Sunday, May 10, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया की सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल से सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवार बने मनु अग्रवाल ने लगता है कि पिछली बार की गलतियों से कोई सबक नहीं सीखा है; और इसीलिए उनके शुभचिंतकों को भी डर हुआ है कि पिछली बार की तरह कहीं इस बार भी हाथ में आता आता मौका फिसल कर निकल न जाए

कानपुर । मनु अग्रवाल ने अपने खुद के रवैये से ही सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत अपनी उम्मीदवारी को मजाक का विषय बना दिया है, और अपने लिए विरोध व मुसीबत का माहौल बना लिया है । उल्लेखनीय है कि इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल काउंसिल के लिए सेंट्रल रीजन में पिछली बार मामूली अंतर से जीतने से रह गए मनु अग्रवाल अगली बार अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करने की घोषणा लगातार करते रहे थे और थोड़ी बहुत जितनी संभव थी उतनी सक्रियता भी बनाए हुए थे । किंतु अभी चार-पाँच महीने पहले उन्होंने अचानक से ऐलान कर दिया कि वह चुनाव में चक्कर में नहीं पड़ेंगे और अपने कामधाम में ध्यान देंगे । लोगों को उन्होंने खुद ही बताया कि उन्हें एक बड़ा बिजनेस मिल रहा है, जिसमें उन्हें खूब कमाई होगी - इसलिए वह अपना समय और अपनी एनर्जी उसमें लगायेंगे । चुनाव, चुनावी राजनीति, चुने गए सदस्यों के क्रियाकलापों को लेकर उन्होंने बहुत ही नकारात्मक तथा आपत्तिजनक किस्म की बातें कहीं; जिनका लब्बोलुबाब यह था कि चुनाव-फुनाव क्या होता है, चुने जाने के बाद सदस्य अपना घर भरने में ही लगे रहते हैं, मुझे अपना घर भरने का जब दूसरा मौका मिल रहा है तो मैं चुनाव के चक्कर में क्यों पडूँ ? आदि-इत्यादि । उनकी इस तरह की बातें चल ही रही थीं कि लोगों ने देखा/पाया कि उन्होंने अचानक से फिर पलटा खाया और वह दोबारा से अपनी उम्मीदवारी की बात करने लगे । उन्होंने तो नहीं बताया कि जिस बड़े बिजनेस के लिए उन्होंने पहले अपनी उम्मीदवारी को छोड़ने की घोषणा कर दी थी, उसके लिए समय और एनर्जी कैसे निकालेंगे; लेकिन उनके नजदीकियों ने बताया कि जिस बड़े बिजनेस के चक्कर में उन्होंने चुनाव से हटने की घोषणा की थी, वह बड़ा बिजनेस उन्हें मिला ही नहीं, और इसलिए वह वापस चुनाव लड़ने की तैयारी में जुट गए । इस कारण से मनु अग्रवाल को लोगों के इस सवाल का सामना अक्सर करना पड़ जाता है कि अब यदि उन्हें फिर से ज्यादा कमाई करने के लिए चुनाव लड़ने के अलावा कोई और बिजनेस मिल गया, तो क्या वह फिर से अपनी उम्मीदवारी छोड़ देंगे ? मनु अग्रवाल समझते हैं कि यह सवाल उन्हें चिढ़ाने के लिए पूछा जाता है, इसलिए इस सवाल को वह अलग अलग तरीकों से दाएँ-बाएँ कर देते हैं । 
मनु अग्रवाल का दावा है कि अपने धुर विरोधियों अक्षय गुप्ता और राजीव मेहरोत्रा को उन्होंने अपनी उम्मीदवारी का समर्थन करने के लिए राजी कर लिया है; और 'हम तीनों' ने तय किया है कि अब की बार कानपुर से मैं अकेला ही उम्मीदवार बनूँ, ताकि कानपुर से सीट को पक्का किया जा सके । मनु अग्रवाल के इस दावे ने कानपुर में कई लोगों को भड़काया और उन्होंने कहना शुरू किया कि कानपुर में क्या हो, इसे 'तुम तीनों' ही क्यों तय करोगे ? मामला बढ़ा तो अक्षय गुप्ता और राजीव मेहरोत्रा को सफाई देने सामने आना पड़ा और उन्होंने कहा कि उन्होंने तो बस इतना कहा है कि वह उम्मीदवार नहीं हो रहे हैं; कौन उम्मीदवार हो या न हो, इसे वह भला कैसे तय कर सकते हैं; और जहाँ तक इसकी बात है कि वह किसका समर्थन करेंगे, तो इसका फैसला वह तब करेंगे जब सारा सीन क्लियर हो जायेगा । मजे की बात यह है कि मनु अग्रवाल बिजनेस के चक्कर में अपनी उम्मीदवारी से पीछे हटने से पहले जब उम्मीदवार होने की बात कर रहे थे, तब तो अक्षय गुप्ता और राजीव मेहरोत्रा भी अपनी अपनी उम्मीदवारी की बातें कर रहे थे; लेकिन जब मनु अग्रवाल बिजनेस के चक्कर में पीछे हटे, तो इन्होंने भी अपनी अपनी उम्मीदवारी की बात करना बंद कर दिया । इससे समझा यह जा रहा है कि इन्हें उम्मीदवार होना कभी नहीं था, यह तो बस मनु अग्रवाल का काम बिगाड़ने के लिए अपनी अपनी उम्मीदवारी की बात चला रहे थे । हाँ-न-हाँ का जो तमाशा मनु अग्रवाल ने दिखाया, वैसा तमाशा चूँकि यह दोनों नहीं कर सकते हैं - इसलिए मनु अग्रवाल अपने आप को निश्चिंत और अकेला मान रहे हैं । मनु अग्रवाल मान रहे हैं और कह रहे कि इन दोनों के पास उनका समर्थन करने के अलावा और कोई चारा भी नहीं होगा; इनके समर्थन से विवेक खन्ना के उम्मीदवार हो सकने की संभावना को भी मनु अग्रवाल यह कहते/बताते हुए खारिज कर रहे हैं कि विवेक खन्ना अपनी पारिवारिक मुश्किलों में बुरी तरह उलझे हुए हैं, इसलिए वह चाहते हुए भी उम्मीदवार नहीं हो सकेंगे - और इस तरह कानपुर का मैदान उनके लिए पूरी तरह खाली है । 
यह सच लग भी रहा है कि कानपुर में मनु अग्रवाल को चुनावी चुनौती का सामना नहीं करना पड़ रहा है - किंतु इससे उनकी राह आसान नहीं हो गई है । कानपुर की और इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति की बारीकियों को जानने/समझने वाले लोगों का कहना है कि मनु अग्रवाल दरअसल कुछेक गलतफहमियों के शिकार हैं और स्थितियों को तथ्यपरक रूप से नहीं, बल्कि अपनी सुविधा के नजरिये से देख रहे हैं । मनु अग्रवाल को सबसे बड़ी गलतफहमी यही है कि पिछली बार उन्हें जो थोड़े से वोट कम पड़ गए थे, उनकी भरपाई तो वह आराम से कर लेंगे और इसलिए उन्हें ज्यादा कुछ करने की जरूरत ही नहीं है । कानपुर में किसी और उम्मीदवार के न होने से उनका काम और आसान हो गया है । लोगों का कहना/पूछना लेकिन यह है कि चुनावी समीकरण यदि इतने ही सीधे होते तो पिछली बार रवि होलानी क्यों हारते ? दरअसल हर बार चुनाव का एक नया गणित होता है, और एक नई केमिस्ट्री होती है - इसे समझने/पहचानने की कोशिश जो नहीं करता है, वह औंधे मुँह ही गिरता है । कानपुर में कई लोगों का कहना है कि पिछली बार मनु अग्रवाल ने अपनी उम्मीदवारी को यदि थोड़ा गंभीरता से लिया होता, तो वह सेंट्रल काउंसिल में होते । पिछली बार उन्हें मुकेश कुशवाह ने नहीं हराया था, उनकी खुद की मूर्खताओं व लापरवाहियों ने उन्हें हराया था । कानपुर में लोगों को लग रहा है कि पिछली बार की गलतियों से उन्होंने लगता नहीं है कि कोई सबक सीखा है । 
मनु अग्रवाल ने पिछले तीन-चार महीनों में जिस तरह की हरकतें/बातें की हैं, उससे उन्होंने अपनी स्थिति को कमजोर ही किया है । उनकी कमजोरी का पूरा पूरा फायदा अविचल कपूर ने उठाया है । कानपुर में एक बड़ा तबका मनु अग्रवाल के खिलाफ है - सच होते हुए भी यह कोई खास बात नहीं है । हर जगह दो खेमे होते ही हैं । समस्या तब बड़ी हो जाती है जब आप खिलाफ लोगों के साथ होशियारी से डील करने का प्रयास नहीं करते हैं । कानपुर में मनु अग्रवाल के लिए समस्या की बात यह है कि कानपुर के मठाधीशों को डर यह है कि मनु अग्रवाल यदि जीत गए तो उनकी मठधीशी ही खत्म हो जायेगी; अपनी मठधीशी बचाने के लिए उन्हें यह जरूरी लग रहा है कि वह मनु अग्रवाल को जीतने से रोकें । यही मठाधीश अविचल कपूर का समर्थन करते हुए सुने जा रहे हैं । कानपुर में अकेले उम्मीदवार होने के नाते मनु अग्रवाल के लिए भावनात्मक अपील बनाना हालाँकि संभव है और मनु अग्रवाल इसके लिए प्रयास भी करते देखे गए हैं; किंतु उनके प्रयास प्रायः इतने फूहड़ और नकारात्मक साबित हुए हैं कि उनसे बात बनने की बजाये बिगड़ और गई है । मनु अग्रवाल के शुभचिंतकों का भी मनना और कहना है कि वैसे तो मनु अग्रवाल के लिए अब की बार अच्छा मौका है, लेकिन यदि उन्होंने हालात को समझदारी से हैंडल नहीं किया तो पिछली बार की तरह हाथ में आता आता मौका फिसल कर निकल भी सकता है । 

