Monday, May 25, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत सुधीर अग्रवाल की उम्मीदवारी ने अलग अलग कारणों से नवीन गुप्ता और राधेश्याम बंसल के लिए सीधी चुनौती खड़ी की

नई दिल्ली । सुधीर अग्रवाल ने चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के लिए अपनी उम्मीदवारी की औपचारिक घोषणा करके नवीन गुप्ता और राधेश्याम बंसल की उम्मीदवारी के लिए सीधा खतरा पैदा कर दिया है । उल्लेखनीय है कि यूँ तो सुधीर अग्रवाल की उम्मीदवारी के प्रस्तुत होने की चर्चा काफी समय से थी; कुछेक लोगों का कहना/बताना था भी कि सुधीर अग्रवाल ने उनसे अपने उम्मीदवार होने की बात कही/बताई है - लोगों को लेकिन फिर भी सुधीर अग्रवाल की तरफ से औपचारिक घोषणा होने का इंतजार था । यह इंतजार इसलिए भी था क्योंकि सुधीर अग्रवाल की उम्मीदवारी की चर्चा तो खूब थी, लेकिन खुद सुधीर अग्रवाल अपनी उम्मीदवारी के लिए कुछ करते हुए नहीं दिख रहे थे । उनका मामला कुछ कुछ मधुसुदन गोयल जैसा था - मधुसुदन गोयल के मुकाबले हालाँकि उनकी उम्मीदवारी को लेकर ज्यादा विश्वास जरूर था । लोगों के बीच बने इस विश्वास पर बस सुधीर अग्रवाल की मोहर लगने का इंतजार किया जा रहा था । लोगों का यह इंतज़ार अंततः खत्म हुआ और अभी हाल ही में सुधीर अग्रवाल ने एक कार्यक्रम में उपस्थित होकर अपनी उम्मीदवारी का सार्वजनिक रूप से ऐलान किया ।  
सुधीर अग्रवाल द्वारा अपनी उम्मीदवारी की औपचारिक घोषणा में की गई इस देरी के लिए वेद जैन की हरी झंडी मिलने में हुई देरी को जिम्मेदार माना जा रहा है । हालाँकि सुधीर अग्रवाल यह नहीं मानते हैं कि उन्होंने अपनी उम्मीदवारी की औपचारिक घोषणा करने में कोई देर की है; लेकिन इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति के खिलाड़ियों तथा सुधीर अग्रवाल व वेद जैन की नजदीकियत को जानने वाले लोगों का मानना/कहना है कि सुधीर अग्रवाल दरअसल वेद जैन से हरी झंडी मिलने का इंतजार कर रहे थे । नवीन गुप्ता की उम्मीदवारी को देखते हुए वेद जैन के लिए सुधीर अग्रवाल की उम्मीदवारी के पक्ष में खड़ा दिखना मुश्किल लग रहा था । उल्लेखनीय है कि सुधीर अग्रवाल और वेद जैन को एनडी गुप्ता खेमे के सदस्य के रूप में ही देखा/पहचाना जाता रहा है । पिछले कुछेक वर्षों से हालाँकि इन दोनों के एनडी गुप्ता के साथ पहले जैसे संबंध नहीं रह गए बताए जाते हैं । वेद जैन जब इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट थे, तभी उनकी एनडी गुप्ता के साथ दूरी बनना शुरू हो गया था । दोनों के नजदीकियों का कहना है कि दोनों के बीच अब पहले जैसे संबंध नहीं रह गए हैं । कई लोग हालाँकि मानते हैं कि एनडी गुप्ता और वेद जैन के बीच भले ही पहले जैसे संबंध न रह गए हों, लेकिन वेद जैन ऐसा कुछ नहीं करेंगे या कर सकेंगे जिससे एनडी गुप्ता और उनके बेटे नवीन गुप्ता को राजनीतिक नुकसान होता हो ।
सुधीर अग्रवाल द्वारा अपनी उम्मीदवारी की औपचारिक घोषणा करने के लिए इंतजार करवाने से लोगों के बीच लेकिन इंप्रेशन यही गया है कि राजनीतिक मोर्चे पर वेद जैन ने एनडी गुप्ता से एक अलग राह पकड़ ली है । मजे की बात यह है कि न तो सुधीर अग्रवाल की तरफ से और न वेद जैन की तरफ से सुधीर अग्रवाल की उम्मीदवारी को वेद जैन के समर्थन के बारे में कोई घोषणा की गई है, किंतु लोगों ने मान लिया है कि सुधीर अग्रवाल ने लंबा इंतजार करवा कर अपनी उम्मीदवारी की अब जो औपचारिक घोषणा की है, तो वेद जैन से हरी झंडी मिलने के बाद ही की है । राजनीति समझने और करने वाले लोग जानते हैं कि राजनीति तथ्यों से नहीं, परसेप्शन से होती है । नवीन गुप्ता के लिए मुसीबत की बात यही है । लोगों के बीच परसेप्शन चूँकि यह बन रहा है कि सुधीर अग्रवाल की उम्मीदवारी को वेद जैन का समर्थन है, इसलिए लोगों के बीच इसकी प्रतिक्रिया इस रूप में हो रही है कि सेंट्रल काउंसिल में नवीन गुप्ता की जो परफॉर्मेंस है, वेद जैन उससे संतुष्ट नहीं हैं और इसीलिए अब वह नवीन गुप्ता का साथ छोड़ कर सुधीर अग्रवाल को आगे बढ़ाना चाहते हैं । नवीन गुप्ता के नजदीकियों की तरफ से हालाँकि यह बताने का प्रयास हो रहा है कि वेद जैन उनके ही साथ हैं तथा रहेंगे; लेकिन समस्या यह है कि यह बात बताने भर से लोगों के बीच स्वीकार्य नहीं होगी - उनकी यह बात यदि सच भी है, तो इसे उन्हें लोगों को 'दिखाना' भी होगा; और इस दिखाने में जितनी देर होगी उतना ही उन्हें नुकसान होता जायेगा । इस तरह, सुधीर अग्रवाल की उम्मीदवारी और उनकी उम्मीदवारी को वेद जैन के समर्थन का परसेप्शन नवीन गुप्ता के लिए भारी मुसीबत बन गया है । 
सुधीर अग्रवाल की उम्मीदवारी राधेश्याम बंसल के लिए भी मुसीबत बन कर आई है । उल्लेखनीय है कि सुधीर अग्रवाल और राधेश्याम बंसल कभी एक साथ हुआ करते थे; और इस नाते दोनों का कार्य-क्षेत्र और समर्थन-आधार लगभग एक ही है । पिछले वर्ष नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन के रूप में अपनी सक्रियता के भरोसे राधेश्याम बंसल ने सेंट्रल काउंसिल के लिए अपनी जिस उम्मीदवारी को आगे बढ़ाया है, उसे सुधीर अग्रवाल की उम्मीदवारी ने ग्रहण लगा दिया है । सुधीर अग्रवाल भले ही छह वर्ष पहले नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन थे, लेकिन उनका चेयरमैन-काल चूँकि ज्यादा सक्रियताभरा रहा था - इसलिए चेयरमैन होने के नाते मिलने वाले फायदे के संदर्भ में उनका पलड़ा राधेश्याम बंसल से भारी ही साबित होगा । कार्य-क्षेत्र और समर्थन-आधार में भी राधेश्याम बंसल की तुलना में सुधीर अग्रवाल का प्रभाव व स्वीकार्यता ज्यादा है, इसलिए सुधीर अग्रवाल की उम्मीदवारी राधेश्याम बंसल की उम्मीदवारी के लिए चौतरफा मुसीबत बनकर ही आई है । राधेश्याम बंसल के समर्थक और नजदीकी यह कहने भी लगे हैं कि सुधीर अग्रवाल उम्मीदवार बने ही राधेश्याम बंसल का रास्ता रोकने के लिए हैं । उनका कहना है कि वर्ष 2009 के चुनाव में जो 'काम' भगवानदास गुप्ता ने सुधीर अग्रवाल के लिए किया था, वही काम अब राधेश्याम बंसल के लिए सुधीर अग्रवाल करने उतरे हैं ।
सुधीर अग्रवाल की उम्मीदवारी ने नवीन गुप्ता और राधेश्याम बंसल के लिए जिस तरह की चुनौती पैदा कर दी है, उसके चलते इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल का चुनाव खासा दिलचस्प हो उठा है ।

