड या असाइनमेंट मिल जायेगा; किसी प्रोजेक्ट में अपनी स्वर्गीय माता का नाम चिपकाने का मौका भी मिल गया और बैठे/बिठाए कमाई भी हो गई । ऐसे ही 'मौकों' के लिए कहावत बनी होगी - 'हींग लगे न फिटकरी, रंग और स्वाद चोखा ।' 
संजय परमार को लिखे सुरेश गुप्ता के पत्र ने लेकिन रंग और स्वाद बिगाड़ने का काम किया है । हालाँकि कई लोगों का कहना है कि यह कुछेक दिनों का बबाल है जो जल्दी ही शांत हो जायेगा और होगा कुछ नहीं । दरअसल रोटरी में सिस्टम ही कुछ ऐसा है कि बेईमानी करने वाले लोग होशियारी करके बड़ी आसानी से बच निकलते हैं । कुछेक 'मूर्ख' लोग हालाँकि फँसे भी हैं और सजा पाए हैं, लेकिन अधिकतर मामलों में मामला रफा/दफा ही होता देखा गया है । विनय भाटिया जिस तरह से रोटरी क्लब दिल्ली मिडटाऊन द्वारा वापस की गई ग्रांट को रोटरी क्लब दिल्ली सेंट्रल को 'दिलवाने' के मामले में फँसे, और साफ बच निकले - उससे ही उन्हें अपने गवर्नर वर्ष के अंतिम महीने में रोटरी फाउंडेशन के लिए पैसा इकट्ठा करने के लिए सौदेबाजी करने का हौंसला मिला होगा । इस सौदेबाजी में उन्हें पूर्व गवर्नर विनोद बंसल की मदद मिली सुनी/बताई जा रही है । विनय भाटिया इसीलिए आश्वस्त होंगे कि कहीं कुछ मामला फँसेगा, तो विनोद बंसल उन्हें बचा लेंगे । असल में रोटरी फाउंडेशन को दान देकर उससे तीन/चार गुना पैसे लेने के 'काम' को ऑर्गेनाइज्ड रूप देने का फंडा स्थापित करने का विनोद बंसल को ही श्रेय दिया जाता है । इस खेल का 'महारथी' होने के कारण विनोद बंसल हर वर्ष रोटरी फाउंडेशन के लिए अच्छी/मोटी रकम इकट्ठा करवाते हैं । उनकी मदद से उनके क्लब को भी रोटरी फाउंडेशन से खूब पैसे मिले हैं । इस बार भी उनके क्लब ने सबसे ज्यादा - करीब सवा दो लाख डॉलर रोटरी फाउंडेशन में दिए हैं; और इस तरह इसका करीब तीन गुना तो रोटरी फाउंडेशन से लेने की तैयारी की है । रवि चौधरी के गवर्नर-वर्ष में भी विनोद बंसल के क्लब ने रोटरी फाउंडेशन से मोटी रकम लेने की योजना बनाई थी, लेकिन हिस्सा न मिलने के कारण रवि चौधरी ने उसमें पंक्चर कर दिया था, और रोटरी फाउंडेशन के ट्रस्टी गुलाम वाहनवती के सामने विनोद बंसल तथा उनके क्लब के अन्य पदाधकारियों की बड़ी हील-हुज्जत की थी । विनोद बंसल का 'दो, और उसका तिगुना लो' का जो फार्मूला है, वह सुनने/देखने में तो उपयोगी लगता है और आकर्षित करता है, लेकिन अपनी शुरुआत से ही यह लालच, स्वार्थ व बेईमानी के रास्ते पर चल पड़ता है; दरअसल इस फार्मूले के तहत रोटरी फाउंडेशन में कोई भी 'देता' इसीलिए है, क्योंकि उसे तीन गुना 'लेना' होता है; और जब लेने की भावना प्रबल होती है तो फिर वह किसी भी तरह की बेईमानी करने से नहीं हिचकती है । इस बेईमानी और लूट की कोशिश उन लोगों की भावनाओं को ठगती है, जो सचमुच की जरूरत के लिए रोटरी फाउंडेशन में पैसे देते हैं । उन्हें लगता है कि रोटरी फाउंडेशन को दिया गया उनका पैसा जरूरतमंदों तक पहुँचने की बजाए रोटेरियंस के भेष में बैठे ठगों व लुटेरों की जेबों में चला जाता है । विनोद बंसल के ही डिस्ट्रिक्ट में, रोटरी क्लब दिल्ली मिडटाऊन के प्रेसीडेंट सुरेश गुप्ता ने अपने आप को ठगे जाने वाले लोगों में पाया, तो वह रोटरी फाउंडेशन को दिए गए अपने पैसों को वापस माँगने के लिए मजबूर हुए ।