Saturday, May 9, 2015

रोटरी इंटरनेशनल ट्रेनिंग लीडर का पद प्राप्त करने के चलते इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की चुनावी राजनीति में रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3010 के विनोद बंसल की संभावित उपस्थिति क्या सचमुच में खासी वजनदार बन गई है ?

नई दिल्ली । विनोद बंसल के रोटरी इंटरनेशनल ट्रेनिंग लीडर बनने की खबर से रोटरी इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव के लिए सज रहे 'बहादुरों' तथा दूसरे खिलाड़ियों के बीच हड़कंप मच गया है । दरअसल रोटरी की चुनावी राजनीति में रोटरी इंटरनेशनल ट्रेनिंग लीडर के पद को इंटरनेशनल डायरेक्टर पद तक पहुँचने की सीढ़ी के रूप में देखा/पहचाना जाता है । इंटरनेशनल कन्वेंशन में करीब साढ़े पाँच सौ डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को ट्रेंड करने के लिए विभिन्न देशों से करीब चालीस पूर्व गवर्नर्स को ट्रेनिंग लीडर के रूप में चुना जाता है । भारत से दो पूर्व गवर्नर्स को इंटरनेशनल ट्रेनिंग लीडर के रूप में चुना जाता है - एक दक्षिण भारत से और दूसरा गैर दक्षिण भारत से । माना/समझा जाता है कि रोटरी राजनीति के बड़े खिलाड़ी ऐसे पूर्व गवर्नर्स को ही इंटरनेशनल ट्रेनिंग लीडर चुनते हैं, जिन्हें वह आगे बढ़ाना चाहते हैं । इसीलिए विनोद बंसल के इंटरनेशनल ट्रेनिंग लीडर चुने जाने पर इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के संभावित उम्मीदवारों की नींद उड़ जाना स्वाभाविक ही है । यह नींद उड़ना इसलिए भी स्वाभाविक है कि इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए अभी जो लोग दौड़ लगाते दिख रहे हैं, उनमें विनोद बंसल को तो काफी पीछे माना/समझा जा रहा है । इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की चुनावी दौड़ में आगे दिखने वाले लोगों में भरत पांड्या, अशोक गुप्ता, दीपक कपूर, सुरेंद्र सेठ आदि का नाम लिया जा रहा है; तो इनके बाद के लोगों में जेटी व्यास, गुलाम वाहनवती, आलोक बिलौरे, विनय कुलकर्णी, राजीव प्रधान आदि का नाम लिया/सुना जा रहा है । विनोद बंसल का नाम तो इनके बाद कहा/बताया जाता है । कुछेक लोग तो यहाँ तक कहते/मानते हैं कि विनोद बंसल तो वास्तव में अगली से अगली बार के लिए उम्मीदवार बनने की तैयारी कर रहे हैं । 
विनोद बंसल को लेकिन लंबी छलांग के खिलाड़ी के रूप में भी देखा/पहचाना जाता है । बहुत सी पोजिशंस उन्होंने बहुत ही जल्दी प्राप्त की हैं । जिन पोजिशंस को प्राप्त करने में दूसरों को लंबा इंतजार करना पड़ा है तथा काफी एड़ियाँ रगड़नी पड़ी हैं, उन्हें विनोद बंसल ने चमत्कारिक तरीके से बहुत ही कम समय में हासिल किया है । रोटरी के बड़े पदाधिकारियों तथा नेताओं के साथ नजदीक व विश्वास के संबंध बनाने में विनोद बंसल ने जो कामयाबी हासिल की है, उसके चलते तो वह कई लोगों के बीच ईर्ष्या के पात्र भी बन गए हैं । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर होते हुए ही विनोद बंसल को दिल्ली में प्रस्तावित रोटरी इंस्टीट्यूट के चेयरमैन बनने का जो मौका मिल रहा था, उसकी आहट से उनके अपने डिस्ट्रिक्ट के कुछेक पूर्व गवर्नर्स तो इतना जल-भुन गए थे कि उन्होंने दिल्ली में इंस्टीट्यूट होने की संभावना में ही मट्ठा डाल दिया था । दिल्ली की बजाये चेन्नई में हुए इंस्टीट्यूट में विनोद बंसल को हालाँकि वाइस चेयरमैन के पद से ही संतोष करना पड़ा था, लेकिन दूसरे वाइस चेयरमैनों की तुलना में वह काफी 'जूनियर' ही थे । बहुत ही कम समय में तथा तेज रफ्तार के साथ विनोद बंसल ने रोटरी में जो कुछ पाया है, उसे देखते/जानते हुए रोटरी की राजनीति में वह बहुतों के लिए चुनौती बन गए हैं - कईयों को तो उन्होंने पीछे धकेल दिया है । 
रोटरी इंटरनेशनल ट्रेनिंग लीडर बन कर विनोद बंसल ने अपने डिस्ट्रिक्ट - जो अभी डिस्ट्रिक्ट 3010 ही है, डिस्ट्रिक्ट 3011 तो एक जुलाई से होगा  - के ही कई तुर्रमखाओं को जैसे जमीन सुँघा दी है । डिस्ट्रिक्ट 3010 में अभी तक सुशील गुप्ता, राजेश बत्रा, रंजन ढींगरा ही इंटरनेशनल ट्रेनिंग लीडर बने हैं । विनोद बंसल के रूप में डिस्ट्रिक्ट 3010 को कई वर्षों के बाद इंटरनेशनल ट्रेनिंग लीडर का पद मिला है । दूसरे महत्वाकांक्षी व आगे बढ़ने के लिए तिकड़में और जुगाड़ लगाते रहने वाले, तथा खुद को डिस्ट्रिक्ट का 'चौधरी' समझने/बताने वाले नेताओं को विनोद बंसल की इस उपलब्धि से खासा तगड़ा झटका लगा है । उन्हें झटका इस कारण से भी लगा है, क्योंकि वह भी जान/समझ रहे हैं कि इंटरनेशनल ट्रेनिंग लीडर के रूप में विनोद बंसल को अगले रोटरी वर्ष में जयपुर में होने जा रहे रोटरी इंस्टीट्यूट में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को ट्रेनिंग देने का मौका मिलेगा और इस वजह से रोटरी इंस्टीट्यूट में उन्हें खासी अहमियत मिलेगी । डिस्ट्रिक्ट के कुछेक चौधरियों की नींद लेकिन यह जान/देख कर और भी ज्यादा उड़ी हुई है कि इंटरनेशनल ट्रेनिंग लीडर का पद प्राप्त करने के चलते इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की चुनावी राजनीति में विनोद बंसल की संभावित उपस्थिति खासी वजनदार बन गई है ।  
रोटरी इंटरनेशनल ट्रेनिंग लीडर बन कर विनोद बंसल ने इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की चुनावी दौड़ में शामिल नेताओं के बीच जिस तरह से खलबली मचाई है, उसके कारण रोटरी की चुनावी राजनीति खासी दिलचस्प भी हो गई है । 

Friday, May 8, 2015

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3080, यानि राजा साबू के डिस्ट्रिक्ट की रोटरी इंटरनेशनल में दर्ज हुई शिकायत के साथ प्रस्तुत हुईं कॉन्करेंस की संख्या तथा शिकायत की ड्रॉफ्टिंग से साबित और जाहिर यह हुआ है कि टीके रूबी ने अपनी लड़ाई में डिस्ट्रिक्ट के लोगों के साथ साथ डिस्ट्रिक्ट के बाहर के रोटरी के बड़े नेताओं का भी सक्रिय समर्थन जुटा लिया है