Thursday, May 21, 2015

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट 321 में अंबरीश सरीन के मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन बनने से जेपी सिंह का एक बड़ा दाँव फेल हो गया है और उनकी बड़ी फजीहत हो रही है - इससे उनके सामने मल्टीपल की अपनी नेतागिरी को बचाने की एक बड़ी चुनौती भी पैदा हो गई है

नई दिल्ली । मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन के पद पर अंबरीश सरीन की जीत का श्रेय लेने की पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर सुशील अग्रवाल और जगदीश गुलाटी ने जो कोशिश की है - उसने उमेश गौतम, जितेंद्र सिंह चौहान, जेपी सिंह, तेजपाल सिंह खिल्लन जैसे नेताओं को बुरी तरह भड़का दिया है; और इन लोगों ने सुशील अग्रवाल और जगदीश गुलाटी को अवसरवादी घोषित करते हुए दावा किया है कि चुनावी नतीजा आने से पहले तक यह दोनों पीएस चावला के समर्थन में ही थे । कहा/बताया जा रहा है कि अगले लायन वर्ष में मल्टीपल में पूछ/तवज्जो बनाये रखने के उद्देश्य से ही सुशील अग्रवाल और जगदीश गुलाटी ने पलटी मार ली और बताने लगे हैं कि वह तो अंबरीश सरीन के साथ ही थे । उल्लेखनीय है कि सुशील अग्रवाल तो पहले से ही (कु)ख्यात हैं कि वह तो हमेशा ही जीतने वाले के साथ ही होते हैं; इस 'जरूरत' को लगता है कि अब जगदीश गुलाटी ने भी 'समझ' लिया है । लोगों को लेकिन इनके रवैये पर नहीं - बल्कि उमेश गौतम, जितेंद्र सिंह चौहान, जेपी सिंह और तेजपाल सिंह खिल्लन के रवैये पर हैरानी हो रही है कि यह चौकड़ी सुशील अग्रवाल और जगदीश गुलाटी की पलटी पर इस कदर बौखला क्यों रही है ? दरअसल अंबरीश सरीन की जीत ने इस चौकड़ी को खासा तगड़ा झटका दिया है - और पीएस चावला की हार को पीएस चावला की हार के रूप में नहीं, बल्कि इस चौकड़ी की हार के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । पीएस चावला को मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन बनवाने का 'ठेका' दरअसल इसी चौकड़ी ने - इस चौकड़ी में भी खासकर जेपी सिंह ने लिया हुआ था; और यही लोग अपने आप को मल्टीपल के लीडर के रूप में दिखा/जता रहे थे । 
मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद के चुनाव में पीएस चावला को लीडरशिप के उम्मीदवार के रूप में देखा/पहचाना जा रहा था; इस बात पर फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स भड़के हुए थे । उनकी शिकायत यह थी कि वोट तो उनको देना है लेकिन राजनीति करने और मलाई खाने का काम लीडरशिप के नाम पर कुछेक स्वयंभू नेता कर रहे हैं । इस संबंध में फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स के निशाने पर जेपी सिंह और जितेंद्र सिंह चौहान खासतौर पर थे । इसका नतीजा यह हुआ कि कुछेक फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स ने अपने आप को संगठित कर लिया और तय किया कि मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन वह चुनेंगे । इस काम में ड्रिस्ट्रिक्ट 321 सी वन के फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सुनील निगम ज्यादा सक्रिय थे; उन्होंने दूसरे फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को फार्मूला दिया कि मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन बनने की दौड़ में शामिल उम्मीदवारों से कहा जाए कि वह लीडरशिप पर पैसा खर्च करने की बजाए उनपर पैसा खर्च करें और उनके वोट प्राप्त करें । राजीव मित्तल और अंबरीश सरीन को इस फार्मूले पर सहमत तो बताया गया लेकिन दोनों में से कोई भी इस फार्मूले पर आगे बढ़ता हुआ नहीं दिखा । समस्या दरअसल यह हुई कि इस फार्मूले के सूत्रधार और प्रस्तोता सुनील निगम पैसों के लेनदेन के मामले में चूँकि थोड़ा बदनाम रहे हैं, इसलिए राजीव मित्तल और अंबरीश सरीन उनसे डील करने के लिए तैयार नहीं थे; डील करने के लिए दूसरा कोई सामने नहीं आया । राजीव मित्तल और अंबरीश सरीन चूँकि अपनी अपनी उम्मीदवारी के पक्ष में दोनों ही डील करने के लिए प्रयास कर रहे थे, इसलिए भी मामला थोड़ा गफलतभरा हो गया था । 
जेपी सिंह ने इस गफलत का पूरा पूरा फायदा उठाया । वह पीएस चावला को यह समझाने में कामयाब रहे कि उन्हें पैसे चाहने/माँगने वाले फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स के पास जाने की और उनकी चिंता करने की जरूरत नहीं है; वह उन्हें मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन बनवा देंगे । लोगों का आरोप है कि यह भरोसा देकर जेपी सिंह ने अकेले ही पीएस चावला से माल सूत लिया । इसी तरह की बातों और चर्चाओं के बीच यह लगभग तय हो गया था कि पीएस चावला फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स की पसंद नहीं रह गए थे; फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स इस बात पर उनसे बुरी तरह खफा हो गए थे कि वह पूरी तरह जेपी सिंह की गोद में जा बैठे हैं और फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को कोई तवज्जो ही नहीं दे रहे हैं । कई फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स पीएस चावला से नाराज जरूर थे, लेकिन वह चूँकि किसी और उम्मीदवार के साथ भी जुड़ते हुए नहीं दिख रहे थे - या यह कहें कि दूसरे उम्मीदवार उन्हें अपने साथ जोड़ने में सफल होते हुए नहीं दिख रहे थे; इसलिए पीएस चावला निश्चिंत थे । जेपी सिंह भी उन्हें भरोसा दिलाए हुए थे कि जो नाराज हैं वह चूँकि गफलत में हैं और बँटे हुए हैं, इसलिए वह कुछ कर नहीं पायेंगे । उमेश गौतम और जितेंद्र सिंह चौहान ने अंबरीश सरीन के खिलाफ और तेजपाल सिंह खिल्लन ने राजीव मित्तल के खिलाफ कमर कसी हुई थी ही, इसलिए पीएस चावला और भी निश्चिंत थे । वही क्या, मल्टीपल काउंसिल की चुनावी राजनीति में दिलचस्पी रखने वाला हर कोई पीएस चावला के चुने जाने को लेकर आश्वस्त था ।
इन आश्वस्त लोगों ने लेकिन ऐन मौके पर हुए एक बड़े बदलाव को अनदेखा कर दिया । ऐन मौके पर एक बड़ी घटना यह हुई कि राजीव मित्तल ने चेयरमैन पद की अपनी उम्मीदवारी को वापस ले लिया, और वह वाइस चेयरमैन पद के उम्मीदवार हो गए । अंडरकरेंट पीएस चावला और जेपी सिंह की जोड़ी के खिलाफ था ही - उनके विरोधी वोटों के बँटे होने का जो फायदा उन्हें मिलता दिख रहा था, राजीव मित्तल के पीछे हटते ही उस फायदे की संभावना घट गई थी । इस तथ्य को भाँपने/पहचानने और सावधान होने में वह चूक गए और जीतती दिख रही बाजी को हार बैठे । अब वह अपने एक वोट के बिक जाने का आरोप लगा रहे हैं । उन्हें पाँच वोट मिलने का विश्वास था, लेकिन मिले चार वोट । कौन सा एक वोट उनके हाथ से निकल गया, इसे लेकर उनमें आपस में ही मतभेद हैं । ज्यादा शक जगदीश वर्मा और प्रमोद सपरा पर किया जा रहा है । जेपी सिंह की तरफ से कहा जा रहा है कि जगदीश वर्मा ने धोखा दिया है, तो तेजपाल सिंह खिल्लन की तरफ से प्रमोद सपरा का नाम लिया जा रहा है । इस आरोप-प्रत्यारोप को जेपी सिंह और तेजपाल सिंह खिल्लन की 'लड़ाई' के रूप में भी देखा जा रहा है । लोगों को लग रहा है कि इस आरोप-प्रत्यारोप के जरिए यह दोनों एक दूसरे को लोगों की निगाह में नीचा करने/गिराने का प्रयास कर रहे हैं । हार के बाद का यह एक स्वाभाविक दृश्य है - हारने वाले खेमे के लोग एक दूसरे को जिम्मेदार ठहराते ही हैं ।  
सुशील अग्रवाल और जगदीश गुलाटी की कलाबाजी ने लेकिन इनके लिए - खासकर जेपी सिंह के लिए बड़ा संकट पैदा कर दिया है । पीएस चावला को मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन बनवाने की मुहिम के जरिए जेपी सिंह ने दरअसल एक बड़ा दाँव चला था; जिसके फेल होने पर जिस तरह उनकी फजीहत हो रही है - उससे उनके सामने अपनी नेतागिरी को बचाने की एक बड़ी चुनौती पैदा हो गई है । सुशील अग्रवाल और जगदीश गुलाटी की कलाबाजी ने उनकी चुनौती को और बढ़ाने का ही काम किया है, इसलिए उन्हें इनके खिलाफ भी बातें करने को मजबूर होना पड़ा है । 

Tuesday, May 19, 2015

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3080 में टीके रूबी की चुनावी शिकायत के कारण मुसीबत में फँसी राजा साबू एण्ड कंपनी ने पीटी प्रभाकर की मदद जुटाने के लिए रोटरी इंडिया अवार्ड फंक्शन में उन्हें आमंत्रित करने का फैसला किया है क्या ?

चंडीगढ़ । राजा साबू एण्ड कंपनी ने 'रोटरी इंडिया अवार्ड' नामक अपने आयोजन में पीटी प्रभाकर को तवज्जो देने का जो काम किया है, रोटरी नेताओं के बीच उसे लेकर दिलचस्प चर्चा छिड़ी हुई है । राजा साबू एण्ड कंपनी की तरफ से पीटी प्रभाकर को अचानक से मिलती दिख रही इस तवज्जो को राजा साबू के डिस्ट्रिक्ट में इस वर्ष पहले डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी चुने गए और फिर हटाए गए टीके रूबी द्वारा रोटरी इंटरनेशनल में दर्ज की/कराई गई चुनावी शिकायत के मामले में फैसला अपने पक्ष में करवाने की तिकड़म के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । 21 मई को दिल्ली के इंडिया हैबिटेट सेंटर में आयोजित हो रहे रोटरी इंडिया अवार्ड फंक्शन में उपस्थिति को संभव बनाने के लिए पीटी प्रभाकर की राजा साबू एण्ड कंपनी की तरफ से जिस तरह से 'खुशामद' की जा रही है, उससे पीटी प्रभाकर काफी गद्गद हैं, और अपने इस गद्गदपने को लोगों के बीच जाहिर भी कर रहे हैं - और उनके इसे जाहिर करने से ही रोटरी के बड़े नेताओं के बीच इस चर्चा को बल मिला है कि टीके रूबी की चुनावी शिकायत के मामले में फैसला अपने पक्ष में करवाने के लिए राजा साबू एण्ड कंपनी ने पीटी प्रभाकर पर डोरे डालना शुरू दिया है । दिल्ली के एक डिस्ट्रिक्ट की डिस्ट्रिक्ट एसेम्बली में गत 17 मई को शामिल हुए डिस्ट्रिक्ट 3080 के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी रमन अनेजा ने भी वहाँ लोगों को बताया कि राजा साबू कुछ भी करके पीटी प्रभाकर को खुश कर लेंगे और मनमाफिक फैसला करवा लेंगे । राजा साबू एण्ड कंपनी के लोग लेकिन इस बात से इंकार कर रहे हैं कि रोटरी इंडिया अवार्ड फंक्शन में पीटी प्रभाकर की उपस्थिति को संभव बनाने के लिए उनके द्वारा किए जा रहे प्रयासों का कोई संबंध टीके रूबी की चुनावी शिकायत के फैसले को प्रभावित करने से हैं । उनका कहना है कि पीटी प्रभाकर इंटरनेशनल डायरेक्टर हैं, और इस नाते उनकी उपस्थिति को रोटरी इंडिया अवार्ड फंक्शन में संभव बनाने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं; और उनके इन प्रयासों का टीके रूबी की चुनावी शिकायत के मामले से कोई लेना-देना नहीं है । 
राजा साबू एण्ड कंपनी की तरफ से दी गई इस सफाई ने पीटी प्रभाकर के नजदीकियों को चुटकी लेने का लेकिन अच्छा मौका उपलब्ध करवाया है । उनका कहना है कि चलो शुक्र है कि इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के 24 महीनों के पीटी प्रभाकर के कार्यकाल के आखिरी दो महीनों में राजा साबू एण्ड कंपनी के लोगों को पता तो चला कि पीटी प्रभाकर इंटरनेशनल डायरेक्टर हैं । पीटी प्रभाकर के नजदीकियों और समर्थकों की शिकायत है कि पहले 22 महीनों में तो राजा साबू एण्ड कंपनी के लोगों ने पीटी प्रभाकर को कभी इंटरनेशनल डायरेक्टर 'माना' ही नहीं; और इंटरनेशनल डायरेक्टर के रूप में उनके द्वारा किए जा रहे कामों में और लिए जा रहे फैसलों में अड़ंगा डालने का ही प्रयास किया जाता रहा है । राजा साबू के डिस्ट्रिक्ट में चुनावी बबाल होने के बाद राजा साबू एण्ड कंपनी के लोगों को जब लगा कि इस बबाल के चलते उन्हें इंटरनेशनल डायरेक्टर पीटी प्रभाकर की मदद की जरूरत पड़ सकती है तब उन्होंने पीटी प्रभाकर को सीरियसली लेना और उन्हें इंटरनेशनल डायरेक्टर 'मानना' शुरू किया; और रोटरी इंडिया अवार्ड फंक्शन ने उन्हें इसका मौका भी उपलब्ध करवा दिया । 
उल्लेखनीय है कि रोटरी इंडिया अवार्ड फंक्शन का रोटरी इंटरनेशनल से कोई लेना देना नहीं है और यह पूरी तरह राजा साबू एण्ड कंपनी का उपक्रम है । इस उपक्रम के संस्थापक चेयरमैन राजा साबू हैं, लेकिन अब चेयरमैन का पद अशोक महाजन के पास हैं । राजा साबू का चेयरमैन पद पर बने रहने का 'शौक' चूँकि पूरा नहीं हुआ है, इसलिए वह मानद चेयरमैन बन गए हैं । वाइस चेयरमैन यश पाल दास हैं । अवार्ड के लिए नोमिनेशन यश पाल दास के पते पर मंगवाएँ गए हैं । दिल्ली में हो रहे इस अवार्ड फंक्शन में इन तीनों के अलावा दिल्ली के दोनों पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर्स सुदर्शन अग्रवाल और सुशील गुप्ता उपस्थित रहेंगे । बाहर से सिर्फ पूर्व इंटरनेशनल प्रेसीडेंट कल्याण बनर्जी को बहुत आग्रह से बुलाया गया है - और पीटी प्रभाकर को । पीटी प्रभाकर की तो शुद्ध रूप से 'लाटरी' लगी है - राजा साबू के डिस्ट्रिक्ट में चुनावी शिकायत न हुई होती तो पीटी प्रभाकर को इस फंक्शन में शामिल होने का न्यौता शायद ही मिलता; मिलता भी तो सिर्फ औपचारिकता भरा । राजा साबू एण्ड कंपनी दरअसल 'अपने' इस आयोजन में 'दूसरे' प्रमुख रोटेरियंस को शामिल करने में दिलचस्पी नहीं लेती है । राजा साबू एण्ड कंपनी इस बार पीटी प्रभाकर को तवज्जो देने पर मजबूर हुई है तो इसका एकमात्र कारण यही समझा जा रहा है कि डिस्ट्रिक्ट से दर्ज हुई चुनावी शिकायत के कारण राजा साबू एण्ड कंपनी अपने राजनीतिक जीवन में सबसे बड़े संकट में फँसी है, और इस संकट ने उसकी पूरी पहचान और प्रतिष्ठा को दाँव पर लगा दिया है; और इससे उबरने/बचने के लिए राजा साबू एण्ड कंपनी को पीटी प्रभाकर की मदद की जरूरत है । 
राजा साबू के डिस्ट्रिक्ट से रोटरी इंटरनेशनल में जो चुनावी शिकायत दर्ज हुई है, उसकी सुनवाई/पड़ताल के लिए जो कमेटी बनी है उसमें पीटी प्रभाकर के नजदीकी सदस्य हैं । उक्त कमेटी के लिए सदस्य चुनने का काम इंटरनेशनल डायरेक्टर होने के नाते पीटी प्रभाकर को ही करना था; सो यह स्वाभाविक ही है कि उन्होंने 'अपने' ही लोगों को चुना होगा । दिल्ली के एक डिस्ट्रिक्ट की 17 मई को आयोजित हुई डिस्ट्रिक्ट असेम्बली में शामिल हुए राजा साबू के डिस्ट्रिक्ट के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी रमन अनेजा ने कुछेक नेताओं के बीच जो कुछ कहा/बताया, उससे यही आभास मिला कि राजा साबू एण्ड कंपनी इसी बात से डरी हुई है कि चुनावी शिकायत पर विचार करते हुए पीटी प्रभाकर के नजदीकियों वाली कमेटी पता नहीं क्या फैसला कर दे । उसके फैसले को अपने अनुकूल बनाने के लिए ही राजा साबू एण्ड कंपनी ने पीटी प्रभाकर को 'पटाना' शुरू कर दिया है । रमन अनेजा के अनुसार, टीके रूबी की चुनावी शिकायत से निपटने के लिए राजा साबू एण्ड कंपनी ने दो प्लान बनाये हैं : प्लान 'ए' के अनुसार, चुनावी शिकायत के साथ दी गईं कॉन्करेंस को वापस करवा कर शिकायत को ही अमान्य करवा दिया जाए; और यदि यह प्लान सफल न हो सके तो प्लान 'बी' के अनुसार, शिकायत को कमेटी में खारिज करवा दिया जाए । प्लान 'बी' को सफल बनाने के लिए राजा साबू एण्ड कंपनी को पीटी प्रभाकर की मदद की जरूरत पड़ेगी । प्लान 'ए' को सफल बनाने के लिए राजा साबू के डिस्ट्रिक्ट के कुछेक पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स ने पूरी तरह कमर कस ली है और वह साम-दाम-दंड-भेद रूपी सारे हथकंडे कॉन्करेंस देने वाले क्लब-अध्यक्षों पर अपना रहे हैं । प्लान 'बी' के लिए राजा साबू एण्ड कंपनी ने पीटी प्रभाकर पर डोरे डालने शुरू कर दिए हैं । इसी वजह से 21 मई को दिल्ली में राजा साबू एण्ड कंपनी के रोटरी इंडिया अवार्ड फंक्शन में पीटी प्रभाकर को भी भाषण देने का मौका मिलेगा ।
यह इस बात का एक दिलचस्प उदाहरण है कि रोटरी की राजनीतिक मजबूरियाँ राजा साबू जैसे बड़े नेताओं को भी कैसे कैसे 'मजबूर' बना देती हैं । 