चंडीगढ़ । टीके रूबी ने डिस्ट्रिक्ट 3080, यानि राजा साबू के डिस्ट्रिक्ट के इतिहास में एक नया अध्याय अंततः जोड़ दिया है । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी चुने जाने के नतीजे को मनमाने व षड्यंत्रपूर्ण तरीके से अमान्य कर देने के फैसले को रोटरी इंटरनेशनल में आधिकारिक तरीके से चेलैंज करके टीके रूबी ने सभी को जैसे हैरान कर दिया है । दरअसल किसी को यह उम्मीद नहीं थी कि टीके रूबी इस हद तक जा सकेंगे । वह इस हद तक न जा सकें, इसके लिए उनकी घेराबंदी भी कस कर की गई थी । उन्हें 'समझाने' के नाम पर तथा तरह तरह के ललचाने वाले ऑफर देते हुए उन पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने की पूरी कोशिश की गई कि अपने साथ हुई नाइंसाफी को वह ज्यादा मुद्दा न बनायें । एक तरफ टीके रूबी को घेरने और उन्हें दबाव में लेने की कोशिश की गई थी, तो दूसरी तरफ डिस्ट्रक्ट में हवा बनाई गई कि टीके रूबी को न डिस्ट्रिक्ट में और न डिस्ट्रिक्ट के बाहर कोई समर्थन मिलेगा और ऐसे में वह कुछ कर ही नहीं सकेंगे । डिस्ट्रिक्ट चलाने का अहंकार रखने वाले नेताओं को ऐसा लगा भी कि उनकी यह दोहरी तरकीब सफल हो रही है । दरअसल टीके रूबी की तरफ से भी ठंडापन दिखाया जा रहा था; वह ऐसा जाहिर कर रहे थे जैसे कि वह बड़ी बेचारगी और लाचारी वाली स्थिति में हैं और उन्होंने समझ लिया है कि जो हुआ है वही अंतिम सच है तथा इसके अलावा कुछ और होना जाना नहीं है । टीके रूबी की तरफ से मिल रहे इस रिएक्शन ने खेल के मुख्य खिलाड़ियों के हौंसले को बढ़ाने का काम किया और वह आश्वस्त होते हुए दिखे कि टीके रूबी को उन्होंने घेर लिया है । टीके रूबी के क्लब की तरफ से रोटरी इंटरनेशनल के दिल्ली स्थित साऊथ एशिया ऑफिस को लिखी शिकायती चिट्ठी को जिस फुर्ती के साथ लौटा दिया गया, उससे तो खेल के मुख्य खिलाड़ियों की जैसे बाँछे खिल गईं और उन्होंने मान लिया कि इस बात से टीके रूबी और उनके समर्थकों का मनोबल पूरी तरह टूट चुका है तथा उनके पास अब चुप रहने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा रह गया है । 
टीके रूबी की तरफ से निश्चिंत हो चुके, डिस्ट्रिक्ट को अपनी उँगलियों पर चलाने वाले नेताओं को लेकिन तब खासा जोर का झटका लगा जब डिस्ट्रिक्ट गवर्नर कार्यालय को रोटरी इंटरनेशनल से टीके रूबी द्वारा एक हजार डॉलर की फीस के साथ दर्ज की गई आधिकारिक शिकायत पर जबाव देने का नोटिस मिला । टीके रूबी को निपटा देने की खुशफहमी पाले नेताओं के लिए चकराने वाली बात यह रही कि टीके रूबी ने उन्हें या अन्य किसी को यह आभास भी नहीं होने दिया और इतना बड़ा कदम उठा लिया । बड़ी बात यह रही कि अपनी शिकायत के पक्ष में उन्होंने बीस से ज्यादा क्लब्स की कॉन्करेंस भी जुटा लीं - और डिस्ट्रिक्ट के नेताओं को इसकी भनक भी नहीं लगी । इस तथ्य ने यही साबित किया कि टीके रूबी को जिस मनमाने व षड्यंत्रपूर्ण तरीके से डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी नहीं बनने दिया गया है, उससे डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच काफी रोष है तथा टीके रूबी के प्रति हमदर्दी है । उक्त षड्यंत्र में शामिल नेताओं को झटका लेकिन इस बात से लगा है कि लोगों के बीच यह स्पष्ट हो जाने के बावजूद, कि जो हुआ है वह राजा साबू की सहमति और मिलीभगत से हुआ है, क्लब्स टीके रूबी की शिकायत को सपोर्ट करने के लिए कॉन्करेंस देने के लिए तैयार हो गए । नेताओं को उम्मीद थी कि जो हुआ उससे डिस्ट्रिक्ट में लोगों को नाराजगी तथा टीके रूबी के प्रति हमदर्दी भले ही हो, उनके साथ खड़ा होने की हिम्मत कोई नहीं करेगा । नेताओं की यह उम्मीद जिस तरह से झूठी साबित हुई उससे यही साबित हुआ है कि टीके रूबी के प्रति डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच समर्थन तो है ही, उस समर्थन को जरूरत पड़ने पर अपने साथ 'दिखाने' का मैकेनिज्म भी टीके रूबी को पता है ।
डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दिलीप पटनायक के कार्यालय में रोटरी इंटरनेशनल से टीके रूबी द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत की जो कॉपी पहुँची है, उसे देखने/पढ़ने वाले नेताओं के कान शिकायत की ड्रॉफ्टिंग देख/पढ़ कर भी खड़े हुए हैं । रोटरी इंटरनेशनल के नियम-कानूनों का हवाला देते हुए जिस तरह से अपनी आपत्तियाँ बताई गईं हैं और नोमीनेटिंग कमेटी के गठन को तथा उसके द्वारा लिए गए फैसले को अमान्य करने के निर्णय में बरती गईं अनदेखियों तथा मनमानियों को रेखांकित किया गया है, उससे जाहिर होता दिखता है कि शिकायत को ड्रॉफ्ट करने का काम रोटरी के किन्हीं बड़े नेताओं ने किया है । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर और दूसरे नेता लोग चूँकि टीके रूबी को और उनके संगी-साथियों को अच्छे से 'जानते' हैं, इसलिए मानते/समझते हैं कि इतनी परफेक्ट ड्रॉफ्टिंग इनके बस की बात तो नहीं है; और अवश्य ही यह ड्रॉफ्टिंग रोटरी के किन्हीं बड़े नेताओं की गाइडेंस में हुई है । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर तथा टीके रूबी को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी न बनने देने के खेल में शामिल दूसरे बड़े नेता इस सब से यह नतीजा निकाल रहे हैं कि अपनी लड़ाई में टीके रूबी उतने अकेले नहीं हैं, जितना अकेला उन्हें समझा जा रहा था । टीके रूबी को घेरने में लगे नेताओं को लग रहा है कि टीके रूबी ने अपनी लड़ाई में डिस्ट्रिक्ट के लोगों के साथ साथ डिस्ट्रिक्ट के बाहर के रोटरी के बड़े नेताओं का भी सक्रिय समर्थन जुटा लिया है । इन नेताओं को यह बात भी अच्छी तरह पता है कि रोटरी के बड़े नेताओं में कई ऐसे हैं जिन्हें राजा साबू से अपने अपने हिसाब-किताब पूरे करने हैं; और ऐसे नेताओं में से ही कोई या कई टीके रूबी को न्याय दिलाने में मदद कर रहे हैं । 
इस मदद से स्वाभविक रूप से टीके रूबी की लड़ाई का दायरा बड़ा - बहुत बड़ा हो जाता है । टीके रूबी के लिए यह लड़ाई भले ही हाथ में आ चुके डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के छिन जाने से पैदा हुई निराशा से उबरने तथा न्याय पाने भर से जुड़ी हो; रोटरी में उनकी इस लड़ाई को लेकिन एक बड़े संदर्भ के साथ जोड़ कर देखा जा रहा है । उल्लेखनीय है कि राजा साबू जब किसी डिस्ट्रिक्ट में भाषण देते हैं, तो अपने भाषण का एक बड़ा हिस्सा वह यह बताने पर खर्च करते हैं कि उनके डिस्ट्रिक्ट में तो कोई राजनीति होती नहीं है, और सभी काम बड़े आपसी सौहार्दपूर्ण तरीके से होते हैं, और किसी को कभी कोई शिकायत नहीं होती । सुनने वाले हालाँकि अच्छी तरह जानते हैं कि उनके डिस्ट्रिक्ट में भी खूब राजनीति होती है; राजा साबू अपने प्रभाव और अपनी 'कलाकारी' से शिकायत सामने नहीं आने देते और डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच एक झूठा और नकली किस्म का सौहार्द 'दिखता' रहता है । राजा साबू इसी का वास्ता देकर अपनी पीठ खुद ही थपथपाते रहते हैं और दूसरे डिस्ट्रिक्ट्स के लोगों के बीच इसी बात के लिए अपनी बड़ाई करते रहते हैं । इस बार लेकिन उनकी राजनीति का दाँव उलटा पड़ गया लग रहा है । उनकी तरफ से टीके रूबी को मैनेज करने की कोशिशें तो हालाँकि काफी हुईं हैं, लेकिन लोगों को मैनेज करने में अभी तक सफल होते रहे उनके फार्मूले लगता है कि टीके रूबी के मामले में काम नहीं आए हैं । इसीलिए जिस बात की किसी को उम्मीद नहीं थी, टीके रूबी ने उसे कर दिखाया है । सचमुच में, न डिस्ट्रिक्ट में और न डिस्ट्रिक्ट के बाहर के रोटेरियंस में किसी को उम्मीद नहीं थी कि टीके रूबी अपनी लड़ाई को इस हद तक ले जायेंगे और एक हजार डॉलर की फीस के साथ रोटरी इंटरनेशनल में अपनी शिकायत दर्ज करवायेंगे । राजा साबू के डिस्ट्रिक्ट की लड़ाई रोटरी इंटरनेशनल में आधिकारिक रूप से दर्ज हो जाए, इसकी वास्तव में किसी ने कल्पना भी नहीं की थी । इसीलिए इस आलेख के शुरू में ही कहा गया है कि टीके रूबी ने वास्तव में डिस्ट्रिक्ट के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ा है ।
राजा साबू के नजदीकियों का कहना है कि टीके रूबी के साथ जो हुआ, उसमें राजा साबू का सीधा दखल कुछ नहीं है; वह तो बस उन लोगों के कहे में आ गए जिनसे वह घिरे रहते हैं । ऐसे लोगों ने उन्हें आश्वस्त किया था कि वह टीके रूबी को मैनेज कर लेंगे । अब जब टीके रूबी मैनेज नहीं हो पाए हैं और मामला रोटरी इंटरनेशनल की अदालत में दर्ज हो गया है, तो फजीहत लेकिन राजा साबू की हो रही है । राजा साबू के नजदीकियों ने ही बताया कि जो हो रहा है, राजा साबू उससे दुखी हैं और तथाकथित ग्रीवन्स कमेटी के गठन व उसके फैसले को अमान्य करवा कर टीके रूबी को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी घोषित करवा देना चाहते हैं; ताकि झंझट खत्म हो तथा रोटरी में उनकी और फजीहत न हो । इस खेल के मास्टरमाइंड लोग लेकिन अभी भी उन्हें आश्वस्त करने में लगे हुए हैं कि वह मामले को संभाल लेंगे और ज्यादा आगे नहीं बढ़ने देंगे । इन लोगों ने राजा साबू को बताया है कि जिन क्लब्स ने कॉन्करेंस दी हैं, उन क्लब्स के लोगों पर दबाव बना कर वह कॉन्करेंस वापस करवा देंगे, जिससे कि शिकायत अपने आप ही अमान्य हो जायेगी । इस फार्मूले में समस्या लेकिन यह है कि शिकायत को मान्य बनाये रखने के लिए कुल पाँच-छह कॉन्करेंस ही चाहिए हैं; अभी जो बीस के करीब कॉन्करेंस दी गईं हैं उनमें से आखिर वह कितनी कॉन्करेंस वापस करवा लेंगे ? समस्या टीके रूबी के संगी-साथियों द्वारा कही/बताई जा रही उन बातों से भी है, जिनमें दावा किया गया है कि उन्हें इस तरह की हरकत होने का पहले से ही आभास है और इसलिए उन्होंने छह-आठ क्लब्स की कॉन्करेंस और ली हुई हैं जिन्हें अभी जमा नहीं कराया गया है; और वक्त-जरूरत के लिए गोपनीय रूप से रखा हुआ है । टीके रूबी की तरफ की इस तैयारी को देखते हुए ही राजा साबू के कुछेक शुभचिंतकों ने सलाह दी है कि राजा साबू को अपनी तरफ से पहल करके इस मामले को सम्मानजनक तरीके से खत्म करना/करवाना चाहिए । इन शुभचिंतकों का कहना है कि राजा साबू को समझना चाहिए कि उन्हें घेरे रहने वाले नेता अपने स्वार्थ में उनकी किरकिरी करवा रहे हैं और उनकी पहचान व प्रतिष्ठा को धूल में मिलाये दे रहे हैं ।