Friday, May 15, 2015

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद हेतु प्रस्तुत अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने में लगे सुभाष जैन को जेके गौड़ ने जो आईना दिखाया है, सुभाष जैन उससे कोई सबक लेंगे क्या ?

गाजियाबाद । सुभाष जैन को अपनी तमाम सक्रियता के बावजूद अपनी उम्मीदवारी के लिए जितना/जैसा ठंडा और नकारात्मक रिस्पॉन्स मिल रहा है, उससे उनकी उम्मीदवारी के अभियान के तेजी पकड़ने के अनुमान फेल होते हुए दिखने लगे हैं । बहुत लोगों को उम्मीद थी कि सुभाष जैन ने जब डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत की है, तो वह अच्छी तैयारी के साथ उसके लिए समर्थन जुटाने के अभियान में निकलेंगे । सुभाष जैन अपने परिचितों के बीच अपनी इसी खूबी के लिए जाने/पहचाने जाते हैं कि वह जो भी काम हाथ में लेते हैं, उसे प्रभावी तरीके से अंजाम तक पहुँचाते हैं । लेकिन अगले रोटरी वर्ष में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए प्रस्तावित अपनी उम्मीदवारी के अभियान के संदर्भ सुभाष जैन अपनी उक्त खूबी को प्रदर्शित कर पाने में अभी तक तो विफल ही नजर आ रहे हैं । रोटरी क्लब गाजियाबाद आईडियल के प्रेसीडेंट इलेक्ट पंकज जैन के एक बिजनेस ईवेंट में उन्होंने अपनी उम्मीदवारी के प्रमोशन का जो मौका बनाया, उसके कारण तो उनकी भारी फजीहत हुई है । उक्त ईवेंट में सुभाष जैन की तरफ से आमंत्रित किए गए रोटेरियंस को वहाँ जिस बदइंतजामी का शिकार होना पड़ा, उससे देख/सुन कर उन लोगों को गहरा धक्का लगा जो सुभाष जैन की तरफ से बेहतर तैयारियों की उम्मीद लगाए हुए थे । मौके पर मौजूद कुछेक रोटेरियंस के अनुसार, बदइंतजामी को दूर करने के लिए लोगों के बीच सुभाष जैन को खुद पकौड़े सर्व करने के लिए मजबूर होना पड़ा, लेकिन फिर भी कई रोटेरियंस पकौड़े न मिलने की शिकायत करते सुने/देखे गए । सुभाष जैन के उक्त उपक्रम को कई रोटेरियंस ने आपसी बातचीत में, तो कुछेक ने सुभाष जैन के सीधे मुँह पर वाहियात बताया । 'बेगाने की शादी में अब्दुल्ला के दीवाने' होने वाले मुहावरे की तर्ज पर पंकज जैन के आयोजन से फायदा उठाने की सुभाष जैन ने जो कोशिश की, उसने उन्हें ऐसा झटका दिया है कि उससे उबरना उनके लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है । 
सुभाष जैन के लिए इससे भी बड़ी चुनौती लेकिन क्लब में बनी हुई है, जिससे उबरने/निकलने के लिए उन्हें कोई उपाय तक नहीं सूझ रहा है । क्लब में योगेश गर्ग ने अपनी उम्मीदवारी का दावा जता कर सुभाष जैन की उम्मीदवारी की राह में जो रोड़ा डाला हुआ है, उस रोड़े को हटाने के बारे में सुभाष जैन अभी तक कोई प्रयास करते हुए भी नहीं दिखे हैं । उनके नजदीकियों का कहना है कि क्लब में योगेश गर्ग द्वारा पैदा हुए इस झंझट से निबटने की उनकी सारी उम्मीद अगले रोटरी वर्ष में होने वाले क्लब के अध्यक्ष आशीष गर्ग पर टिकी है । आशीष गर्ग को सुभाष जैन 'अपना आदमी' बताते हुए दावा कर रहे हैं कि अगले रोटरी वर्ष में योगेश गर्ग से आशीष गर्ग निपटेंगे । सुभाष जैन को आशीष गर्ग से यह उम्मीद भले ही हो, लेकिन क्लब के दूसरे सदस्यों का मानना/कहना है कि आशीष गर्ग भले ही सुभाष जैन के 'आदमी' हों, लेकिन अध्यक्ष के रूप में काम तो उन्हें नियमानुसार ही करना होगा; और इसलिए सुभाष जैन जिस मनमाने तरीके से मामले को हल कर लेने की उम्मीद लगाये हुए हैं, उससे तो बात बनेगी नहीं । उल्लेखनीय है कि योगेश गर्ग से निपटने के लिए सुभाष जैन ने अभी ही प्रयास किए थे और उन्हें उम्मीद थी कि स्कूली धंधे में संग-साथ के चलते मौजूदा अध्यक्ष स्वाति गुप्ता उनका साथ देंगी । लेकिन स्वाति गुप्ता से उन्हें कोई मदद या फेवर मिलता नहीं दिखा तो उन्होंने अपने प्रयासों को समेट लिया और अपनी सारी उम्मीद आशीष गर्ग पर टिका दी हैं । क्लब में जो सुभाष जैन के शुभचिंतक भी हैं, उनका भी मानना और कहना है कि सुभाष जैन 'जिस तरह की' मदद अध्यक्ष से चाहते हैं उस तरह की मदद करने को न स्वाति गुप्ता तैयार हुईं और न आशीष गर्ग तैयार होंगे - तैयार हो भी गए, तो भी कर नहीं पायेंगे । 
सुभाष जैन के लिए क्लब का यह झमेला डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच समर्थन जुटाने की उनकी कोशिशों में एक बड़ी रूकावट बना हुआ है । दरअसल डिस्ट्रिक्ट में लोगों को यही समझना मुश्किल हो रहा है कि सुभाष जैन अपनी उम्मीदवारी के लिए जब अपने क्लब में हरी झंडी नहीं ले पा रहे हैं, तो वह उम्मीदवार बनेंगे कैसे ? सुभाष जैन के सामने उम्मीदवार बनने के यूँ तो दूसरे रास्ते हो सकते हैं, लेकिन समस्या स्पष्टता की है - जिसके अभाव में सुभाष जैन की उम्मीदवारी को लेकर ही कन्फ्यूजन बना हुआ है । ऐसे में, जबकि सुभाष जैन लोगों के बीच अपनी उम्मीदवारी को लेकर ही भरोसा पैदा नहीं कर पा रहे हैं, तब फिर अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाना उनके लिए कितना मुश्किल हो रहा होगा - इसे सहज ही समझा जा सकता है । सुभाष जैन के लिए मुसीबत की बात यह हो रही है कि डिस्ट्रिक्ट में लोगों के बीच उनकी उम्मीदवारी की हवा नहीं बनती दिख रही है, तो उसके कारण क्लब में उनकी उम्मीदवारी के संभावित समर्थक हतोत्साहित हो रहे हैं । यानि क्लब का झंझट उन्हें दोनों तरफ से चोट पहुँचा रहा है । इसीलिए सुभाष जैन की उम्मीदवारी के प्रति समर्थन का भाव रखने रोटेरियंस का मानना और कहना है कि सुभाष जैन को पहले अपने क्लब में पैदा हुए झंझट को हल करना चाहिए, जिससे कि डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच उनकी उम्मीदवारी को लेकर पैदा हुआ और बना हुआ कन्फ्यूजन दूर हो सके ।
सुभाष जैन को जेके गौड़ के रवैये से भी झटका लगा है । स्कूली धंधे की जो सक्रियता है उसमें तो जेके गौड़ उनके साथ बिलकुल कंधे से कंधा मिलाकर रहते हैं और उनकी हाँ में हाँ मिलाते रहते हैं; रोटरी में भी जेके गौड़ अभी तक उनके साथ 'ठीक' ही रहे हैं; लेकिन सुभाष जैन ने शिकायत की है कि जब से वह उम्मीदवार 'बने' हैं, तब से जेके गौड़ का रवैया कुछ बदला बदला से है । जेके गौड़ के बदले बदले रवैये की शिकायत कई अन्यों को भी है - हालाँकि यह शिकायत जायज नहीं है । जेके गौड़ अब गवर्नर हैं यार, रवैया कुछ बदलना भी चाहिए; और उनके बदले रवैये को झेलने के लिए दूसरे लोगों को तैयार भी होना चाहिए । सुभाष जैन की समस्या लेकिन दूसरी है । अपनी उम्मीदवारी को उन्होंने अचानक से यदि प्रस्तुत किया है, तो उसके पीछे जेके गौड़ की ही प्रेरणा रही है । सुभाष जैन ने खुद ही लोगों को बताया है कि जेके गौड़ से मदद मिलने का आश्वासन मिलने के बाद ही उन्होंने अपनी उम्मीदवारी को प्रस्तुत करने का निर्णय लिया है । लेकिन अब जब वह उम्मीदवार बन गए हैं, तब जेके गौड़ उन्हें कोई तवज्जो नहीं दे रहे हैं और उनकी पर्याप्त मदद नहीं कर रहे हैं । जेके गौड़ का कहना लेकिन कुछ और है । जिन लोगों ने उन्हें बताया कि सुभाष जैन उनसे मदद नहीं मिलने से खफा हैं, उन्हें जेके गौड़ ने कहा कि सुभाष जैन की समस्या यह है कि वह सोचते/चाहते हैं कि मैं रोजाना सुबह उन्हें फोन करूँ और उनसे पूछूँ कि मुझे उनकी क्या क्या मदद करनी है: जेके गौड़ ने थोड़ा तल्खी से कहा कि मदद सुभाष जैन को मुझसे चाहिए तो सुभाष जैन को मुझे फोन करना होगा और बताना होगा कि मुझसे उन्हें क्या मदद चाहिए । जेके गौड़ ने अपने इस रिएक्शन से सुभाष जैन को आईना दिखाने का जो काम किया है, वह स्वाभाविक भी है और सही भी है; साथ ही इससे यह भी पता चलता है कि सुभाष जैन के एटीट्यूड से जेके गौड़ कितने आहत हैं । 
सुभाष जैन का यह एटीट्यूड ही उनके लिए सबसे बड़ी समस्या है और इसी के कारण तमाम सक्रियता के बावजूद उनकी उम्मीदवारी के अभियान में हवा भरती हुई नहीं दिख रही है । 