Thursday, May 7, 2015

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 ए थ्री में सुरेश बिंदल के लिए बन रहे मौके को बोगस वोटों की मदद से छीन कर विनोद खन्ना के 'बच्चों के मामा' डीके अग्रवाल चार्टर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बने थे और इस तरह डिस्ट्रिक्ट 321 ए थ्री में बोगस वोटों की राजनीति की नींव रखने के लिए डीके अग्रवाल ही जिम्मेदार ठहरते हैं; हर्ष बंसल और दीपक टुटेजा तो उनके चेले हैं

नई दिल्ली । हर्ष बंसल ने अपनी ताजा कारस्तानी में अपने पापों को छिपाने तथा दूसरों पर दोष मढ़ने की जो कुत्सित हरकत की है, उसके कारण वह लायन नेताओं के बीच एक बार फिर हँसी का पात्र बन गए हैं । लायन नेताओं के बीच चर्चा का विषय यही है कि दूसरों को मूर्ख समझने/बनाने की अपनी ओछी हरकतों के जरिए हर्ष बंसल कब तक अपने आप को मूर्ख साबित करता रहेगा ? पौराणिक कथाओं में शैतानों द्वारा अपने बुरे उद्देश्यों को पूरा करने के लिए देवताओं का रूप धरने और उनकी भाषा बोलने के असंख्य किस्से हैं । सीता का हरण करने के लिए रावण द्वारा साधू का भेष धरने का किस्सा तो खासा लोकप्रिय है । मौजूदा समय में भी अपराधी किस्म के लोगों द्वारा भले दिखने व भली बातें करके अपने काम निकालने के प्रयास खूब देखे जाते हैं । हर्ष बंसल ने तो लेकिन भले दिखने की कोशिश में बेशर्मी की सारी हदें पार कर देने का काम किया है । अपने डिस्ट्रिक्ट - डिस्ट्रिक्ट 321 ए थ्री के मॉरटोरियम में जाने के संदर्भ में लायन नेताओं को लिखे एक ईमेल पत्र में बोगस क्लब्स को लायनिज्म व डिस्ट्रिक्ट के लिए नुकसानदेह बताते हुए उन्होंने कहा है कि उनके डिस्ट्रिक्ट में बोगस क्लब्स की शुरुआत वर्ष 2007-08 में उम्मीदवार बने वीके हंस द्वारा 50 बोगस क्लब्स बनाने से हुई है । डिस्ट्रिक्ट 321 ए थ्री की चुनावी राजनीति से परिचित लोगों के अनुसार हर्ष बंसल का यह दावा सरासर झूठा है कि डिस्ट्रिक्ट 321 ए थ्री में बोगस क्लब्स की शुरुआत वीके हंस की उम्मीदवारी से हुई; सच तो यह है कि इस डिस्ट्रिक्ट में बोगस क्लब्स की राजनीति इससे बहुत पहले से शुरू हो चुकी थी । कब से ? इसकी पड़ताल करने से पहले यह जानना दिलचस्प होगा कि वीके हंस द्वारा 50 बोगस क्लब्स बनाये जाने के संदर्भ में हर्ष बंसल ने किस तरह अपने शैतानी रूप पर साधू का मुखौटा लगाने का बेशर्मीभरा प्रयास किया है । 
हर्ष बंसल की यह बात सच है कि वर्ष 2007-08 में वीके हंस की उम्मीदवारी को कामयाब बनाने के लिए डिस्ट्रिक्ट में 50 बोगस क्लब्स बनाये गए थे । हर्ष बंसल ने लेकिन बेशर्मी दिखाते हुए इस बात को छिपा लिया कि इन 50 बोगस क्लब्स के बनने के पीछे गंदा दिमाग और ओछी सक्रियता किसकी थी ? लायन राजनीति को जो कोई थोड़ा-बहुत भी जानता है वह समझता है कि कोई भी उम्मीदवार डिस्ट्रिक्ट में बोगस क्लब्स नहीं बना सकता; यह काम उसके लिए उसके समर्थक बड़े नेता करते हैं । उम्मीदवार को तो बस बोगस क्लब्स बनने में खर्च होने वाला पैसा देना होता है । वर्ष 2007-08 में वीके हंस जब पहली बार उम्मीदवार बने थे, तब उनके सरपरस्त नेता ने उन्हें बोगस वोटों के सहारे चुनाव जीतने का फार्मूला सुझाया था और खर्चे का हिसाब बताया था । वीके हंस खर्चा करने को तैयार हो गए थे और तब उस वर्ष 50 बोगस क्लब्स बने । हर्ष बंसल उस वर्ष 50 बोगस क्लब बनने की बात तो बताते हैं, लेकिन इस बात को पूरी बेशर्मी के साथ छिपा जाते हैं कि वह 50 बोगस क्लब्स किसकी सरपरस्ती में बने थे ? दरअसल हर्ष बंसल इस तथ्य का यदि खुलासा करते तो उन्हें अपना ही नाम लेना पड़ता । उस वर्ष वीके हंस की उम्मीदवारी का झंडा हर्ष बंसल के पास ही था, और 50 बोगस क्लब्स बना कर चुनाव जीतने का फार्मूला हर्ष बंसल के गंदे दिमाग की ही उपज था । हर्ष बंसल को लगा होगा कि इस सच्चाई को वह नहीं बतायेंगे और छिपा जायेंगे, तो अपनी काली करतूतों से लोगों का ध्यान भटका लेंगे । हर्ष बंसल की करतूतों का लेकिन ऐसा बोलबाला है कि उनकी यह चाल सफल नहीं हो सकी और लायन नेताओं के बीच वह हँसी का पात्र बन बैठे । हालाँकि इसका मतलब यह भी नहीं है कि डिस्ट्रिक्ट 321 ए थ्री में बोगस क्लब्स की राजनीति की शुरुआत हर्ष बंसल ने की थी; शुरुआत तो यह पहले से ही हो चुकी थी - हर्ष बंसल ने तो इस कलाकारी को नई ऊँचाइयाँ प्रदान की । 
डिस्ट्रिक्ट 321 ए थ्री का इतिहास वर्ष 1993-94 से शुरू होता है, जिसमें पहले डिस्ट्रिक्ट गवर्नर डीके अग्रवाल थे । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में उनका 'चुनाव' उससे पिछले वर्ष, यानि वर्ष 1992-93 में अविभाजित डिस्ट्रिक्ट 321 ए में हुआ था । वर्ष 1992-93, अविभाजित डिस्ट्रिक्ट 321 ए का अंतिम वर्ष था, और उस वर्ष अविभाजित डिस्ट्रिक्ट के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विनोद खन्ना थे । अविभाजित डिस्ट्रिक्ट में विभाजित डिस्ट्रिक्ट 321 ए थ्री के लिए जो चुनाव हुआ था, उसकी कहानी बड़ी दिलचस्प है । डिस्ट्रिक्ट 321 ए थ्री के लिए चार्टर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर का जो चुनाव होना था, उसमें सुरेश बिंदल का पलड़ा भारी था और हर कोई सुरेश बिंदल को ही डिस्ट्रिक्ट 321 ए थ्री के चार्टर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में देख/पहचान रहे थे । लेकिन