Thursday, May 14, 2015

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3080, यानि राजा साबू के डिस्ट्रिक्ट में कॉलिज ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग में जो हुआ, और उसके बाद जो हो रहा है - वह है तो शर्मनाक ! किंतु सवाल यह है कि शर्म आयेगी किसे ? और आयेगी भी कि नहीं ?

चंडीगढ़ । राजेंद्र उर्फ़ राजा साबू के डिस्ट्रिक्ट के कुछेक पूर्व गवर्नर्स 11 मई को संपन्न हुई कॉलिज ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग के बाद रोटरी क्लब हिमालयन रेंजेस मनसादेवी द्वारा की गई इलेक्शन कम्प्लेंट के साथ गईं कॉन्करेंस को वापस कराने के काम में जुट गए हैं । इस बात का तो पता नहीं चल सका है कि इस काम में जुटने लिए उन्हें राजा साबू से निर्देश मिला है या नहीं, लेकिन यह बात जरूर साफ हो गई है कि इस काम में जुटने वाले पूर्व गवर्नर्स को सफल होने पर राजा साबू की गुडबुक में आने का विश्वास जरूर है । कॉन्करेंस वापस कराने के काम में जुटे पूर्व गवर्नर्स को पक्का भरोसा है कि जो जितनी ज्यादा कॉन्करेंस वापस करवायेगा, वह राजा साबू के उतना ही ज्यादा नजदीक पहुँच जायेगा । मजे की बात यह है कि डिस्ट्रिक्ट में राजा साबू के जो दूसरे समर्थक व शुभचिंतक हैं वह पूर्व गवर्नर्स की इस हरकत को शर्मनाक बता रहे हैं और दावा कर रहे हैं कि राजा साबू के नजदीक आने/पहुँचने के अपने स्वार्थ को पूरा करने के चक्कर में यह पूर्व गवर्नर्स वास्तव में राजा साबू के लिए बदनामी और फजीहत पैदा कर रहे हैं । डिस्ट्रिक्ट में बहुत से लोग अब यह मानने/समझने लगे हैं कि डिस्ट्रिक्ट में जो तमाशा खड़ा हुआ है, उसे राजा साबू का नाम लेकर कुछेक पूर्व गवर्नर्स ने अपने स्वार्थ को पूरा करने और अपनी निजी खुन्नस निकालने के उद्देश्य से खड़ा किया है । तमाशा तो उन्होंने खड़ा कर दिया लेकिन उस तमाशे को समेटना उनके लिए भारी पड़ रहा है । तमाशे को समेटने में वह जो हरकतें कर रहे हैं उससे रोटरी और डिस्ट्रिक्ट की ही नहीं, राजा साबू की भी फजीहत हो रही है । 
राजा साबू के डिस्ट्रिक्ट में - और डिस्ट्रिक्ट के बाहर जो दूसरे समर्थक व शुभचिंतक हैं, वह कहने भी लगे हैं कि इन जैसे समर्थकों व तथाकथित मददगारों के होते राजा साबू को विरोधियों या दुश्मनों की जरूरत नहीं पड़ेगी । उल्लेखनीय है कि डिस्ट्रिक्ट में और रोटरी में राजा साबू के विरोधियों या दुश्मनों की कमी नहीं है, लेकिन कोई भी उनका बाल भी बाँका नहीं कर सका है । उनकी साख और प्रतिष्ठा में उनके विरोधी या दुश्मन एक खरोंच भी पैदा नहीं कर सके । लेकिन असंभव सा लगने वाला जो काम उनके विरोधी और दुश्मन नहीं कर सके, उसे उनके समर्थक व मददगार पूर्व गवर्नर्स ने कर दिखाया है । मजे की बात यह है कि मामला जितना ज्यादा बढ़ता जा रहा है, वह राजा साबू की साख और प्रतिष्ठा के संदर्भ में उतना ही और ज्यादा संगीन होता जा रहा है । जो पूर्व गवर्नर्स राजा साबू को आश्वस्त कर रहे हैं कि वह मामले को सँभाल लेंगे, मामला उनसे संभलना तो दूर बल्कि और भी ज्यादा बिगड़ता जा रहा है । इससे सबक लेने और सावधान होने की बजाये, सच्ची स्थिति को स्वीकारने तथा उसके अनुरूप काम करने की बजाये ये पूर्व गवर्नर्स अभी भी दावा कर रहे हैं और अपने दावे को सही साबित करने के लिए ऐसी हरकतें कर रहे हैं जिससे हालात शर्मनाक स्थिति में पहुँच गए हैं । 
रोटरी क्लब हिमालयन रेंजेस मनसादेवी द्वारा दर्ज कराई गई इलेक्शन कम्प्लेंट के साथ गईं कॉन्करेंस वापस कराने के लिए कुछेक पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स जिस तरह की ओछी हरकतों पर उत्तर आये हैं; तथा कॉन्करेंस देने वाले क्लब्स के अध्यक्षों/सचिवों पर जिस तरह से दबाव बना कर उन्हें अपमानित करने का प्रयास कर रहे हैं - उसने डिस्ट्रिक्ट में वास्तव में एक शर्मनाक दृश्य पैदा कर दिया है । इन कुछेक पूर्व गवर्नर्स की हरकत से डिस्ट्रिक्ट का पूरा माहौल न सिर्फ तनावपूर्ण हो गया है, बल्कि अशालीन भी हो गया है । जो लोग अभी कल तक इन पूर्व गवर्नर्स को इज्जत की निगाह से देखते थे, वह आज इनके बारे में बहुत ही खराब तरीके से बातें कर रहे हैं । कॉन्करेंस वापस कराने के काम में नीचे स्तर तक गिरे इन पूर्व गवर्नर्स ने अपनी हरकतों से लोगों के बीच अपनी इज्जत तो गँवाई ही है, राजा साबू के लिए भी बहुत ही बुरी स्थिति पैदा कर दी है । बुरी स्थिति पैदा होने का सुबूत यह है कि आज चौथे दिन तक भी इन पूर्व गवर्नर्स को एक भी कॉन्करेंस वापस कराने में सफलता नहीं मिली है । सुनने में तो यहाँ तक आ रहा है कि इन पूर्व गवर्नर्स की इन हरकतों से डिस्ट्रिक्ट में इतना रोष पैदा हुआ है कि कई एक क्लब्स ने रोटरी क्लब हिमालयन रेंजेस मनसादेवी के पदाधिकारियों को अपनी अपनी कॉन्करेंस ऑफर की हैं । 
दुर्भाग्य की और निहायत शर्म की बात यह है कि 11 मई की कॉलिज ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग नेपाल में आए भूकंप से उजड़े लोगों को मदद पहुँचाने के उपायों पर बात करने के उद्देश्य से बुलाई गई थी; लेकिन इस बारे में मीटिंग में कोई बात ही नहीं हुई । बात सिर्फ रोटरी क्लब हिमालयन रेंजेस मनसादेवी द्वारा दर्ज कराई गई इलेक्शन कम्प्लेंट के बारे में हुई । कुछेक पूर्व गवर्नर्स इस बात पर बुरी तरह बौखलाए हुए थे कि इस इलेक्शन कम्प्लेंट के समर्थन में डिस्ट्रिक्ट के दूसरे कई क्लब्स ने कॉन्करेंस कैसे दे दीं । मीटिंग में उपस्थित कुछेक पूर्व गवर्नर्स ने मीटिंग के मुख्य एजेंडे - नेपाल में भूकंप से उजड़े लोगों की मदद के उपायों पर बात करने की कोशिश की भी तो उन्हें चुप करा दिया गया; और सारी चर्चा इस बात पर केंद्रित रही कि कॉन्करेंस वापस कैसे करवाई जाएँ ? कुछेक पूर्व गवर्नर्स ने अपने आप ही ड्यूटियाँ बाँट लीं कि फलाँ फलाँ क्लब्स की कॉन्करेंस फलाँ फलाँ पूर्व गवर्नर वापस करवायेंगे । मीटिंग खत्म होने के तुरंत बाद से कुछेक पूर्व गवर्नर्स काम पर लग भी गए । सफलता अभी चार दिन बाद तक भी किसी को नहीं मिली है - लेकिन उनके अहंकारपूर्ण दावे पहले जैसे ही बने हुए हैं । पूर्व गवर्नर्स की इस हरकत पर रोटरी क्लब हिमालयन रेंजेस मनसादेवी की तरफ से डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दिलीप पटनायक को लिखा ईमेल पत्र डिस्ट्रिक्ट में कई लोगों को मिला है; जिससे पूर्व गवर्नर्स की हरकत डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच चर्चा का विषय तो बन ही गई है, उनकी जमकर थुक्काफजीहत भी हो रही है । 
डिस्ट्रिक्ट के लोगों को लेकिन राजा साबू के रवैये पर ज्यादा हैरानी और निराशा हो रही है । लोगों को लग रहा है कि राजा साबू ने जिस तरह से इस मामले को लेकर आँखों पर पट्टी बाँध कर धृतराष्ट का रूप अपना लिया है, उससे खुद उनकी ही पहचान और प्रतिष्ठा धूल में मिली जा रही है । किसी के लिए भी यह समझना मुश्किल हो रहा है कि राजा साबू कुछेक पूर्व गवर्नर्स के हाथों इतना मजबूर क्यों हो गए हैं कि अपने भले-बुरे को देखने का विवेक भी खो बैठे हैं ? उनकी शह या उनकी चुप्पी से प्रोत्साहन पाकर कुछेक पूर्व गवर्नर्स ने जिस तरह से डिस्ट्रिक्ट में रोटरी भावना और रोटरी आदर्शों को तार-तार किया हुआ है - उससे डिस्ट्रिक्ट, रोटरी और खुद राजा साबू के लिए स्थितियाँ शर्मनाक बन गईं हैं । किंतु सवाल यही है कि शर्म आयेगी किसे ? और आयेगी भी कि नहीं ?

Tuesday, May 12, 2015

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में जेके गौड़ व शरत जैन जैसों के जरिए मुकेश अरनेजा को किनारे लगाने में कामयाब रहे रमेश अग्रवाल ने प्रसून चौधरी की उम्मीदवारी का झंडा उठाया, लेकिन प्रसून चौधरी के समर्थक रमेश अग्रवाल के खुले समर्थन को आत्मघाती मान रहे हैं