सुरेश बिंदल का मौका डीके अग्रवाल ने विनोद खन्ना की मदद से हड़प लिया । आज कई लोगों को यह जानकर हैरानी हो सकती है कि उस समय डीके अग्रवाल के विनोद खन्ना के साथ बहुत ही नजदीकी संबंध होते थे । उनके नजदीकी संबंधों की जड़ें उनके परिवारों तक पहुँची हुई थीं । डीके अग्रवाल, विनोद खन्ना की पत्नी रेणु खन्ना को बहन मानते थे । रेणु खन्ना को डीके अग्रवाल जिस तरह दीदी दीदी कह कर संबोधित करते थे, उसे सुनते/देखते हुए लायन नेताओं ने डीके अग्रवाल का नाम ही 'बच्चों के मामा' रख दिया था । उस समय उनका यह नाम इतना लोकप्रिय हो गया था कि बड़े लायन नेता भी डीके अग्रवाल की बात करते थे, तो उन्हें 'बच्चों के मामा' कह कर संबोधित/उच्चारित करते थे । अपने 'बच्चों के मामा' डीके अग्रवाल को विनोद खन्ना ने टिप्स दी कि वह यदि पीपी भारद्वाज की मदद जुगाड़ लें, तो सुरेश बिंदल को पछाड़ कर नए डिस्ट्रिक्ट के चार्टर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बन जायेंगे । 
पीपी भारद्वाज अविभाजित डिस्ट्रिक्ट में करीब सौ सौ की सदस्यता वाले तीन-चार बोगस क्लब्स रखने वाले पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर थे, और अपने बोगस क्लब्स के जरिये अविभाजित डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में अच्छा-खासा दखल रखने वाले नेता के रूप में देखे/पहचाने जाते थे । पीपी भारद्वाज मूलतः नरेश अग्रवाल के डिस्ट्रिक्ट के खिलाड़ी थे और वही वह गवर्नर बने थे । एक सरकारी बीमा कंपनी में नौकरी करने वाले पीपी भारद्वाज ट्रांसफर के चलते दिल्ली आ गए तो यहाँ के डिस्ट्रिक्ट में 'खिलाड़ी' बन गए । विनोद खन्ना ने ही पीपी भारद्वाज के बोगस क्लब्स के वोटों का सौदा डीके अग्रवाल से करवाया, जिनकी ताकत से सुरेश बिंदल का चार्टर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बनने का मौका छिना और डीके अग्रवाल चार्टर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बने । इस तरह डिस्ट्रिक्ट 321 ए थ्री की शुरुआत ही बोगस क्लब्स के वोटों के भरोसे मिली जीत के 'सम्मान' से हुई । सुरेश बिंदल का मौका छीनने में डीके अग्रवाल को जो सफलता मिली, उससे बोगस क्लब्स की ताकत पर डीके अग्रवाल को ऐसा भरोसा हुआ कि अपने गवर्नर-काल में उन्होंने ललित नरूला को अगले लायन वर्ष का गवर्नर और नरहरि डालमिया को वाइस गवर्नर बनवाने/चुनवाने का जाल बिछाया और नरहरि डालमिया के पैसे लगवा कर बोगस वोट बनाये । डीके अग्रवाल के यह दोनों उम्मीदवार हालाँकि चुनाव हार गए थे, लेकिन नरहरि डालमिया को जेएन भूटानी से हरवाने का आरोप डीके अग्रवाल पर ही लगा था । ललित नरूला तो सुरेश बिंदल से चार-पाँच वोटों से ही हारे थे, किंतु नरहरि डालमिया को जेएन भूटानी से 35 के करीब वोटों से पराजय मिली थी । उस समय आरोप लगा था कि नरहरि डालमिया को डीके अग्रवाल ने जितवाने का भरोसा तो उनका पैसा लगवाने के लिए दिया था, वास्तव में साथ वह जेएन भूटानी के थे । 
डीके अग्रवाल इस तरह के खेल करते रहे हैं । वह 'दिखते' किसी के साथ और सचमुच में 'होते' किसी और के साथ । उनके इसी रवैये पर राकेश जैन ने उन्हें 'डुप्लीकेट कुमार' जैसा नाम दिया था । जिन विनोद खन्ना के 'बच्चों के मामा' जैसी उन्हें पहचान मिली थी, उन्हीं विनोद खन्ना की फिर उन्होंने ऐसी हालत कर दी थी कि विनोद खन्ना को डिस्ट्रिक्ट से भाग कर डिस्ट्रिक्ट 321 ए टू में शरण लेनी पड़ी । बोगस वोट तथा क्लब्स बनवाने का खेल हर्ष बंसल ने वास्तव में डीके अग्रवाल से ही सीखा । बोगस वोट और क्लब्स बनाने के लिए जो क्लेरिकल हुनर चाहिए होता है, उसमें हर्ष बंसल चूँकि एक्सपर्ट रहे इसलिए वह डीके अग्रवाल की गुडबुक में शामिल हुए । बोगस वोट के खेल की ताकत समझने के बाद जिस तरह डीके अग्रवाल ने विनोद खन्ना को किनारे लगाया, ठीक वैसे ही हर्ष बंसल ने डीके अग्रवाल से निपटने की कोशिश की तो दोनों में खटक गई । तब क्लेरिकल काम के लिए डीके अग्रवाल ने दीपक टुटेजा का सहारा लिया । डीके अग्रवाल की देखरेख में ही दीपक टुटेजा बोगस वोटों के खिलाड़ी बने । दीपक टुटेजा के इस खिलाड़ीपने से मिली ऑक्सीजन के सहारे ही डीके अग्रवाल ने हर्ष बंसल को डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में उसकी औकात बताई और हर्ष बंसल को जीरो बना कर रख दिया । फिर लेकिन डीके अग्रवाल को दीपक टुटेजा से भी शिकायत होने लगी । समझा जाता है कि डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में दीपक टुटेजा की बढ़ती ताकत से अजय बुद्धराज को खतरा महसूस हुआ, और उन्होंने डीके अग्रवाल के कान भरे । डीके अग्रवाल ने दीपक टुटेजा से निपटने की रणनीति में हर्ष बंसल से हाथ मिला लिया, लेकिन हर्ष बंसल की लोगों के बीच इतनी बदनामी है कि उनसे मिलकर डीके अग्रवाल खुद भी जीरो हो गए ।
दीपक टुटेजा से मिली मात पर मात से उबरने के लिए डीके अग्रवाल और हर्ष बंसल की जोड़ी ने ऐसे हालात पैदा किए कि डिस्ट्रिक्ट मॉरटोरियम में चला गया है । मजे की बात यह है कि बोगस वोटों का सारा ठीकरा दीपक टुटेजा के सिर फोड़ने की कोशिश करते हुए डीके अग्रवाल और हर्ष बंसल अपने आप को बड़ा पवित्र दिखाने/जताने की जो कोशिश कर रहे हैं, उससे कई दबी/छिपी बातें सामने आ रही हैं - जिनसे वास्तव में इन्हीं की किरकिरी व फजीहत हो रही है ।