नई दिल्ली । प्रसून चौधरी की डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की उम्मीदवारी को रमेश अग्रवाल के समर्थन की चर्चाओं के कारण डिस्ट्रिक्ट के सत्ता खेमे में फूट पड़ने के अनुमान लगाये जाने लगे हैं । यह अनुमान इसलिए लगाए जा रहे हैं क्योंकि मुकेश अरनेजा को अशोक गर्ग के समर्थक के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । लोगों को लग रहा है कि अगले रोटरी वर्ष में होने वाला डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद का चुनाव मुकेश अरनेजा और रमेश अग्रवाल की राहों को अलग अलग करने का कारण बनेगा । दरअसल जेके गौड़ तथा शरत जैन के रवैये ने मुकेश अरनेजा को तगड़ा झटका दिया है; और उन्हें लगने लगा है कि उनके साथ 'इस्तेमाल करो और किनारे लगाओ' वाला फार्मूला इस्तेमाल किया जा रहा है । पहले जेके गौड़ को तथा फिर शरत जैन को चुनवाने में मुकेश अरनेजा ने अपना सारा 'हुनर' इस्तेमाल किया - लेकिन यह दोनों रमेश अग्रवाल के ज्यादा सगे बने हैं और इन्होंने मुकेश अरनेजा को तो 'एक्स्ट्रा कलाकार' मान कर अलग ही बैठा दिया है । जेके गौड़ जिस तरह रमेश अग्रवाल को ही 'माई-बाप' माने बैठे हैं, उससे सबसे ज्यादा फजीहत मुकेश अरनेजा की हुई है और हो रही है । शरत जैन ने भी अभी से जेके गौड़ जैसे ही रंग-ढंग दिखाने शुरू कर दिए हैं, जिससे यह लगने लगा है कि शरत जैन के गवर्नर-काल में भी मुख्य भूमिका रमेश अग्रवाल की ही रहेगी, तथा मुकेश अरनेजा को तो ज्यादा से ज्यादा अतिथि कलाकार की भूमिका मिल जायेगी । डिस्ट्रिक्ट में मुकेश अरनेजा की यह जो दुर्गति हो रही है, उसका असर डिस्ट्रिक्ट के ऊपर की रोटरी की दुनिया पर भी पड़ रहा है - जहाँ कि रमेश अग्रवाल अपने लिए तो छोटे-मोटे असाइनमेंट जुगाड़ लेते हैं, और मुकेश अरनेजा को हाथ मलते हुए ही रह जाना पड़ता है । 
इसीलिए मुकेश अरनेजा को लग रहा है कि रमेश अग्रवाल से अलग होकर ही वह अपनी खोई हुई ताकत तथा हैसियत को पुनः पा सकते हैं । दूसरे लोगों का तो कहना है ही, लेकिन अब तो मुकेश अरनेजा को भी लगने लगा है कि उनकी रोटरी की राजनीति को रमेश अग्रवाल की हरकतों के चलते ही ग्रहण लग रहा है । अपनी हरकतों के चलते रोटरी के नेताओं के बीच रमेश अग्रवाल बुरी तरह बदनाम हैं; उनकी यह बदनामी मुकेश अरनेजा के पीछे भी चिपक जाती है - क्योंकि माना/समझा जाता है कि रमेश अग्रवाल जो भी करते हैं उसमें मुकेश अरनेजा का सहयोग व समर्थन होता ही है । इस तरह रमेश अग्रवाल के कारण मुकेश अरनेजा को दोहरा नुकसान होता है - एक तरफ तो रमेश अग्रवाल की बदनामी उनकी बदनामी में और इजाफा करती है, और दूसरी तरफ उनके लिए जो थोड़े-बहुत मौके बनते हैं उन्हें भी रमेश अग्रवाल झपट लेते हैं । बड़ा कमाल तो डिस्ट्रिक्ट में यही हुआ है कि रमेश अग्रवाल के प्रभाव में जेके गौड़ जैसे 'ना-कुछ' ने मुकेश अरनेजा को धो कर रख दिया है । मुकेश अरनेजा की बेचारगी का आलम यह है कि वह जेके गौड़ का कुछ कर भी नहीं पा रहे हैं । मुकेश अरनेजा ऐसे थे नहीं - लोगों को याद है कि अमित जैन ने जब उन्हें 'धोया' था, तब मुकेश अरनेजा ने उनसे कैसा बदला लिया था । जेके गौड़ के मामले में मुकेश अरनेजा की लेकिन सिट्टी-पिट्टी गुम है । जेके गौड़ के बाद शरत जैन भी मुकेश अरनेजा को 'ठिकाने' लगाने की तैयारी में हैं । मुकेश अरनेजा जैसे धाकड़ नेता जेके गौड़ तथा शरत जैन जैसों के सामने असहाय बने हुए हैं, तो इसका कारण यही है कि इन दोनों को रमेश अग्रवाल से शह व समर्थन मिल रहा है ।
अपनी खोई हुई ताकत व हैसियत को वापस पाने के लिए मुकेश अरनेजा ने लेकिन इस बीच एक बड़ा काम यह जरूर किया है कि उन्होंने सतीश सिंघल से तार जोड़ लिए हैं । वह भाँप रहे हैं कि सतीश सिंघल के गवर्नर-काल में रमेश अग्रवाल को ज्यादा तवज्जो नहीं मिलेगी, इसलिए सतीश सिंघल के साथ तार जोड़ कर वह रोटरी की राजनीति में अपने पुराने मुकाम को पाने की उम्मीद लगाये हुए हैं और इस उम्मीद को पूरा करने के लिए उन्होंने अपना कदम बढ़ा दिया है । अपने इस कदम के वास्ते ठोस जमीन तैयार करने के लिए मुकेश अरनेजा ने सतीश सिंघल के बाद अशोक गर्ग को गवर्नर बनवाने का जिम्मा उठा लिया है । मुकेश अरनेजा की इस चाल को पहचान कर ही रमेश अग्रवाल ने अशोक गर्ग की उम्मीदवारी के समर्थन से हाथ खींच लिया है । उल्लेखनीय है कि अभी कुछ समय पहले तक रमेश अग्रवाल को अशोक गर्ग की उम्मीदवारी के समर्थक के रूप में ही देखा/पहचाना जा रहा था, लेकिन रमेश अग्रवाल ने अब प्रसून चौधरी की उम्मीदवारी का समर्थन करने के संकेत देना शुरू कर दिया है । मुकेश अरनेजा को यह स्थिति अपनी रणनीति के अनुरूप ही घटित होती हुई दिख रही है । रमेश अग्रवाल की इस उम्मीदवार-बदली से उनके लिए लोगों के बीच यह कहने/बताने का मौका बना है कि उन्होंने रमेश अग्रवाल का साथ नहीं छोड़ा है, बल्कि रमेश अग्रवाल ने उनका साथ छोड़ा है ।
रमेश अग्रवाल के समर्थन को लेकर प्रसून चौधरी के समर्थकों के बीच जो खलबली मची है, उसे देख/जान कर भी मुकेश अरनेजा उत्साहित हुए हैं । प्रसून चौधरी के कई समर्थक व शुभचिंतक रमेश अग्रवाल के खुले समर्थन को प्रसून चौधरी की उम्मीदवारी के लिए आत्मघाती मान रहे हैं । उनका कहना है कि डिस्ट्रिक्ट में रमेश अग्रवाल की जैसी जो बदनामी है - उसके कारण रमेश अग्रवाल के समर्थन से फायदा कम,नुकसान ज्यादा होगा । यह सच है कि रमेश अग्रवाल के समर्थन के बावजूद जेके गौड़ और शरत जैन जीते हैं, लेकिन यह मानना कि इन्हें जीत रमेश अग्रवाल के कारण मिली है - सच्चाई व तथ्यों से मुँह चुराना होगा । इसी का वास्ता देकर प्रसून चौधरी के कुछेक समर्थकों का सुझाव है कि रमेश अग्रवाल के समर्थन को पर्दे के पीछे छिपा कर रखे जाने की जरूरत है । सवाल लेकिन यह है कि इसके लिए रमेश अग्रवाल तैयार होंगे क्या ? यह सुझाव रमेश अग्रवाल को अपनी तौहीन नहीं लगेगा क्या ? और इस तौहीन के बाद भी वह प्रसून चौधरी की उम्मीदवारी के समर्थन में बने रहेंगे क्या ? इन सवालों से जो स्थितियाँ बन रही हैं, उन्हें सुभाष जैन और भड़का रहे हैं । वह लोगों को बता रहे हैं कि स्कूली धंधे के कारण जेके गौड़ और जैन होने के कारण शरत जैन उनके समर्थन के लिए राजी हो गए हैं, और यह दोनों रमेश अग्रवाल पर दबाव बनायेंगे कि रमेश अग्रवाल इस बार प्रसून चौधरी को उनके पक्ष में बैठा लें । सुभाष जैन का यह दावा कितना सच है, और यदि सच है तो कब तक कामयाब हो पायेगा - यह तो अगले कुछ दिनों में ही स्पष्ट हो पायेगा; लेकिन अभी यह जरूर हुआ है कि रमेश अग्रवाल के समर्थन से पैदा हुई मुसीबत में प्रसून चौधरी और उनके समर्थक अभी उलझे हुए थे ही कि सुभाष जैन के इस 'हमले' ने उनकी मुसीबत को और बढ़ा दिया है । 
रमेश अग्रवाल के नाम पर पैदा हुए इस झमेले में मुकेश अरनेजा को अपना काम आसान होता हुआ दिख रहा है; और उनकी इस आसानी में डिस्ट्रिक्ट की राजनीति एक दिलचस्प मोड़ लेती हुई नजर आ रही है । 

Monday, May 11, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत संजय वासुदेवा की उम्मीदवारी ने संजीव चौधरी, विजय गुप्ता, विनोद जैन और विशाल गर्ग के लिए एक साथ मुश्किलें तो खड़ी कर दी हैं; लेकिन खुद संजय वासुदेवा के लिए भी मामला उतना आसान नहीं दिख रहा है, जितना कि समझा जा रहा है