Wednesday, May 6, 2015

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3100 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट सुनील गुप्ता से समर्पण करवा कर योगेश मोहन गुप्ता ने डिस्ट्रिक्ट में और रोटरी में अपनी स्थिति सुधारने की जो कोशिश शुरू की है; डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए मनोज जैन को सुनील गुप्ता का उम्मीदवार बनवा कर उसी कोशिश को उन्होंने और ऊँचे मुकाम पर पहुँचाने का दाँव चला है

मेरठ । रोटरी क्लब मेरठ के मनोज जैन की डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए प्रस्तुत हुई उम्मीदवारी ने डिस्ट्रिक्ट की ठंडी पड़ी चुनावी राजनीति में गर्मी तो पैदा कर दी है । यह गर्मी इसलिए पैदा हुई है, क्योंकि मनोज जैन को अगले रोटरी वर्ष में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर होने जा रहे सुनील गुप्ता के उम्मीदवार के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । उल्लेखनीय है कि अगले रोटरी वर्ष में होने वाले डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव के संदर्भ में अभी तक रोटरी क्लब मेरठ डायमण्ड की मंजु गुप्ता तथा रोटरी क्लब मुरादाबाद ब्राइट की दीपा खन्ना का नाम ही लोगों के बीच चर्चा में था । इन दोनों की रोटरी में अच्छी संलग्नता और सक्रियता रही है, तथा रोटरी के प्रति इनके उत्साहपूर्ण लगाव से प्रायः सभी परिचित रहे हैं । डिस्ट्रिक्ट के अधिकतर लोगों का मानना और कहना रहा है कि मंजु गुप्ता और दीपा खन्ना की ही उम्मीदवारी यदि रहती है तो चुनाव साफ-सुथरे तरीके से और एक-दूसरे के समर्थकों को बिना बेइज्जत किए संपन्न हो सकेगा तथा डिस्ट्रिक्ट व रोटरी के लिए यह एक शुभअवसर होगा । हालाँकि कुछेक लोगों को पूरा पूरा भरोसा था कि डिस्ट्रिक्ट में चुनावी राजनीति के कुछेक खिलाड़ियों को यह स्थिति रास नहीं आयेगी, तथा वह कुछ न कुछ अवश्य ऐसा करेंगे जिससे चुनाव में 'रौनक' पैदा हो । रोटरी में दरअसल एक ऐसा तबका संगठित हो गया है, जो चुनाव को मेले-ठेले से ज्यादा महत्त्व नहीं देता है और चुनाव को गला गीला करने के एक वार्षिक उत्सव के रूप में देखता है । 
अन्य कुछेक लोगों का यह भी मानना और कहना था कि डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के कुछेक खिलाड़ी घोर पुरुषवादी सोच के हैं और वह किसी महिला को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर न बनने देने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं । यहाँ संगीता कुमार और योगेश मोहन गुप्ता के बीच हुए चुनाव को याद करना प्रासंगिक होगा । यूँ तो डिस्ट्रिक्ट के हर चुनाव में गंदगी हुई ही है, किंतु उस चुनाव में योगेश मोहन गुप्ता के सौजन्य से गंदगी के जिन मुकामों को छुआ गया, वह घटियापने के शर्मनाक उदाहरण के रूप में दर्ज हैं । उस चुनाव में सारा चुनावी समीकरण संगीता कुमार की उम्मीदवारी के पक्ष में था, लेकिन फिर भी वह चुनाव हार गईं थीं तो उसका एक बड़ा कारण यही था कि पुरुषवादी सोच के घटियापने का मुकाबला करने की वह कोई तैयारी नहीं कर पाई थीं । हो सकता है कि उस चुनाव में संगीता कुमार के साथ जो हुआ था, उसी को ध्यान में रखते हुए कुछेक लोगों को लगा हो कि डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के कुछेक खिलाड़ी अगले रोटरी वर्ष के चुनावी मुकाबले को मंजु गुप्ता और दीपा खन्ना के बीच ही सीमित न रहने दें तथा उसमें कुछ तड़का डालने का प्रयास करेंगे । मनोज जैन की उम्मीदवारी की चर्चा के साथ यह आशंका सच साबित हो गई है । एक मजेदार संयोग यह बना है कि मनोज जैन की जो एकमात्र खूबी डिस्ट्रिक्ट के लोगों की जुबान पर अभी है और उनके बीच चर्चा में है, वह यह कि वह योगेश मोहन गुप्ता के गवर्नर-काल के अध्यक्ष हैं तथा योगेश मोहन गुप्ता के बड़े चहेते अध्यक्ष होते थे ।
तो क्या मनोज जैन, योगेश मोहन गुप्ता के ही नए संस्करण साबित होंगे, और उन्हीं की तर्ज पर चुनाव लड़ेंगे ? इसका तो पता बाद में चलेगा, किंतु मनोज जैन की उम्मीदवारी की चर्चा से सुनील गुप्ता की बाँछे जरूर खिल गई हैं; और अब उन्हें पक्का विश्वास हो चला है कि उनका गवर्नर-काल पूरा हिट रहेगा । मेरठ में सुनील गुप्ता के नजदीकियों का कहना है कि मनोज जैन की उम्मीदवारी सुनील गुप्ता से विचार विमर्श करने के बाद ही चर्चा में आई है; और मनोज जैन पूरी तरह सुनील गुप्ता के भरोसे ही चुनावी मैदान में उतरने के लिए राजी हुए हैं । मनोज जैन की उम्मीदवारी के जरिए सुनील गुप्ता को अपना गवर्नर-काल रौनकपूर्ण हो जाने का विश्वास है, तो योगेश मोहन गुप्ता को डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में अपनी वापसी करने की उम्मीद है । पिछले दिनों डिस्ट्रिक्ट गवर्नर संजीव रस्तोगी और पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर ललित मोहन गुप्ता के कारण योगेश मोहन गुप्ता को डिस्ट्रिक्ट में और रोटरी में भारी फजीहत का शिकार होना पड़ा तथा बहुत ही बुरे दिन देखने पड़े हैं । सुनील गुप्ता के साथ भी योगेश मोहन गुप्ता के अच्छे संबंध नहीं थे, पिछले दिनों तो वह और भी खराब हो गए थे; लेकिन पता नहीं सुनील गुप्ता  के साथ उनकी फिर क्या सौदेबाजी हुई कि सुनील गुप्ता ने उनके सामने समर्पण कर दिया । सुनील गुप्ता से समर्पण करवा कर योगेश मोहन गुप्ता ने डिस्ट्रिक्ट में और रोटरी में अपनी स्थिति सुधारने की जो कोशिश शुरू की है; मनोज जैन को सुनील गुप्ता का उम्मीदवार बनवा कर उसी कोशिश को और ऊँचे मुकाम पर पहुँचाने का दाँव उन्होंने चला है । इस दाँव की कामयाबी हालाँकि इस बात पर निर्भर करेगी कि मनोज जैन अपनी उम्मीदवारी के अभियान को कैसे आगे बढ़ाते हैं और सुनील गुप्ता का समर्थन उन्हें वास्तव में फायदा पहुँचाता भी है या नहीं ।  

Monday, May 4, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में चेयरमैन के रूप में राज चावला को काम न करने देने की चरनजोत सिंह नंदा और संजीव चौधरी की हरकत से राज चावला को जो सहानुभूति मिलती दिख रही है, उसमें विजय गुप्ता का काम बिगड़ता जा रहा है