नई दिल्ली । एससी वासुदेवा ने अपने बेटे संजय वासुदेवा को इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के लिए चुनवाने का बीड़ा जिस तरह उठा लिया है, उसके कारण उन्होंने संजीव चौधरी, विजय गुप्ता, विनोद जैन और विशाल गर्ग के लिए एक साथ मुश्किलें खड़ी कर दी हैं । एससी वासुदेवा का प्रोफेशन के लोगों के बीच जो ऑरा (आभामंडल) है तथा उन्होंने संजय वासुदेवा की उम्मीदवारी के पक्ष में जो सक्रियता दिखाई है; उसके चलते एक तरफ जहाँ संजीव चौधरी और विजय गुप्ता के लिए सेंट्रल काउंसिल की अपनी मौजूदा सीट की रक्षा कर पाना मुश्किल हो गया है, वहीं दूसरी तरफ विनोद जैन और विशाल गर्ग के लिए सेंट्रल काउंसिल में घुसने का दरवाजा लोगों को और दूर हो गया लग रहा है । ऑडिट और कन्सल्टिंग क्षेत्र में नामी फर्म होने के नाते एससी वासुदेव का कंपनियों में जो वोट है, उस पर अच्छा प्रभाव है । संजीव चौधरी और विनोद जैन भी चूँकि कंपनियों के वोटों पर निर्भर रहते हैं, इसलिए इनके सामने कंपनियों के वोटों के छिन जाने का खतरा पैदा हो गया है । गौर करने वाला तथ्य यही है कि पिछली बार वासुदेवा खेमे का समर्थन मिलने के कारण ही संजीव चौधरी को जीत मिली थी; और संजीव चौधरी को वासुदेवा खेमे का समर्थन मिलने के कारण ही विनोद जैन सेंट्रल काउंसिल की अपनी सीट खो बैठे थे । इसीलिए लोगों को लग रहा है कि इस बार जब वासुदेवा खेमे से संजय वासुदेवा उम्मीदवार हो रहे हैं, तो विनोद जैन के लिए तो हालात और बुरे हो ही जाते हैं, संजीव चौधरी के लिए भी मुसीबत खड़ी हो जाती है । 
वासुदेवा फर्म का ब्राँच ऑफिस लुधियाना में होने के कारण लुधियाना तथा आसपास के शहरों में संजय वासुदेवा को अच्छा समर्थन मिलने की उम्मीद है - यही उम्मीद विजय गुप्ता और विशाल गर्ग के लिए खतरे की घंटी बजाती है । उल्लेखनीय है कि विजय गुप्ता को पिछली बार लुधियाना से ही संजीवनी मिली थी; संजय वासुदेवा की उम्मीदवारी और उनकी उम्मीदवारी को लुधियाना में मिलने वाले समर्थन की चर्चा ने विजय गुप्ता से वह संजीवनी छीन लेने का खतरा पैदा कर दिया है । विशाल गर्ग तो लुधियाना के भरोसे ही सेंट्रल काउंसिल के लिए अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत कर रहे हैं । लोगों का पूछना लेकिन यह है कि लुधियाना में जब संजय वासुदेवा का डंका बजेगा, तब विशाल गर्ग के लिए बचेगा क्या ?
संजय वासुदेवा के लिए इस तरह ऊपरी तौर पर तो मामला बड़ा आसान लगता है, किंतु इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति के गणित तथा उसकी केमिस्ट्री को जानने/समझने वाले लोगों का यह भी मानना और कहना है कि संजय वासुदेवा के लिए मामला उतना आसान नहीं है, जितना कि समझा जा रहा है । संजय वासुदेवा के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही है कि लोगों के बीच उनकी अपनी कोई पहचान नहीं है, वह एससी वासुदेवा के बेटे के रूप में ही पहचाने जाते हैं । यह सच है कि लोगों के बीच एससी सचदेवा की अच्छी साख, पहचान और प्रतिष्ठा है - किंतु इस साख, पहचान और प्रतिष्ठा को वोटों में बदलने का मैकेनिज्म भी उनके पास है, यह बात कोई भी विश्वास के साथ नहीं कह पा रहा है । वासुदेवा खेमे के एक प्रमुख सदस्य ने इन पँक्तियों के लेखक से साफ कहा कि एससी वासुदेवा के कारण संजय वासुदेवा को प्लेटफॉर्म तो अच्छा मिला है, लेकिन इस पर 'गाड़ी चलाने' का काम संजय वासुदेवा को ही करना पड़ेगा । वासुदेवा खेमे के जो बड़े नेता या लोग हैं, वह वास्तव में एससी वासुदेवा के साथ अपने को कनेक्ट करते हैं; उनका सक्रिय समर्थन संजय वासुदेवा को मिल सके - इसके लिए प्रयास संजय वासुदेवा को ही करने पड़ेंगे । यह प्रयास संजय वासुदेवा के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सक्रिय राजनीति से वर्ष 2006 में एससी वासुदेवा के अलग होने के बाद से वासुदेवा खेमे के लिए 'अपने' उम्मीदवार को जितवा पाना और ला पाना मुश्किल हुआ है । 
उल्लेखनीय है कि वर्ष 2006 में वासुदेवा खेमे से सुनील अरोड़ा उम्मीदवार बने थे, लेकिन कामयाब नहीं हो सके थे; और उसके बाद  चुनावों में वासुदेवा खेमे से कोई उम्मीदवार नहीं आया । आरोप की शक्ल में चर्चा यह रही है कि खेमे का पर्याप्त समर्थन न मिलने के कारण सुनील अरोड़ा कामयाब नहीं हो सके थे, और बाद के चुनावों में भी खेमे का पर्याप्त समर्थन न मिलने के डर से ही खेमे से कोई उम्मीदवार नहीं बना । हालाँकि खुद सुनील अरोड़ा इस तरह की बातों को गलत और बेबुनियाद बताते रहे हैं । कई मौकों पर सुनील अरोड़ा ने कहा है कि 2006 में यदि वह कामयाब नहीं हो सके थे, तो इसके लिए वह खुद ही जिम्मेदार थे । एक तो उन्होंने अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करने में बहुत देर लगा दी थी, और दूसरे फिर वह अपने चुनाव अभियान के लिए भी आवश्यक समय नहीं दे पाए थे । सुनील अरोड़ा के अनुसार, खेमे के नेताओं ने तो वर्ष 2006 में भी उनको भरपूर सहयोग व समर्थन दिया था, तथा वर्ष 2009 में भी उन्हें उम्मीदवार बनने के लिए खूब प्रेरित किया था - लेकिन अपनी व्यस्तता के कारण वह ही उम्मीदवार नहीं बने थे । अब कारण चाहें जो रहे हों, सच्चाई यही है कि इंस्टीट्यूट के पिछले तीन चुनावों में वासुदेवा खेमे की जो 'प्रत्यक्ष' अनुपस्थिति रही है, उससे जो गैप बना है उसकी भरपाई करने की चुनौती एक उम्मीदवार के रूप में संजय वासुदेवा के सामने हैं । 
संजय वासुदेवा के जो कुछेक समर्थक नवीन गुप्ता के उदाहरण के साथ तर्क देते हैं कि जिस तरह 'सिर्फ' एनडी गुप्ता के बेटे होने के नाते नवीन गुप्ता इंस्टीट्यूट का चुनाव जीत सकते हैं, उसी तरह संजय वासुदेवा भी एससी वासुदेवा के बेटे होने के कारण चुनाव जीत लेंगे; वह एक तथ्य मिस कर रहे हैं कि जब नवीन गुप्ता पहली बार उम्मीदवार बने थे, तब तक एनडी गुप्ता की राजनीतिक सक्रियता में कोई गैप नहीं बना था और उनका खेमा वेद जैन को कामयाब करवा चुका था । एक बड़ा फर्क और है तथा वह यह कि एनडी गुप्ता का लोगों के बीच जो इन्वॉल्वमेंट और या प्रभाव रहा है उसमें राजनीतिक पुट ज्यादा रहा है; जबकि एससी वासुदेवा का लोगों के बीच जो इन्वॉल्वमेंट और या प्रभाव रहा है, उसमें एकेडमिक व कैरियर वाला पुट ज्यादा रहा है । इस एकेडमिक व कैरियर वाले पुट को राजनीति में - सीधे सीधे कहें तो वोटों में बदलने का काम संजय वासुदेवा को ही करना पड़ेगा, जो नवीन गुप्ता को नहीं करना पड़ा था । नवीन गुप्ता को तो बिना कुछ किए-धरे, अपने पिताजी के भरोसे जीत मिल गई थी - लेकिन संजय वासुदेवा को शायद उतनी आसानी से जीत न मिल सके । एससी वासुदेवा इस बात को बखूबी समझ रहे हैं और इसीलिए उन्होंने खुद भी मोर्चा सँभाला है तथा अपनी तरफ से पहल करके अपने लोगों को संजय वासुदेवा की उम्मीदवारी के पक्ष में सक्रिय होने के लिए प्रेरित करने में लगे हैं । 
संजय वासुदेवा की उम्मीदवारी के समर्थकों ने विश्वास व्यक्त किया है कि संजय वासुदेवा निश्चित रूप से एक उम्मीदवार की जिम्मेदारी निभायेंगे और वासुदेवा खेमे में चुनावी राजनीति के खिलाड़ी जो नेता हैं उनके सहयोग से संजय वासुदेवा चुनावी समीकरणों को अपने पक्ष में कर लेंगे । यह देखना सचमुच दिलचस्प होगा कि अपनी उम्मीदवारी के समर्थकों के इस विश्वास को बनाये रखने के लिए संजय वासुदेवा क्या करते हैं और कैसे करते हैं ?