नई दिल्ली । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन के रूप में राज चावला को काम न करने देने की चरनजोत सिंह नंदा और संजीव चौधरी की चालबाजी को फेल करने के लिए नवीन गुप्ता ने आश्चर्यजनक तरीके से साहस तो दिखाया था, लेकिन इन दोनों ने जब घुड़की लगाई तो नवीन गुप्ता का सारा साहस तुरंत से हवा भी हो गया । उल्लेखनीय है कि तरह-तरह की बहानेबाजी के जरिये चरनजोत सिंह नंदा और संजीव चौधरी ने नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के कामकाज को ठप्प किया हुआ है । इसी पर अपनी नाराजगी जताते हुए नवीन गुप्ता ने एक ईमेल लिख कर रीजनल काउंसिल में कामकाज होने देने की वकालत की । नवीन गुप्ता चूँकि कुछ न करने के लिए मशहूर हैं, इसलिए उनकी इस वकालत पर सभी को आश्चर्य हुआ । आश्चर्य इसलिए भी हुआ, क्योंकि इस वकालत के जरिए नवीन गुप्ता दरअसल चरनजोत सिंह नंदा और संजीव चौधरी को सीधी चुनौती देने की कोशिश करते हुए 'दिखे' । नवीन गुप्ता के इस बदले बदले रूप ने सभी को हैरान भी किया । यह हैरानी किंतु ज्यादा देर टिकी नहीं रह पाई - क्योंकि नवीन गुप्ता के इस साहस पर चरनजोत सिंह नंदा और संजीव चौधरी ने जैसे ही उन्हें 'नियमानुसार कामकाज होने' का वास्ता देते हुए घुड़की दी, नवीन गुप्ता ने तुरंत उनकी हाँ में हाँ मिलानी शुरू कर दी ।
नवीन गुप्ता के इस समर्पण ने नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में कामकाज शुरू हो सकने की संभावनाओं को धक्का पहुँचाया है । कुछेक लोगों को लगता है कि चरनजोत सिंह नंदा और संजीव चौधरी का नाटक अब पूरा हो गया है, और अब वह कोई अड़ंगेबाजी नहीं करेंगे तथा जल्दी ही नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में कामकाज सुचारू रूप से शुरू हो जायेगा । अन्य कुछेक लोगों को लगता है कि चरनजोत सिंह नंदा और संजीव चौधरी द्वारा खेला जा रहा यह नाटक सेंट्रल काउंसिल के एक तीसरे सदस्य विजय गुप्ता को चूँकि पसंद आ रहा है, इसलिए वह कोशिश करेंगे कि यह नाटक अभी और चले । असल में, यह नाटक चरनजोत सिंह नंदा और संजीव चौधरी ने अपनी अपनी ईगो को संतुष्ट करने के लिए शुरू किया था, जिसमें फिर विजय गुप्ता को अपना फायदा दिखने लगा और वह पर्दे के पीछे से इस नाटक को लंबा खिंचवाने में लग गए । सेंट्रल काउंसिल के अगले चुनाव में विजय गुप्ता को अपनी सीट खतरे में दिख रही है । सेंट्रल काउंसिल की अपनी सीट को बचाने के लिए विजय गुप्ता को राज चावला को घेरे में और दबाव में रखना जरूरी लग रहा है । 
उल्लेखनीय है कि पिछले चुनाव में विजय गुप्ता को अमरजीत चोपड़ा के समर्थन तथा लुधियाना से मिले वोटों के कारण जीत प्राप्त हुई थी । प्रेसीडेंट चुनाव में अपनी फजीहत के लिए विजय गुप्ता ने अमरजीत चोपड़ा को जिम्मेदार ठहरा कर तथा उनके खिलाफ भारी गाली-गलौच करके अमरजीत चोपड़ा के समर्थन को तो पहले ही खो दिया है; विशाल गर्ग व संजय वासुदेव की उम्मीदवारी के चलते इस बार लुधियाना से वोट मिल पाने की भी उन्हें कोई सूरत नहीं दिख रही है । ऐसे में, विजय गुप्ता की निगाह पिछले दो वर्षों में चार्टर्ड एकाउंटेंट बने नए वोटरों पर है । उन्हें लगता है कि महँगी पार्टियों में खिला-पिला कर और नाच-गाना सुनवा/दिखवा कर वह नए चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के वोट जुटा लेंगे । इस कोशिश में उन्हें लेकिन राज चावला से खतरा है ।
दरअसल रीजनल काउंसिल का चेयरमैन होने के नाते राज चावला के लिए नए चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के साथ संबंध बनाना/जोड़ना आसान होगा । दूसरों के मुकाबले तुलनात्मक रूप से राज चावला चूँकि ज्यादा इंटरनेट फ्रेंडली हैं और फेसबुक पर खासे सक्रिय हैं, इसलिए भी युवाओं के बीच उनके लिए अच्छा समर्थन बनने का अनुमान लगाया जा रहा है । इसी कारण से विजय गुप्ता को लगता है कि रीजनल काउंसिल के चेयरमैन के रूप में राज चावला की सक्रियता नए चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच पैठ बनाने की उनकी योजना को कामयाब नहीं होने देगी; और इसीलिए विजय गुप्ता चाहते हैं कि रीजनल काउंसिल के चेयरमैन के रूप में राज चावला काम न कर पाएँ । चरनजोत सिंह नंदा और संजीव चौधरी की हरकत से विजय गुप्ता को तो जैसे मुँहमाँगी मुराद मिल गई । अपने स्वार्थ में विजय गुप्ता चाहेंगे कि चरनजोत सिंह नंदा और संजीव चौधरी का नाटक अभी कुछ दिन और चले, ताकि राज चावला को कुछ काम करने का मौका न मिल सके और लोगों के बीच उनकी नकारात्मक छवि बने । 
चेयरमैन के रूप में काम न करने देने के जरिये राज चावला को लोगों से दूर करने की यह रणनीति - कुछेक लोगों को लगता है कि - बूमरेंग भी कर सकती है । ऐसे लोगों का कहना है कि अभी ही राज चावला को जिस तरह की हमदर्दी मिल रही है उससे लग रहा है कि उन्हें चेयरमैन के रूप में काम न करने देने से लोगों के बीच उनका समर्थन वास्तव में बढ़ा ही है । लोगों का कहना है कि चेयरमैन पद पर राज चावला के चयन को जिस तरह से सेंट्रल काउंसिल व रीजनल काउंसिल के कुछेक सदस्य पचा नहीं पा रहे हैं और शुरू से ही तरह तरह की बहानेबाजियों के जरिए उनकी राह में रोड़े डालने का काम कर रहे हैं, उससे आम चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच उनके लिए सहानुभूति बनी है और लोग महसूस कर रहे हैं तथा कह रहे हैं कि राज चावला के साथ बहुत नाइंसाफी हो रही है । यहाँ यह याद करना प्रासंगिक होगा कि विजय गुप्ता रीजनल काउंसिल के चेयरमैन का पद अपने चेले दीपक गर्ग को दिलवाना चाहते थे, किंतु जिसमें वह बुरी तरह विफल रहे थे । विजय गुप्ता के लिए उस हार से भी बड़ा झटका लेकिन यह है कि चरनजोत सिंह नंदा और संजीव चौधरी के जरिए वह लोगों के बीच राज चावला की नकारात्मक पहचान बनाना चाहते हैं, लेकिन हो उलटा रहा है । यानि, पिछले कुछ समय से विजय गुप्ता का हर दाँव उलटा ही पड़ रहा है ।  

Saturday, May 2, 2015

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3080, यानि राजा साबू के डिस्ट्रिक्ट में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव के नतीजे को मनमाफिक न पाकर उसे मनमाने तरीके से निरस्त करने के मामले से संबंधित शिकायत को रफादफा करवाने की कार्रवाई के प्रति पीटी प्रभाकर की नाराजगी की खबर ने मामले को रोटरी नेताओं की दिलचस्पी के केंद्र में ला दिया है

नई दिल्ली/चंडीगढ़ । इंटरनेशनल डायरेक्टर पीटी प्रभाकर ने डिस्ट्रिक्ट 3080, यानि राजेंद्र उर्फ़ राजा साबू के डिस्ट्रिक्ट के गवर्नर के खिलाफ मिली शिकायत को तत्परता से अनसुना कर देने की जतिंदर सिंह की 'कार्रवाई' पर नाराजगी जता कर तथा सवाल उठा कर मामले को दिलचस्प तो बना ही दिया है, साथ ही राजा साबू और उनके चहेतों के लिए समस्या भी खड़ी कर दी है । उल्लेखनीय है कि रोटरी इंटरनेशनल के दिल्ली स्थित साऊथ एशिया ऑफिस में क्लब व डिस्ट्रिक्ट सपोर्ट मैनेजर जतिंदर सिंह को राजा साबू के डिस्ट्रिक्ट में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए हुए चुनाव को अमान्य घोषित करने के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के फैसले में बरती गई अनियमितता के बारे में शिकायत मिली, जिसका तुरंत जवाब देते हुए जतिंदर सिंह ने शिकायतकर्ता को लिखा कि यह डिस्ट्रिक्ट के चुनाव से जुड़ा मामला है, इसमें डिस्ट्रिक्ट गवर्नर ही जवाब देगा, इसलिए उससे ही संपर्क करो । जतिंदर सिंह द्वारा दिए गए इस जवाब ने तथा जवाब देने में दिखाई गई फुर्ती ने सभी को हैरान किया । जिसने भी इस मामले को जाना उसने यही सवाल उठाया कि शिकायत ही जब डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रवैये पर है, तो शिकायतकर्ता को न्याय पाने के लिए उसी डिस्ट्रिक्ट गवर्नर से संपर्क करने का जतिंदर सिंह का सुझावपूर्ण आदेश देने का मतलब भला क्या है ? जिन कुछेक लोगों ने इस बारे में जतिंदर सिंह से बात की, उन्हें जतिंदर सिंह ने यह कह कर टरकाया कि इस मामले में राजा साबू का सीधा इन्वॉल्वमेंट है, मैं भी समझ रहा हूँ कि जो हुआ है वह गलत हुआ है, लेकिन इस मामले को एंटरटेन करने का मतलब अपनी नौकरी को खतरे में डालना होता, राजा साबू तो मेरी नौकरी ही खा जायेंगे - इसलिए मैंने इस मामले से जल्दी से जल्दी पिंड छुटाने में ही अपनी भलाई देखी है ।
जतिंदर सिंह ने राजा साबू के कोप से अपनी नौकरी बचाने के चक्कर में उक्त मामले से पिंड छुटाने की जो कोशिश की है, उसके कारण वह लेकिन एक दूसरी मुसीबत में घिर गए दिख रहे हैं । दरअसल इस मामले की खबर जब इंटरनेशनल डायरेक्टर पीटी प्रभाकर को मिली, तो उन्होंने जतिंदर सिंह के रवैये के प्रति गहरी नाराजगी व्यक्त की । उनकी नाराजगी का कारण यह रहा कि जतिंदर सिंह ने मामले को उनके संज्ञान में लाए बिना तथा उनसे विचार-विमर्श किए बिना 'फैसला' क्यों कर लिया । उनका कहना है कि जतिंदर सिंह मैनेजर हैं, इस तरह के मामलों में फैसला करने का उन्हें कोई अधिकार ही नहीं है । उल्लेखनीय है कि इस तरह के मामलों में होता यह है कि जतिंदर सिंह मौजूद इंटरनेशनल डायरेक्टर के सामने मामले को रखते हैं और मौजूदा इंटरनेशनल डायरेक्टर का जो फैसला होता है, उससे शिकायतकर्ता को अवगत कराते हैं । राजा साबू के डिस्ट्रिक्ट के संबंध में जतिंदर सिंह को जो शिकायत मिली, उसे उन्हें मौजूदा इंटरनेशनल डायरेक्टर पीटी प्रभाकर के सामने लाना चाहिए था और उनका फैसला 'लेना'/बताना चाहिए था ।जतिंदर सिंह ने ऐसा नहीं किया, उससे पीटी प्रभाकर ने अपने आप को अपमानित महसूस किया है । रोटरी में ही क्या, हमारे समाज में ही प्रथा है कि हम उगते सूरज को ही जल चढ़ाते हैं, डूबते सूरज के सामने तो तफ़रीह वाले मूड में आ जाते हैं । इंटरनेशनल डायरेक्टर के रूप में पीटी प्रभाकर डूबते सूरज की तरह ही हैं; इंटरनेशनल डायरेक्टर के पद पर वह मुश्किल से दो माह और हैं - इसलिए रोटरी में उनकी शान और उनका रुतबा घटता हुआ दिखने लगा है; लेकिन लगता है कि जतिंदर सिंह कुछ ज्यादा ही तफ़रीह वाले मूड में आ गए । वह यह भूल गए कि पीटी प्रभाकर अभी इंटरनेशनल डायरेक्टर हैं और अभी कुछ दिन और रहेंगे । 
जतिंदर सिंह की मनमानी से पैदा हुई पीटी प्रभाकर की नाराजगी दो कारणों से महत्वपूर्ण है : पहला कारण तो यह कि पीटी प्रभाकर भले ही करीब दो माह बाद इंटरनेशनल डायरेक्टर नहीं रहेंगे; लेकिन अगले रोटरी वर्ष में इंटरनेशनल प्रेसीडेंट केआर रवींद्रन के साथ नजदीकी के चलते उनकी भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण होगी और उन्हें हलके में नहीं लिया जा सकेगा; दूसरा कारण उनका खुन्नसी स्वभाव है - उन्हें जानने वाले बताते हैं कि वह जिस मामले में हाथ डाल देते हैं फिर उस मामले में आरपार करने की हद तक चले जाते हैं । 
दरअसल इन्हीं कारणों से राजा साबू के डिस्ट्रिक्ट के मामले को उनके संज्ञान में लाए बिना निपटा देने के जतिंदर सिंह के तरीके पर पैदा हुई उनकी नाराजगी के संकेतों को समझने की कोशिश की जा रही है । रोटरी के कई बड़े नेताओं को लगता है कि जतिंदर सिंह ने उक्त मामले में जो फुर्ती दिखाई, उससे पीटी प्रभाकर को राजा साबू को 'लपेटने' का मौका छिनता हुआ दिखा है, इसलिए वह नाराज हुए हैं । पीटी प्रभाकर को इंटरनेशनल डायरेक्टर के रूप में कई बार राजा साबू के कारण अपमानित होना पड़ा है; अपने अपमान का बदला लेने के लिए राजा साबू के डिस्ट्रिक्ट के गवर्नर के खिलाफ हुई शिकायत को पीटी प्रभाकर एक टूल की तरह इस्तेमाल करना चाहते थे - लेकिन जो जतिंदर सिंह की 'फुर्ती' के कारण उनसे छिन गया । पीटी प्रभाकर को कुछेक लोग यह भी समझा रहे हैं कि हो सकता है कि उनके 'डर' से राजा साबू ने ही जतिंदर सिंह से फुर्ती से फैसला लिखवा लिया हो । दरअसल इन्हीं संभावनाओं के चलते पीटी प्रभाकर की नाराजगी की खबर ने राजा साबू के डिस्ट्रिक्ट में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव को अमान्य घोषित करने के षड्यंत्रपूर्ण व मनमाने फैसले को रोटरी नेताओं की दिलचस्पी के केंद्र में ला दिया है । 
हालाँकि रोटरी में कोई भी यह नहीं मानेगा कि चाहें पीटी प्रभाकर हों, या राजा साबू के हाथों प्रताड़ित व अपमानित हुआ कोई और पदाधिकारी/नेता - वह राजा साबू के खिलाफ खुलेआम कुछ कहेगा या करेगा । रोटरी में राजा साबू का जैसा जो जलवा है, उसे देखते हुए किसी को भी इस बात की जरा सी भी उम्मीद नहीं है । किंतु किसी भी दूसरी राजनीति की तरह रोटरी की राजनीति में भी बातें/चीजें 'ब्लैक' एण्ड 'व्हाइट' में ही नहीं होती हैं, बहुत कुछ पर्दे के पीछे होता है । यहाँ दोस्तों को दोस्तों के साथ दगा करते हुए और विरोधियों को गले मिलते हुए गहरे आश्चर्य के साथ खूब देखा जा सकता है । 
इसी तर्ज पर जैसे यह बात सच है कि राजा साबू के खिलाफ कोई भी कुछ नहीं कहेगा/करेगा; वैसे ही यह बात भी सच है कि कई लोग हैं जो राजा साबू के फूले हुए गुब्बारे की हवा निकालने के लिए मौके की तलाश में हैं । राजा साबू के डिस्ट्रिक्ट में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव के नतीजे को मनमाफिक न पाकर उसे निरस्त करने के मामले को एक ऐसे ही मौके के रूप में देखा जा रहा है । रोटरी के कई बड़े नेताओं को लग रहा है कि इस मामले के जरिए वह रोटरी में बनी हुई राजा साबू की सारी क्रीज खराब कर सकेंगे । रोटरी में राजा साबू ने इस बात का उदाहरण देकर अपना एक नैतिकतावादी आभामंडल (ऑरा) बनाया हुआ है कि उनके डिस्ट्रिक्ट में बड़े नियम-कायदे से काम होते हैं, किसी के साथ नाइंसाफी नहीं होती है, और किसी को कोई शिकायत नहीं होती है । सच बात यह है कि उनके डिस्ट्रिक्ट में कोई कभी शिकायत करने का साहस नहीं करता है । इस बार लेकिन असलियत सामने आ गई है - और शिकायत का साहस भी दिख गया है । रोटरी इंटरनेशनल के साऊथ एशिया ऑफिस तक राजा साबू के डिस्ट्रिक्ट में होने वाली बेईमानियों और मनमानियों की शिकायत यदि आ पहुँची है, तो यह रोटरी में राजा साबू की बनी क्रीज को थोड़ा-बहुत बिगाड़ने का काम तो करती है । इस शिकायत को निष्प्रभावी बना कर और जतिंदर सिंह से शिकायतकर्ताओं का मनोबल तोड़ने वाला जवाब दिलवा कर राजा साबू ने अपनी क्रीज को बचाने की व्यवस्था तो अच्छी की थी, किंतु इस व्यवस्था पर इंटरनेशनल डायरेक्टर पीटी प्रभाकर की नाराजगी की खबर ने मामले को फिर से जिंदा कर दिया है और दिलचस्प बना दिया है ।
पीटी प्रभाकर की नाराजगी से यह संकेत तो मिलता ही है कि वह राजा साबू के डिस्ट्रिक्ट में हुई मनमानी को लेकर डिस्ट्रिक्ट में पैदा हुए असंतोष के जरिए राजा साबू की फजीहत होते 'देखना' तो चाहते हैं । अपनी इस चाहत को पूरा करने के लिए वह आगे क्या 'प्रयास' करते हैं - यह देखने की बात होगी ।